खेल की दुनिया में कई खिलाड़ियों की कहानी इस तरह की है कि उन्होंने सपना किसी और खेल में करियर बनाने का देखा, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। ऐसी ही है एशियन गेम्स 2026 में हिस्सा लेने जा रहे भारतीय निशानेबाज मैराज अहमद खान की कहानी। मैराज का सफर बल्ले से शुरू हुआ लेकिन उन्होंने चमक बिखेरी बंदूक से। एक समय था जब मैराज अहमद खान एक बल्लेबाज के रूप में क्रिकेट में नाम कमाने का सपना देखते थे। उनकी किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था और अब वह चौथी बार एशियाई खेलों में हिस्सा लेने के लिए तैयार हैं।
मैराज खेल जगत में आज भी नाम कमा रहे हैं, बस अंतर इतना है कि अब उनके हाथ में बल्ले के बजाय बंदूक है। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के खुर्जा से लेकर दुनिया भर के निशानेबाजी रेंज तक, मैराज की यात्रा उन्हें उन जगहों पर ले गई है जिनकी उन्होंने खेल की दुनिया में कदम रखते समय कभी कल्पना भी नहीं की थी। जापान के आइची-नागोया में होने वाले एशियाई खेलों में वह घुड़सवार श्रुति वोरा के बाद भारतीय दल के दूसरे सबसे उम्रदराज सदस्य होंगे।
वीरेंद्र सहवाग के साथ खेल चुके मैराज
मैराज आज निशानेबाजी में जलवा बिखेर रहे हैं लेकिन एक समय ऐसा भी था जब निशानेबाजी से उनका कोई खास नाता नहीं था। मैराज ने पीटीआई से कहा,”जब 1994 में यह सब शुरू हुआ, तब मैं क्रिकेट खेल रहा था।” बता दें कि मैराज बाएं हाथ के शीर्ष क्रम के बल्लेबाज थे, जो आमतौर पर तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करने आते थे। उन्होंने 1996 में सीके नायडू और वीनू मांकड़ ट्रॉफी में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। अंतर-विश्वविद्यालय क्रिकेट भी मैराज ने खेला। शुरुआती दिनों में वह दिग्गज क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग के साथ भी खेले थे।
मैराज ने बताया,”मैं सहवाग के साथ खेला हूं और उनके साथ काफी नेट प्रैक्टिस की है। उन्होंने हमारे साथ सिर्फ एक मैच खेला था क्योंकि उसी साल वह भारत की तरफ से खेले।” क्रिकेट जहां उनके लिए जुनून था, वहीं निशानेबाजी भी उन्हें धीरे-धीरे आकर्षित करने लगी। मैराज के लिए बंदूक कोई अनजान चीज नहीं थी। उनका कहना है कि उनका परिवार जमींदार था और वे हमेशा से ही बंदूक रखते आए थे।
मैराज की किस्मत ने कैसे ली करवट
युवावस्था में उन्होंने एयर राइफल और प्वाइंट 22 राइफल शूटिंग में भी हाथ आजमाया था और यहां तक कि बुलंदशहर में जिला स्तरीय प्रतियोगिता में भी भाग लिया था, जहां उन्होंने 30 रुपये की पुरस्कार राशि जीती थी। मैराज ने कहा,”मैंने उस पैसे से क्रिकेट का बल्ला खरीदा था।” दिल्ली आने के बाद ही नियति ने उन्हें खेल के एक अलग रास्ते की ओर मोड़ दिया।
मैराज अक्सर सप्ताहांत अपने चचेरे भाई के साथ बिताते थे, जो भारतीय वायु सेना में ग्रुप कैप्टन और वायु सेना खेल नियंत्रण बोर्ड में एक वरिष्ठ अधिकारी थे। एक दिन उन्होंने अपने चचेरे भाई को अपनी बंदूक साफ करते हुए देखा। उन्होंने कहा,”मैंने उनसे पूछा कि वे कहां जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली के करणी सिंह शूटिंग रेंज में राष्ट्रीय प्रतियोगिता है। मैं भी उनके साथ वहां चला गया।”
उन्होंने वहां जो कुछ देखा उससे वह मंत्रमुग्ध हो गए। वहां कई दिग्गज निशानेबाज थे। इसके बाद मैराज का निशानेबाजी के प्रति लगाव बढ़ता गया। अगले कुछ वर्षों तक मैराज ने ट्रैप शूटिंग और स्कीट शूटिंग दोनों में हाथ आजमाया। इसके बाद 1999 में चेन्नई में एक प्रतियोगिता में मैराज का मुकाबला स्कीट शूट-ऑफ में रोंजन सोढ़ी से हुआ, जिन्होंने बाद में डबल ट्रैप में एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीता और प्रतिष्ठित खेल रत्न पुरस्कार हासिल किया।
मैराज अहमद ने कहा,”मैं पहले दो निशाने चूक गया। मुझे लगा कि वह (रोंजन) जीत जाएगा। लेकिन वह भी अपने दोनों निशाने नहीं लगा सका। अगले दौर में मैं जीत गया। उसके बाद स्कीट निशानेबाजी मेरी जिंदगी बन गई। मैंने फिर कभी ट्रैप गन नहीं उठाई और 1999 में पूरी तरह से स्कीट शूटिंग को अपना लिया। मैं आज जो कुछ भी हूं वह स्कीट निशानेबाजी के कारण हूं।” इस फैसले ने उनकी जिंदगी बदल दी।
मैराज 2016 के रियो ओलंपिक में शॉटगन स्कीट स्पर्धा में ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाले पहले भारतीय निशानेबाज बने थे। उन्होंने दो ओलंपिक खेलों में भाग लिया तथा विश्व कप में स्वर्ण और रजत सहित कई पदक जीते। मैराज 2018 में जकार्ता और 2022 में हांगझोऊ एशियाई खेलों में भाग लेने से चूक गए थे और अब वह जापान में इसकी भरपाई करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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