स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के बुलावे पर पटियाला के नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स पहुंचने का मौका मिला तो वहां भारतीय एथलेटिक्स में डिस्कस थ्रो को नई ऊंचाई देने की कोशिश में जुटीं सीमा कालीरमना से बातचीत हुई। मैदान पर उनके सामने प्रदर्शन और पदक जीतने की चुनौती है, लेकिन एक मां के तौर पर उन्हें बेटे से दूर रहने का भावनात्मक दर्द भी झेलना पड़ता है।

ग्लासगो में आयोजित 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीत चुकीं सीमा की नजर अब जापान के आइची-नागोया में होने वाले एशियन गेम्स पर है। इसके लिए वह पटियाला में कड़ी मेहनत कर रही हैं। हरियाणा में भिवानी के दिनोद गांव में 25 फरवरी 1999 को जन्मीं सीमा कालीरमना ने बातचीत के दौरान बताया कि कई बार उनके मन में यह ख्याल आता है कि उन्होंने बेटे का बचपन छीन लिया, लेकिन देश के लिए मेडल जीतने का सपना उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है।

सवाल: कॉमनवेल्थ गेम्स के अपने एक्सपीरियंस के बारे में बताइए।

सीमा कालीरमना: कॉमनवेल्थ का एक्सपीरियंस काफी अच्छा था। हमारी फेडरेशन ने कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले पोलैंड में कैंप लगाया था ताकि हमें वेदर की अडप्टेशन हो जाए। फिर भी स्कॉटलैंड का वेदर थोड़ा ज्यादा ठंडा था। इस कारण सभी खिलाड़ियों को वार्म अप करने में थोड़ी सी परेशानी हो रही थी। जितना भी आप वार्म अप हो रहे थे, उतनी ही जल्दी ठंडे हो रहे थे। …तो कहीं ना कहीं यह एक थोड़ा सा था। अगर मौसम थोड़ा और बेहतर होता तो हम थोड़ा और बेहतर कर पाते।

सवाल: कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल जीतना आपकी जर्नी के एक्सपीरियंस कितना अहम था?

सीमा कालीरमना: सच पूछो तो मैंने यह नहीं सोचा था कि मेडल लेकर आऊंगी। मैंने सिर्फ यह सोचा था कि वहां पर अपना बेस्ट करके आऊंगी। मेडल आए ना आए यह बाद की बातें थी, लेकिन भगवान भी साथ था और सबकी दुआएं भी साथ थीं तो सौभाग्यवश मेडल जीता।

सवाल: आप मेडल लेकर आए, तो आपके बेटे रुद्र का क्या रिएक्शन रहा?

सीमा कालीरमना: उसने बोला था कि आप वहां से मेरे लिए जेसीबी लेकर आना। यह जो मुझे मोमेंटो दिया गया वह उसका खिलौना है। मैं जब घर आई तो उसको इतना पता था कि मम्मी का बहुत बड़ा-बड़ा मेडल आया है। उसको पता है कि जब दिल्ली गए तो मम्मी का स्वागत हुआ। वह बहुत खुश है। यह मेडल मेरे जीवन में बहुत कुछ चीजें बदलाव लेकर आया है और बहुत सारी खुशियां भी लेकर आया है।

सवाल: एशियन गेम्स को लेकर कुछ बताइए कि कैसी है तैयारी और वहां कितनी उम्मीद है?

