खेलों की दुनिया में सफलता की कहानियां अक्सर उन जगहों से निकलकर आती हैं, जहां सुविधाओं का सबसे ज्यादा अभाव होता है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव की भारोत्तोलक ज्ञानेश्वरी यादव की। एक साधारण-सी व्यायामशाला में प्लाई के बोर्ड पर वजन उठाने से शुरू हुआ सफर अब एशियन गेम्स जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुका है।

जहां कभी वेटलिफ्टिंग के लिए न ढंग का प्लेटफॉर्म था, न आधुनिक सुविधाएं, वहां की रहने वाली ज्ञानेश्वरी यादव ने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में 199 किग्रा वजन उठाकर रजत पदक जीता। इस उपलब्धि ने ज्ञानेश्वरी यादव को न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, बल्कि उनके इलाके में भारोत्तोलन (वेटलिफ्टिंग) को भी नई पहचान मिली।

अब नई वेट कैटेगरी में खुद को ढाल चुकीं ज्ञानेश्वरी के सामने एशियन गेम्स की बड़ी चुनौती है, जहां चीन और नॉर्थ कोरिया जैसे देशों के खिलाड़ियों से उनका सामना होगा। कॉमनवेल्थ का अनुभव साथ है और लक्ष्य है- अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना, पर्सनल बेस्ट सुधारना और एशियाई खेलों में देश का नाम रोशन करना।

ज्ञानेश्वरी यादव का चुनौतियों भरा सफर

ज्ञानेश्वरी का सफर चुनौतियों से भरा रहा है। राजनांदगांव जैसी जगह में पहले वेटलिफ्टिंग का कोई खास चलन नहीं था, वहां एक लड़की का इस खेल में आना ही अपने आप में एक बड़ी बात थी। शुरुआती दिनों को याद करते हुए ज्ञानेश्वरी बताती हैं कि उनके पास ट्रेनिंग के लिए कोई खास प्लेटफॉर्म नहीं था। वह एक प्लाई के बोर्ड के किनारे रबर लगाकर वजन उठाती थीं। कोई प्रॉपर वेटलिफ्टिंग सेटअप नहीं था।

पटियाला स्थित नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (एनएसएनआईएस) में ट्रेनिंग के बाद ज्ञानेश्वरी ने जनसत्ता को बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने के बाद उन्हें पहली बार पता चला कि असली वेटलिफ्टिंग प्लेटफॉर्म कैसा होता है। इसके बाद जब वह इंटरनेशनल लेवल पर पहुंचीं और नेशनल कैंप का हिस्सा बनीं, तब उन्हें समझ आया कि एक एथलीट को बेहतर प्रदर्शन के लिए किस तरह की सुविधाओं की जरूरत होती है।

दिलचस्प यह है कि जिस व्यायामशाला से ज्ञानेश्वरी का सफर शुरू हुआ, वहां उनके पिता भी कभी बॉडीबिल्डिंग किया करते थे। पहले वहां बॉडीबिल्डिंग होती थी, बाद में इसे वेटलिफ्टिंग के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। यहीं से ज्ञानेश्वरी की जिंदगी में भारोत्तोलन ने जगह बनाई।

सुविधाओं की कमी के बावजूद ज्ञानेश्वरी के हौसले में कोई कमी नहीं आई। उनकी यही लगन उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स तक ले गई, जहां उन्होंने 199 किलोग्राम वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया और देश का सिर फख्र से ऊंचा कर दिया।

अब एशियन गेम्स की बड़ी चुनौती

कॉमनवेल्थ गेम्स में शानदार प्रदर्शन के बाद अब ज्ञानेश्वरी की नजर एशियन गेम्स पर है। एशिया में वेटलिफ्टिंग का स्तर काफी ऊंचा है। चीन, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के खिलाड़ी चुनौती पेश करते हैं। ज्ञानेश्वरी मानती हैं कि एशियाई स्तर पर मुकाबला काफी कठिन होता है, लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों के अनुभव से उनमें आत्मविश्वास आया है।

ज्ञानेश्वरी बताती हैं कि कॉमनवेल्थ गेम्स में अलग-अलग देशों के खिलाड़ियों के साथ मुकाबला करने से उन्हें यह समझने का मौका मिला कि बड़े मंच का दबाव कैसा होता है। उनका मानना है कि यह अनुभव एशियन गेम्स में उनके काम आएगा।

