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बिहार में कब आएंगे क्रिकेट के ‘अच्छे दिन’

राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने का सपना बिहार के युवा क्रिकेट खिलाड़ियों की आंखों में दम तोड़ने लगा है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) की दादागिरि इसका बड़ा कारण है...

Author Published on: August 8, 2015 12:11 PM
गैर मान्यता प्राप्त क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार के सचिव आदित्य वर्मा। (फाइल फोटो)

सैयद सबा करीम, सुब्रत बनर्जी, अविनाश कुमार, अमीकर दयाल, सुनील कुमार और जीशान अली जैसे खिलाड़ी बन कर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने का सपना बिहार के युवा क्रिकेट खिलाड़ियों की आंखों में दम तोड़ने लगा है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) की दादागिरि इसका बड़ा कारण है। विभाजन के बाद बोर्ड ने बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को मान्यता देने की बजाय झारखंड क्रिकेट एसोसिएशन को मान्यता देकर एेसी नजीर कायम की है जो अपने आप में उसके कामकाज के तरीके पर सवाल खड़ा करती है।

दिलचस्प यह है कि बिहार के साथ ही उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश का भी बंटवारा हुआ था और उत्तराखंड व छत्तीसगढ़ राज्य वजूद में आए थे। लेकिन बोर्ड ने उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश क्रिकेट संघों को मान्यता दे दी लेकिन बिहार के साथ उसने भेदभाव भरा रवैया अपनाया और उसकी जगह झारखंड को मान्यता दे दी। छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड अभी भी मान्यता की बाट जोह रहे हैं लेकिन बोर्ड और उसके अका इन राज्यों के खिलाड़ियों की सुध लेने की जहमत नहीं उठा रहे हैं।

राज्य बंटवारे के बाद शुरू में सब कुछ ठीक रहा था। लालू प्रसाद यादव की पार्टी तब बिहार में सत्ता में थी और इसे देखते हुए लालू प्रसाद यादव को बिहार क्रिकेट एसोसिएशन का अध्यक्ष बनाया गया था। उनके ही सहयोगी और खेलों में गहरी रुचि रखने वाले अब्दुल बारी सिद्दीकी भी संघ से जुड़े। लालू यादव ने बतौर अध्यक्ष बीसीसीआइ की बैठक में हिस्सा लिया था और बोर्ड के चुनाव में अपना वोट भी डाला था। तब अध्यक्षपद के लिए जगमोहन डालमिया और एसी मुथैया में मुकाबला था। लालू ने मुथैया को वोट किया था लेकिन चुनाव डालमिया जीत गए और इसी के बाद बिहार क्रिकेट पर ग्रहण लग गया। डालमिया ने मतदान का बदला बिहार क्रिकेट से लिया। अध्यक्ष बनते ही उन्होंने बिहार क्रिकेट संघ को तो मान्यता नहीं दी लेकिन झारखंड क्रिकेट को दे दी।

हालात तब और बिगड़े जब क्रिकेट को लेकर बिहार में सियासी दांवपेच चले जाने लगे। खिलाड़ियों के हितों से इतर अपने नफे-नुकसान को देखा जाने लगा और कीर्ति आजाद के संरक्षण में एसोसिएशन ऑफ बिहार क्रिकेट खड़ा कर एक समांतर सत्ता स्थापित करने की कोशिश की गई (अब गायक से सांसद बने मनोज तिवारी इसके अध्यक्ष हैं)।

दिलचस्प बात यह है कीर्ति आजाद को तब बिहार क्रिकेट से किसी तरह का लेनादेना नहीं था। वे दिल्ली से रणजी ट्रॉफी के मैच खेलते रहे। बिहार की नुमाइंदगी करने की जहमत नहीं उठाई लेकिन फिर सियासी रसूख काम आया। भाजपा से सांसद बने और बिहार में क्रिकेट-क्रिकेट खेलने लगे। इसका फायदा बिहार के खिलाड़ियों को कम, नुकसान ज्यादा हुआ।