सीमा कालीरमना: अभी सिल्वर कॉन्टिनेंटल टूर हुआ था जो कि कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद मेरा पहला कंपटीशन था, तो कॉमनवेल्थ गेम्स से आने के तुरंत एक दिन बाद ही हम एनआईएस पटियाला में आ गए थे। हम घर पर नहीं रुके। हम कोई स्वागत वगैरह में नहीं गए। …तो हमारा मुख्य ध्यान यही था कि हम एशियन गेम्स में मेडल लेकर आएंगे और अपना सर्वश्रेष्ठ करेंगे।

सीता कालीरमना: …तो सब की तैयारी उसी हिसाब से चल रही थी और सिल्वर कॉन्टिनेंटल टूर में भी मैंने अच्छा किया है। मैंने बुरा नहीं किया है। मैंने 57.44 मीटर दूर डिस्कस थ्रो किया। मैं उस समय पर भी लोड में थी और अब भी तैयारी उसी हिसाब से चल रही है कि हम एशियन गेम्स में अपना सर्वश्रेष्ठ करेंगे, प्रदर्शन अच्छा करेंगे और मेडल लेकर आएंगे।

सवाल: अन्य एथलीटों के मुकाबले आपकी जर्नी थोड़ी अलग रही है। आप मां भी हैं। क्या-क्या त्याग करने पड़े?

सीमा कालीरमना: मेरा तो यही मानना है किसी भी खिलाड़ी के जीवन में कोई भी चीज आसानी से नहीं मिलती है। उसको कहीं ना कुछ ना कुछ तो त्याग करना पड़ता है। मेरी जर्नी इसलिए अलग है, क्योंकि मैं एक मां भी हूं, लेकिन यह आपको कहीं ना कहीं बूस्ट अप भी करता है। सोचिए जब आपका बेटा या आपकी बेटी आपसे बोलेगी कि मम्मा आपको देश के लिए मेडल लेकर आना है तो वह कहीं न कहीं आपको ज्यादा बूस्ट अप करेगा।

सीमा कालीरमना: एक जुनून लेकर आता है कि हां अब मुझे करना है। …तो थोड़ा सा मुश्किल होता है, लेकिन इसी का नाम खेल है। अगर मैं बेटे को साथ रखती हूं तो उसको हर पांच मिनट में मुझे देखना पड़ता है। लगता है कि कहीं उसको चोट ना लग जाए। अभी वह मेरे पास 5-6 दिन रहकर गया है। अभी उसको घर भेजा, क्योंकि चाहती हूं कि पूरा ध्यान एशियन गेम्स पर ही हो। मैं नहीं चाहती कि कुछ चीजों की वजह से मैं पीछे रह जाऊं।

सवाल: …लेकिन बहुत मुश्किल होता होगा भावनात्मक रूप से इसे स्वीकार करना?

सीमा कालीरमना: घर पर वह कई बार बोलता है कि मुझे आपकी याद आ रही है। मुझे आपके साथ रहना है तो वह पार्ट इमोशनल होता है। दिमाग में कई बार यह भी आता है कि मैंने इसका बचपन छीन लिया है। अगर वह मेरे पास होता तो थोड़ा अलग होता, लेकिन मैं फिर यह सोचकर छोड़ देती हूं कि अभी जो हो रहा है सब उसके लिए हो रहा है और उसके भले के लिए हो रहा है।

सवाल: आपके घर वालों का किस तरह का सपोर्ट है?

सीमा कालीरमना: मेरे पति ही मेरे कोच हैं। …तो आप सोच ही सकते हैं कितना सपोर्ट होगा। फुल सपोर्ट है। घर वालों ने इतना कर रखा है कि बेटे को संभाल रहे हैं। अभी वह नाना-नानी के पास है। जब उसका मन करता है तो दादा-दादी के पास रहता है। कभी आर्थिक कोई मदद चाहिए तो परिवार वाले बोल देते हैं कि हो जाएगा। आप यकीन नहीं करेंगे कि हमारे घर में किसी की सरकारी नौकरी नहीं है। मेरी भी नहीं है। …तो सोच सकते हैं कि इन सब चीजों को लेकर मैं, मेरे पति और मेरे घर वाले कितना संघर्ष कर रहे हैं।

सवाल: सबसे ज्यादा कितने दिन बेटे से दूर रही हैं, कैंप हो या प्रतियोगिता?

