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नमन: ताउम्र हॉकी के लिए जिए बलबीर सिंह ‘सीनियर’

तीन ओलंपिक में स्वर्ण विजेता भारतीय टीम के दिग्गज बलबीर सिंह ‘सीनियर’ का हॉकी के प्रति पहला लगाव तब हुआ जब उन्होंने 1936 ओलंपिक में हॉकी का गोल्ड जीतने वाली भारतीय टीम पर बनी फिल्म को देखा।

Author नई दिल्ली | Published on: May 28, 2020 3:23 AM
भारतीय हाकी टीम के वरिष्ठ सदस्य और खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर।

आत्माराम भाटी
भारतीय खेल जगत को लगभग चार सप्ताह के अंतराल के बीच दूसरा सदमा लगा है। अपने शानदार खेल से देश का नाम रोशन करने वाले देश के महान खिलाड़ियों की फेहरिस्त में शामिल भारतीय हॉकी के बादशाह बलबीर सिंह ‘सीनियर’ 25 मई को इस दुनिया को अलविदा कह गए। इनसे पहले 30 अप्रैल को फुटबॉल के दिग्गज खिलाड़ी चुन्नी गोस्वामी का भी निधन हो गया था।

पंजाब के हरिपुर खालसा में 10 अक्तूबर, 1924 को स्वतंत्रता सेनानी दलीप सिंह दोसांझ के घर पैदा हुए बलबीर सिंह का हॉकी के प्रति लगन व मेहनत का कमाल ही था कि इनका नाम आधुनिक ओलंपिक इतिहास के 16 महानतम ओलंपियन खिलाड़ियों में शामिल किया गया। यही नहीं हॉकी के बादशाह ने 1952 हेलसिंकी ओलंपिक के फाइनल में नीदरलैंड के खिलाफ सबसे ज्यादा पांच गोल करने का रेकॉर्ड बनाया जो ओलंपिक के इतिहास में आज भी कायम है। इस खिताबी मुकाबले में इनके गोल के दम पर भारत ने 6-1 से जीत दर्ज कर स्वर्ण पदक जीता था।

तीन ओलंपिक में स्वर्ण विजेता भारतीय टीम के दिग्गज बलबीर सिंह ‘सीनियर’ का हॉकी के प्रति पहला लगाव तब हुआ जब उन्होंने 1936 ओलंपिक में हॉकी का गोल्ड जीतने वाली भारतीय टीम पर बनी फिल्म को देखा। नेशनल कॉलेज लाहौर में खेलने के दौरान खालसा कॉलेज अमृतसर के हॉकी प्रशिक्षक हरबैल सिंह की नजर इन पर पड़ी। उन्होंने बलबीर को अपना नामांकन खालसा कॉलेज में कराने को कहा। बलबीर अपने पिता से बातचीत के बाद लाहौर से खालसा कॉलेज आ गए। इसके बाद इन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उन्होंने 1943 से 1945 तक पंजाब यूनिवर्सिटी टीम की कप्तानी संभालते हुए टीम को चैंपियन बनाया। पंजाब पुलिस और पंजाब राज्य की टीम को अपने खेल के दम पर नेशनल में अनेक बार स्वर्ण पदक दिलवाए। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के बाद भारत में सबसे ज्यादा हॉकी खेल में सम्मान पाने वाले बलबीर सिंह सीनियर ने अपना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहला मैच मई 1947 में भारतीय टीम के श्रीलंका दौरे पर खेला था।

हॉकी के प्रति जुनून, मेहनत, लगन और अपनी ताकत के दम पर उन्होंने एक साल बाद ही 1948 लंदन ओलंपिक की भारतीय टीम में जगह पक्की कर ली। इसके पहले ही मैच में धमाल मचाते हुए उन्होंने अर्जेंटीना के खिलाफ भारतीय टीम को 9-1 से मिली जीत में छह गोल कर सनसनी फैला दी। फाइनल में भी ब्रिटेन के सामने दो गोल कर भारत को 4-0 से जीतने में महत्त्वपूर्ण रोल अदा किया।

12 अगस्त, 1948 को मिली इस जीत के बाद बलबीर सिंह ने कहा कि ब्रिटेन से असली आजादी का आनंद अब आया है। भारतीय तिरंगा पदक समारोह में ऊपर जा रहा था तो उन्हें पिता के वो शब्द याद आए कि ‘मेरा झंडा, मेरा देश’ यानी स्वतंत्र भारत का झंडा अंतरराष्ट्रीय स्तर पहली बार हवा में लहरा रहा था।

बलबीर सिंह के खेल का जादू 1952 के हेलसिंकी ओलिंपिक में भी जारी रहा। जहां उन्होंने सेमी फाइनल में ब्रिटेन के सामने हैट्रिक बनाई और अपनी उपकप्तानी पर खरे उतरते हुए फाइनल में नीदरलैंड के खिलाफ पांच गोल दाग कर भारत की 6-1 से जीत में अहम भूमिक निभाई।

1956 मेलबर्न ओलंपिक में टीम की बागडोर बलबीर सिंह के हाथ में थी। पहले ही मैच में अफगानिस्तान के खिलाफ पांच गोल ठोक डाले। सेमी फाइनल में जर्मनी और फाइनल में पाकिस्तान को 1-0 से हराते हुए देश के लिए छठा स्वर्ण पदक जीता। बलबीर सिंह 1958 में तोक्यो एशियाई खेलों में रजत पदक जीतने वाली टीम में भी थे। इनके 11 साल के अंतरराष्ट्रीय करिअर का समापन मई, 1958 में हुआ।

संन्यास के बाद भी सक्रिय थे
बतौर खिलाड़ी संन्यास के बाद भी हॉकी के प्रति उनका प्यार बना रहा। वे विश्व कप हॉकी 1971 में कांस्य और 1975 में स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम के मैनेजर रहे। 1982 दिल्ली एशियाई खेलों के उद्घाटन के अवसर पर मशाल जलाने का अवसर उन्हें दिया गया। पंजाब स्टेट स्पोर्ट्स काउंसिल और डायरेक्टर आॅफ स्पोट्स पंजाब के सचिव पद पर रहते हुए इन्होंने युवाओं को खेलों से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।

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