साल 2023 में एक गंभीर घुटने की चोट ने उसका करियर रोक दिया। चोट से उबरने के दौरान सिर से पिता का साया भी उठ गया। घर पर आंशिक रूप से लकवाग्रस्त और याददाश्त खोती मां की जिम्मेदारी अलग। हालात ऐसे थे कि कोई भी 22 साल की खिलाड़ी टूट जाती, लेकिन ब्यूटी डुंगडुंग ने हार मानने के बजाय खुद को और मजबूत किया।
पहली स्टिक बांस की
झारखंड के छोटे से गांव से निकलकर बांस की बनी पहली स्टिक से खेल शुरू करने वाली यह फॉरवर्ड आज राष्ट्रीय शिविर में पसीना बहा रही है। दो साल की लंबी रिहैब, आंसुओं और अनिश्चितताओं के बाद ब्यूटी डुंगडुंग ने न सिर्फ मैदान पर वापसी की, बल्कि अब उनकी नजर आगामी एफआईएच हॉकी वर्ल्ड कप 2026 क्वालिफायर्स पर टिकी है।
ब्यूटी की भावुक कमबैक स्टोरी
ब्यूटी डुंगडुंग की कहानी सिर्फ एक कमबैक नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, जिद और उम्मीद की कहानी है। जहां हर दौड़ती हुई कदम में पिता का सपना, मां की दुआ और परिवार का भविष्य साथ चलता है। बेंगलुरु में इंडियन विमेंस हॉकी टीम के नेशनल कैंप में पसीना बहा रही युवा फॉरवर्ड ब्यूटी डुंगडुंग के कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। मैदान पर वापसी के साथ वह अपनी जिंदगी की सबसे मुश्किल लड़ाई रही है।
मैदान से ज्यादा बाहर दिल टूटा
साल 2023 में लगी घुटने की गंभीर चोट को याद करते हुए ब्यूटी डुंगडुंग कहती हैं, ‘मुझे वापसी करने में लगभग दो साल लग गए।’ महीनों तक रिहैब में फंसी रही। यह सोचते हुए कि क्या वह कभी फिर से भारत के लिए खेल पाएगी, लेकिन मैदान के बाहर जो दिल टूटा, उसके सामने शारीरिक दर्द कुछ भी नहीं था।
ब्यूटी डुंगडुंग बताती हैं, ‘मेरी चोट के समय मेरे पिता गुजर गए। मैं घर और कैंप के बीच आती-जाती रहती थी और एक साथ बहुत कुछ हो रहा था। कई बार मुझे सच में शक होता था कि वापसी हो भी पाएगी या नहीं।’
पिता थे सबसे बड़े हीरो और सपोर्टर
ब्यूटी डुंगडुंग के पिता उनके सबसे बड़े हीरो और समर्थक थे। झारखंड के छोटे से गांव की होने के कारण पैसे की हमेशा तंगी रहती थी। ब्यूटी डुंगडुंग जब सिर्फ पांच साल की थी तो उनके पिता ने बांस से उनकी पहली हॉकी स्टिक बनाई थी, क्योंकि वह असली हॉकी स्टिक नहीं खरीद सकते थे। बाद में वह उसके खेल के सपनों को पूरा करने के लिए दूसरे राज्यों में दिहाड़ी मजदूर के तौर पर भी काम करने लगे।
ब्यूटी कहती हैं, ‘जब पापा थे तो मुझे बहुत समर्थन मिला। अब मुझे सब कुछ खुद करना पड़ता है। ब्यूटी आज अपने परिवार की मुख्य आधार स्तंभ हैं।’ इंडियन ऑयल में अपनी नौकरी की वजह से वह अपने घर का ध्यान रखती हैं। वह अपने भाई के परिवार को सपोर्ट करने में मदद करती हैं और अपनी छोटी भतीजी और भतीजों की पढ़ाई का खर्च उठाती हैं।
मां की करती हैं देखभाल
ब्यूटी डुंगडुंग अपनी मां की देखभाल करती हैं। सबसे दुख की बात यह है कि वह थोड़ी पैरालाइज्ड हैं और मेमोरी लॉस से जूझ रही हैं। ब्यूटी डुंगडुंग कहती हैं, ‘कभी-कभी यह तनावपूर्ण हो जाता है, क्योंकि मम्मी थोड़ी पैरालाइज्ड है और उनकी याददाश्त कमजोर हो रही है। वह चीजें भूल जाती हैं।’
ब्यूटी कहती हैं, ‘मैं उन्हें बार-बार समझाती हूं, लेकिन वह फिर भी मुझसे पूछती हैं, तुम घर कब आओगी? जब मैं दूर होती हूं तो मेरा मन स्वाभाविक उन्हीं की ओर जाता है।’ इंटरनेशनल हॉकी का बहुत ज्यादा दबाव और घर की उदासी के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है, लेकिन ब्यूटी डुंगडुंग हार नहीं मानती।
पूरा फोकस गेम पर
ब्यूटी डुंगडुंग ने बताया, ‘अगर मैं बहुत ज्यादो सोचूंगी तो मैं ही मुश्किल में पड़ जाऊंगी, इसलिए मैंने अपना पूरा फोकस गेम पर लगा दिया। अपने परिवार की वित्तीय मदद कर पाना अच्छा लगता है। मैं बस दोनों तरफ से इसे मैनेज करने की कोशिश करती हूं।’ ब्यूटी का दुख जब बहुत ज्यादा हो जाता है तो वह अपने हॉकी परिवार पर निर्भर हो जाती हैं।
टीम की खिलाड़ी करती हैं मोटिवेट
ब्यूटी ने बताया, ‘टीम में मेरे दोस्त हैं, इसलिए मैं अपनी फीलिंग्स उनके साथ शेयर करती हूं। मैच से पहले भी, अगर मैं उदास महसूस करती हूं तो मैं उन्हें ईमानदारी से बताती हूं कि आज मेरा मूड अच्छा नहीं है, इसलिए प्लीज मुझे मोटिवेट करें। टीम सच में मदद करती है।’ ब्यूटी डुंगडुंग ने धीरे-धीरे फिर से अपनी रिदम पा ली है। वह एशियन चैंपियंस ट्रॉफी और हाल ही में हुई हीरो हॉकी इंडिया लीग में खेलने के लिए मैदान पर लौटीं।
ब्यूटी डुंगडुंग अब नेशनल कैंप में आ गई हैं। वह हैदराबाद (तेलंगाना) में होने वाले जरूरी एफआईएच हॉकी वर्ल्ड कप 2026 क्वालिफायर से पहले कड़ी मेहनत कर रही हैं। अपनी रनिंग और रिसीविंग स्किल्स के लिए जानी जाने वाली ब्यूटी डुंगडुंग स्ट्राइकिंग सर्कल के अंदर अपना कॉन्फिडेंस लौटाने की कोशिश कर रही हैं।
ब्यूटी डुंगडुंग अब सिर्फ मजे के लिए खेलने वाली एक छोटी लड़की नहीं है। जब भी वह अपनी हॉकी स्टिक पकड़ती हैं तो वह अपनी मां की देखभाल, अपने परिवार के भविष्य और उस पिता की याद के लिए खेलती है, जिन्होंने बांस से उसकी पहली स्टिक बनाई थी।
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