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सात साल में शीर्ष पर अवनि लेखरा

मात्र सात साल के खेल सफर में अवनि ने विश्व रैंकिंग में शीर्ष पायदान पर पहुंच कर न केवल अपना बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित कर नया इतिहास रच दिया।

अवनि लेखरा।

आत्माराम भाटी

कहते हैं कि जब मन में कुछ हटकर करने का जज्बा पैदा कर लें तो परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हो आपको नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। इसी का उदाहरण हमारे सामने है तोक्यो पैरालंपिक में देश को स्वर्ण व कांस्य पदक दिलवाने वाली पैरा निशानेबाज अवनि लेखरा।

अवनि ने अपने नाम जिसका अर्थ पृथ्वी होता है, उसके अनुरूप जून 2022 माह के अंत में विश्व स्तर पर बेहतरीन निशानेबाजी से अपनी धाक जमाते हुए आर 2 महिलाओं की 10 मीटर एअर राइफल स्टैंडिंग एसएच 1 में और आर 8-50 मीटर राइफल थ्री पोजीशन स्पर्धा में मात्र सात साल के खेल सफर में विश्व रैंकिंग में शीर्ष पायदान पर पहुंच कर न केवल अपना बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित कर नया इतिहास रच दिया।

8 नवंबर 2001 को जयपुर में पैदा हुई और अपने जीवन के 21वें वसंत में चल रही अवनि ने जून माह के प्रथम सप्ताह में फ्रांस में आयोजित पैरा निशानेबाजी विश्व कप प्रतियोगिता में आर2-10 मीटर एअर राइफल महिला एसएच 1 में 250.6 अंक के विश्व रेकार्ड के साथ स्वर्ण पदक अपनी झोली में डाला। तभी यह पक्का हो गया था कि अवनि के लिए शीर्ष पद इंतजार कर रहा है। और माह के अंत में जब ताजा रैंकिंग जारी हुई तो यह उपलब्धि अवनि के नाम हो गई और उपलब्धि पाने वाले हर खिलाड़ी का रूबरू हौसला बढ़ाने वाले प्रधानमंत्री के साथ पूरे देश के हर क्षेत्र की हस्ती ने अवनि लेखरा को बधाई दी।

पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहने वाली अवनि ही नहीं उसके माता-पिता ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उसकी लाडली एक दुर्घटना में वील चेयर पर आ जाएगी और जीवन की इस बड़ी शारीरिक त्रासदी को अपने हौसले से परास्त कर अपने सटीक निशाने से देश के नाम ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज कर देगी और युवाओं व महिलाओं के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा साबित होगी।

मात्र 11 साल की उम्र में अपने पिता के साथ जयपुर से धौलपुर जाते समय एक हादसे में रीढ़ की हड्डी टूटने के बाद वील चेयर पर आने के बाद अवनि काफी अवसाद में चली गईं। चलने फिरने में असमर्थता के कारण अपने को कमरे में बंद रखने लगी। मगर पिता प्रवीण व माता श्वेता से अपनी लाडली का यह दुख देखा नहीं गया और पिता ने अवनि को इस संकट से उबारने के लिए खेलों से जोड़ने का निर्णय किया।

अवनि ने जीवन की इस जबरदस्त अनहोनी को परास्त करने के लिए पिता की इच्छा के अनुरूप खेलों से जुड़ने का निर्णय किया। और देश को ओलिंपिक में पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक दिलवाने वाले अभिनव बिंद्रा की जीवनी पढ़ी तो निशानेबाजी से जुड़ने का निर्णय लिया।

अभिनव बिंद्रा को अपना आदर्श मानकर 2015 में पहली बार जगतपुरा स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स में निशानेबाजी का अभ्यास शुरू कर दिया। पिता ने घर मे ही टारगेट व जिम स्थापित कर दिया ताकि उनकी लाडली पूरे जोश के साथ बिना परेशानी के निरन्तर अभ्यास कर सके। इसके बाद अवनि ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पहले राज्य, फिर राष्ट्रीय और उसके बाद दुबई में पैरा शूटिंग विश्व कप में रजत पदक जीत सभी खेल प्रेमियों का ध्यान अपनी और खींचा। उसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने सटीक निशानों से लगातार जीत के रथ पर सवार होकर देश के नाम पदक करने लगी। तोक्यो में स्वर्ण और कांस्य जीतने के बाद वो पूरे देश का जाना पहचाना नाम बन गईं। आज अवनि देश की ही नहीं पूरी दुनिया की नंबर एक पैरा निशानेबाज बन गई है।

जहां तक ओलिंपिक की बात करे तो भारत ने सवा सौ साल के ओलिंपिक इतिहास में उतनी सफलता नहीं पाई, जितनी पैरा खिलाड़ियों ने पिछले दो पैरालंपिक में पाई है। तोक्यो में जहां मुख्य ओलिंपिक में हमारे खिलाड़ियों ने मात्र सात पदक जीते, वहीं पैरा खिलाड़ियों ने 19 पदक जीत पहली बार इतने पदक देश की झोली में डाले। इसमें अवनि लेखरा के योगदान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। जबकि 2016 पैरालंपिक में एक स्वर्ण सहित चार पदक ही जीत पाए थे।

जिस तरह से मात्र सात साल के खेल करिअर में अवनि ने अपनी शारिरिक अपंगता को पछाड़कर जो उपलब्धियां प्राप्त की है आज वे देश की बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है। राजस्थान सरकार ने तो अवनि को बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ परियोजना का ब्रांड एंबेसडर बनाया हुआ है। निश्चित रूप से पुरुषों में देवेंद्र झांझरिया और मरियप्पन थांगवेलु में पैरालंपिक में स्वर्ण जीत देश का नाम रोशन किया तो महिलाओं में यही इतिहास अवनि ने रचा है और इसके लिए उसकी जितनी तारीफ की जाए कम होगी। सलाम अवनि लेखरा के जज्बे व साहस को।

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