लेकिन मामला यहीं नहीं रुका, बाद में क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार का गठन हुआ। इसके अध्यक्ष सुबोध कांत सहाय बने। सचिव आदित्य वर्मा हैं। उन्होंने क्रिकेट को लेकर जो लड़ाई लड़ी, वह जग-जाहिर है। आदित्य वर्मा ने लड़ाई तो शुरू की बिहार क्रिकेट को लेकर लेकिन फिर आइपीएल और एन श्रीनिवासन को भी अदालत में घसीट ले गए। अदालत ने उनकी पहल के बाद ही पहले श्रीनिवासन को चलता किया और फिर उनकी टीम चेन्नई को आइपीएल से दो साल के लिए बाहर कर दिया। लेकिन इस लड़ाई में बिहार का मामला पीछे छूट गया। वर्मा अब फिर से बिहार के मामले को उठा रहे हैं। बोर्ड की नींद कब टूटेगी फिलहाल इस पर संशय है। यह बात दीगर है कि बोर्ड ने बिहार के मामले को देखने के लिए तदर्थ समिति गठित करने का फैसला किया है।

उधर बिहार में अब क्रिकेट खिलाड़ियों का धैर्य चूकने लगा है। वे अब आरपार की लड़ाई के मूड में दिख रहे हैं। खिलाड़ियों का मानना है कि बहुत सियासत हो चुकी। सियासत बंद हो और खेल शुरू हो। लेकिन खेल शुरू होना तो बोर्ड पर ही निर्भर है। हाल ही में पटना के मोईनुल हक स्टेडियम में एक मैच के दौरान खिलाड़ियों ने प्रदर्शन किया।

लेकिन इस बीच कई शूरवीर और पैदा हो गए। सियासत से जुड़े मृत्युंजय तिवारी ने बिहार प्लेयर्स एसोसिएशन का गठन किया था। इसके बैनर तले पिछले महीने कोलकाता में डालमिया के घर के बाहर धरना दिया गया था। अगले हफ्ते एसोसिएशन ने बोर्ड सचिव अनुराग ठाकुर के घर को घेरने की धमकी भी दी है। लेकिन तदर्थ समिति बनने के बाद इसका रुख क्या होगा यह साफ नहीं है। इतना ही नहीं बिहार में क्रिकेट के नाम पर कई और दुकानें खुल गर्इं हैं। हाल ही में बिहार क्रिकेट संघर्ष मोर्चा और बिहार क्रिकेट बचाओ समिति का गठन किया गया। दोनों का मकसद बिहार में फिर से क्रिकेट बहाल करना है। बिहार क्रिकेट संघर्ष मोर्चा से कई क्रिकेट खिलाड़ी जुड़े हैं। दूसरे संगठन में सियासी रसूख वाले लोग ज्यादा हैं।

क्रिकेट की बदहाली के बावजूद बिहार में कई समांतर क्रिकेट संघ चलाए जा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें भी वही लोग शामिल हैं जो एसोसिएशन ऑफ बिहार क्रिकेट या क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार से जुड़े हैं। दूसरी बात यह कि इन संघों का जिस तरह से नाम रखा गया है उससे साफ लगता है कि क्रिकेट के नाम पर दुकानदारी करने की ही कोशिश ज्यादा हो रही है।

बिहार में इन दिनों इंडोर क्रिकेट एसोसिएशन, बिहार टी-20 क्रिकेट संघ, बिहार टी-10 क्रिकेट संघ और बिहार महिला ट्वंटी-20 एसोसिएशन शामिल है। एक तरफ जहां प्रदेश में हेमन कप नहीं हो रहे हैं और पटना में सीनियर व जूनियर डिवीजन क्रिकेट लीग बंद है वहां इस तरह के ‘जेबी क्रिकेट एसोसिएशन’ बिहार में क्रिकेट का और कबाड़ा कर रहे हैं। यह सही है कि बिहार इकलौता राज्य नहीं है जहा समांतर संघ है, कई और राज्य हैं जहां इसी तरह की लड़ाई चल रही है पर बोर्ड उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं करता है लेकिन बिहार को इसी वजह से मान्यता नहीं देकर बिहार के खिलाड़ियों के साथ इंसाफ तो नहीं ही कर रहा है।

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