199 किग्रा से आगे बढ़ने का लक्ष्य

कॉमनवेल्थ गेम्स में ज्ञानेश्वरी का पर्सनल बेस्ट 199 किग्रा है। अब उनकी कोशिश इस प्रदर्शन को बेहतर करने की है। हालांकि, वह कोई बड़ा आंकड़ा तय करने के बजाय छोटे-छोटे सुधार पर ध्यान दे रही हैं। स्नैच में उनका पर्सनल बेस्ट 88 किग्रा और क्लीन एंड जर्क में 111 किग्रा है। ज्ञानेश्वरी के लिए दोनों में एक-एक किलोग्राम का सुधार भी बड़ी उपलब्धि होगी।

ज्ञानेश्वरी मानती हैं कि अगर वह स्नैच और क्लीन एंड जर्क दोनों में 1-1 किलोग्राम भी अधिक वजन उठा लेती हैं तो यह उनके लिए अहम होगा। अपने प्रदर्शन में सुधार करने के लिए ज्ञानेश्वरी यादव पटियाला में कोचिंग कैंप में दिन-रात पसीना बहा रही हैं।

48-49 से 53 किग्रा वर्ग तक

ज्ञानेश्वरी पहले 48-49 किग्रा वर्ग में प्रतिस्पर्धा करती थीं। अब वह 53 किग्रा वर्ग में खेल रही हैं। नई वेट कैटेगरी में उन्हें करीब डेढ़ साल हो चुका है। अब वह इसमें सहज महसूस करती हैं। ज्ञानेश्वरी का सामान्य वजन करीब 52 किग्रा रहता है। इसका मतलब है कि वह इस कैटेगरी में भी अपने नैचुरल वजन के आसपास ही रहती हैं।

मीराबाई चानू से प्रेरणा और नई चुनौती

इस बदलाव ने भारतीय वेटलिफ्टिंग में घरेलू प्रतिस्पर्धा को भी दिलचस्प बना दिया है। मीराबाई चानू भी 53 किग्रा भार वर्ग वाली कैटेगरी में खेलती हैं। हालांकि, ज्ञानेश्वरी के लिए मीराबाई सिर्फ एक संभावित प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। ज्ञानेश्वरी बताती हैं कि ओलंपिक मेडलिस्ट मीराबाई चानू हमेशा से एक प्रेरणा रही हैं।

ज्ञानेश्वरी इसे दबाव नहीं, बल्कि सीखने का एक अवसर मानती हैं। ज्ञानेश्वरी को बर्मिंघम में मीराबाई चानू के साथ ट्रेनिंग करने का मौका मिला था। ज्ञानेश्वरी यादव बताती हैं, ‘‘दीदी का अनुशासन, कड़ी मेहनत और समर्पण ही उन्हें शीर्ष स्तर पर बनाए रखे हुए है। उन्हें देखकर मैं अपनी कमियों को सुधारती हूं।’’

संघर्ष से मिली सफलता और एक नई पीढ़ी का उदय

ज्ञानेश्वरी की सफलता ने सिर्फ उनके जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे राजनांदगांव के खेल माहौल को बदल कर रख दिया है। कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल जीतने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें डीएसपी (DSP) के पद से नवाजा और 30 लाख रुपये की सम्मान राशि भी दी। आज ज्ञानेश्वरी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और अपने पिता का सहारा बन चुकी हैं। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद वह बदलाव है जो वह अपने पीछे छोड़ रही हैं।

जिस शहर में वेटलिफ्टिंग को कोई नहीं जानता था, आज वहां छोटी-छोटी लड़कियां ज्ञानेश्वरी को देखकर कहती हैं, ‘‘हमें दीदी जैसा बनना है।’’ राष्ट्रमंडल खेलों में ज्ञानेश्वरी के रजत पदक ने सरकार और प्रशासन का ध्यान भी इस ओर खींचा है। अब वहां के बच्चों के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है।

ज्ञानेश्वरी यादव की यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं है, बल्कि यह साबित करती है कि अगर इरादे फौलादी हों तो प्लाई के बोर्ड से शुरू हुआ सफर भी दुनिया के सबसे बड़े मंच तक पहुंच सकता है।

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भारत के लिए वेटलिफ्टिंग में अभी तक 10 में से 6 मेडल कॉमनवेल्थ खेलों में आ चुके हैं। ज्ञानेश्वरी यादव ने सिल्वर मेडल जीतते हुए अपना नाम इतिहास के पन्नों पर अमर किया था। उनकी कहानी बेहद खास है और वह एक परिश्रम भरे जीवन से यहां तक पहुंची हैं। (पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें)