कल्पना कीजिए, 40 फीट लंबे और करीब आठ फीट चौड़े कंटेनर में चार एथलीट रह रहे हों। कमरे की तरह सजा यह कंटेनर पूरी तरह एयरकंडीशंड है। इसमें बेड, पैंट्री, वार्डरोब, बाथरूम और अलग शौचालय तक की सुविधा है।

सुनने में यह किसी होटल के कमरे जैसा लग सकता है, लेकिन एशियाई खेलों के दौरान भारतीय खिलाड़ियों के लिए यह उनका अस्थायी घर होगा। जापान के आइची-नागोया में 19 सितंबर से चार अक्टूबर तक होने वाले 20वें एशियाई खेलों में खिलाड़ियों के ठहरने की व्यवस्था इस बार कुछ अलग होने वाली है।

खिलाड़ियों को होटल के साथ-साथ कंटेनरों और क्रूज में भी ठहराया जाएगा। ऐसी व्यवस्था में अचानक ढलने के बजाय भारतीय एथलीट मानसिक और व्यावहारिक रूप से पहले से तैयार रहें, इसके लिए खेल मंत्रालय ने पटियाला के नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (एनएसएनआईएस) में एशियाई खेलों के कंटेनर का हूबहू मॉडल तैयार कराया है।

कंटेनरों में खिलाड़ियों को उसी तरह रहने का अनुभव कराया जा रहा है, जैसा उन्हें जापान में मिल सकता है। मकसद सिर्फ सुविधा समझाना नहीं, बल्कि उन्हें छोटी और सीमित जगह में रहने के लिए पहले से सहज करना भी है, ताकि क्लॉस्ट्रोफोबिया जैसी परेशानी का सामना न करना पड़े।

खेल गांव के बजाय कंटेनर और क्रूज

आमतौर पर एशियन गेम्स या ओलंपिक गेम्स जैसे बड़े खेल आयोजनों में खिलाड़ियों के लिए खेल गांव तैयार किया जाता है। इतने बड़े आयोजन के लिए बड़ी संख्या में इमारतें और जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार करना मेजबान देश के सामने एक बड़ी चुनौती होती है। इसमें काफी खर्च भी होता है। साथ ही यह भी तय नहीं होता कि आयोजन खत्म होने के बाद इन सुविधाओं का पूरी तरह इस्तेमाल हो पाएगा या नहीं।

शायद यही वजह है कि आइची-नागोया एशियाई खेलों में खिलाड़ियों के ठहरने के लिए इस बार अलग व्यवस्था की गई है। होटल के अलावा कंटेनरों और क्रूज में भी खिलाड़ियों को ठहराया जाएगा। भारतीय दल के लिए यह व्यवस्था नई है, इसलिए भारत ने उन्हें पहले से इसका अनुभव कराने का फैसला किया।

पटियाला में तैयार किए गए दो कंटेनर

पटियाला स्थित एनएसएनआईएस में ऐसे दो कंटेनर तैयार किये गए हैं। इनमें से एक बॉयज हॉस्टल और दूसरा गर्ल्स हॉस्टल में रखा गया है। इन्हें बिल्कुल उसी तरह तैयार किया गया है, जैसे आइची-नागोया में एथलीटों को ठहराने के लिए तैयार किए गए हैं।

एनएसएनआईएस के डिप्टी डायरेक्टर जनरल विनीत कुमार ने बताया कि खिलाड़ियों को इस तरह की जगह में पहले से रहने का अनुभव कराने का मकसद उन्हें क्लॉस्ट्रोफोबिया का शिकार होने से बचाना है।

क्या होता है क्लास्ट्रोफोबिया?

क्लॉस्ट्रोफोबिया एक प्रकार का एंग्जायटी डिसऑर्डर है। इसमें व्यक्ति को बंद, संकरी या छोटी जगहों में जाने से अत्यधिक डर लगता है। ऐसे लोगों को यह डर भी सताता है कि वे उस छोटी जगह से बाहर नहीं निकल पाएंगे या इतनी छोटी से जगह में उनका दम घुट जाएगा या वे वहां फंस जाएंगे।

40 फीट लंबा कंटेनर, 4 खिलाड़ियों के लिए जगह

पटियाला में तैयार किए गए कंटेनर की लंबाई 40 फीट और चौड़ाई करीब आठ फीट है। इसमें एक साथ चार एथलीट रह सकते हैं। कंटेनर पूरी तरह एयरकंडीशंड है और इसमें चार बेड लगाए गए हैं। खिलाड़ियों के सामान के लिए दो छोटी-छोटी वार्डरोब भी हैं। इसकी ऊंचाई इस तरह रखी गई है कि जरूरत पड़ने पर एथलीट उस पर कपड़े रखकर आसानी से प्रेस कर सकें। इसके अलावा कंटेनर में पैंट्री भी है। मुंह धोने और मंजन करने के लिए अलग जगह है, नहाने के लिए अलग और शौचालय भी अलग बनाया गया है।

अलग-अलग वॉशरूम क्यों?

तीनों सुविधाओं को एक ही कॉमन वॉशरूम में रखने के बजाय अलग-अलग बनाने के पीछे भी खिलाड़ियों का समय बचाने की सोच है। विनीत कुमार ने इसे समझाते हुए कहा कि मान लीजिए किसी खिलाड़ी को मंजन करना है और उसी समय दूसरे को नहाना है। अगर एक ही वॉशरूम होगा तो उस समय एक ही व्यक्ति उसका इस्तेमाल कर पाएगा। अलग-अलग व्यवस्था होने पर दोनों खिलाड़ी एक साथ अपनी जरूरत पूरी कर सकते हैं। इससे उनका समय बचेगा।

पहले सुनी तो दिमाग में चलने लगीं ‘अजीब-अजीब बातें’

कंटेनर में रहना खिलाड़ियों के लिए सिर्फ एक नई जगह में रहने का अनुभव नहीं है, बल्कि इसके लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करना भी जरूरी है। पटियाला में एक रात कंटेनर में रहने के बाद भारतीय शॉटपुटर तेजिंदर पाल सिंह तूर का अनुभव बताता है कि यह तैयारी कितनी उपयोगी हो सकती है।

जकार्ता और हांगझू एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीत चुके तेजिंदर पाल सिंह तूर ने बताया कि जब पहली बार उन्हें पता चला कि एशियाई खेलों के दौरान कंटेनरों में रहना होगा तो उनके दिमाग में तरह-तरह की बातें चलने लगी थीं, लेकिन पटियाला में कंटेनर में रुकने के बाद उनकी चिंता दूर हो गई। अब वह मानसिक तौर पर पहले ही इतनी छोटी जगह में रहने के लिए तैयार हो चुके हैं। तूर के मुताबिक, यहां रुकने के बाद वह बिल्कुल रिलैक्स हैं।

एक रात ने बदल दी किट की तैयारी

कंटेनर में रहने का असर सिर्फ मानसिक तैयारी तक सीमित नहीं रहा। तूर ने बताया कि पहले वह एशियाई खेलों के लिए ज्यादा बड़ी किट ले जाने की सोच रहे थे, लेकिन पटियाला में कंटेनर देखने और उसमें एक रात बिताने के बाद अब वह काफी सेलेक्टेड किट ही ले जाएंगे।

हाल ही में ग्लासगो में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिलाओं की डिस्कस थ्रो में 58.65 मीटर का थ्रो कर ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाली सीमा कालीरमना ने भी कंटेनर को लेकर अपना अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि वह कंटेनर में दो रात रुकी हुईं हैं।

सीमा कालीरमना ने बताया, पहली रात तो ठीक से नींद नहीं आई, लेकिन दूसरी रात ठीक लगा। इसमें ठहरने से आइडिया लग गया। यह पूरी तरह से दिमाग का खेल है। दिमाग में कुछ भी नेगेटिव नहीं आने देना है। छोटी जगह में ठहरने का फोबिया नहीं होने वाला। दिमाग को अच्छा लेकर जाना है तभी मेडल जीत पाएंगे।

कुल मिलाकर कहें तो एशियाई खेलों में मैदान पर उतरने से पहले भारतीय एथलीटों को एक और तरह की तैयारी से गुजरना पड़ रहा है। जापान में जिस कंटेनर को उन्हें रहने की जगह बनाना होगा, उसका अनुभव उन्हें पटियाला में पहले ही करा दिया गया है।

पिता ड्राइवर, भाई की कमाई से भरी फीस, रग्बी में भी जीता कांस्य: एशियन गेम्स में हिस्सा लेने जा रहे भारतीय शूटर आकाश की कहानी

आकाश भारद्वाज अगले महीने से जापान में शुरू होने वाले एशियाई खेलों में हिस्सा लेने के लिए तैयार हैं। वह पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। उनके जीवन का सफर कठिनाइयों से भरा रहा है और एक समय ऐसा भी था जब वह शूटिंग नहीं रग्बी में मेडल जीतते थे। (आकाश का पूरा सफर जानने के लिए क्लिक करें)