सीमा कालीरमना: वैसे तो बेटा एक या दो दिन मिलने आ जाता है, लेकिन सही पूछो तो पिछले 3-4 साल से मुझे याद नहीं कि मैंने घर पर सुकून से रोटी खाई है। अभी जब कॉमनवेल्थ गेम्स से आई तो शाम को प्रोग्राम हुआ। मीडिया वाले भी पहुंच गए वहां तो रात को सोए। सुबह मैं अपनी यूनिवर्सिटी गई। यूनिवर्सिटी से आते ही यहां आ गई। …तो सच पूछो याद नहीं कि मैंने कब घर वालों के साथ बैठ के आराम से बातें की हैं, रोटी खाई है।

सवाल: आपने साथ-साथ में अपनी पढ़ाई भी पूरी की है?

सीमा कालीरमना: पूरी नहीं की है। अभी चल रही है। मैं चौधरी बंसीलाल यूनिवर्सिटी से फिजिकल एजुकेशन में पीएचडी कर रही हूं। मैंने अभी सोचा है कि मैं एशियन गेम्स से लौटकर डाटा कलेक्शन पर काम करूंगीं और थीसिस भी तैयार करूंगी।

सवाल: भारत में अच्छे थ्रोअर्स होते थे, फिर लंबे समय बाद आप आईं। इस विरासत के बारे में कुछ पता है?

सीमा कालीरमना: यहां पर हरवंत मैडम आती हैं। उन्होंने भी कॉमनवेल्थ गेम्स (2010, दिल्ली) में रजत पद जीता था। सीमा दीदी थीं। कृष्णा पूनिया मैम थीं। तीनों का 2010 दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल था। यह एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि थी कि गोल्ड से ब्रॉन्ज तक तीनों भारत के थे। उसके बाद मुझे नहीं पता कि किस कारण थ्रो में हम थोड़ा पीछे चले गए, लेकिन अभी स्टैंडर्ड थोड़ा अप हुआ है। लड़कों में भी और लड़कियों में भी।

सीमा कालीरमना: आप यकीन नहीं करेंगे। लड़कों में जैवलिन में इतनी एंट्री नहीं मिलती हैं, जितनी डिस्कस थ्रो में मिलती हैं। लड़कों में कम से कम एक समय पर एक इवेंट में 100 से ज्यादा एंट्री मिलती हैं। इतनी आप जैवलिन में नहीं देख पाओगे, जबकि भारत में जैवलिन का क्रेज सबसे ज्यादा है। …तो मैं कहीं ना कहीं यह मानूंगी कि डिस्कस थ्रो का स्टैंडर्ड थोड़ा अप हुआ है।

सीमा कालीरमना: अभी लड़कियां भी 55, 56, 57 मीटर की रेंज लगा रही (इतनी दूर डिस्कस फेंकना) हैं। पहले 47 से 49 मीटर के बीच मेडल आ जाता था। अब यह रेंज 55 से 57 के बीच में जाती है। … तो भारत के लिए यह एक उपलब्धि है। अभी आपने देखा होगा कॉमनवेल्थ गेम्स में भी हम दो लड़कियों ने हिस्सा लिया था। अभी एशियन गेम्स में भी दो लड़कियां जा रही हैं।

सवाल: …और ऊंचे स्तर पर जाने के लिए क्या सुधार करना पड़ेगा?

सीमा कालीरमना: वर्कआउट तो सब यही करते हैं, लेकिन आपको यह देखना होगा कि जो सामने वाला वर्कआउट कर रहा है, उसका माइंडसेट क्या है। वह क्या सोचकर कर रहा है। उसको वह एक्सरसाइज करने की फील क्या है। एक तो आप एक्सरसाइज को एक्सरसाइज के लिए करते हैं। एक आप उसको अपने इवेंट के साथ कनेक्ट करके करते हो। वह कहीं ना कहीं आपको ज्यादा फायदा देती है।

सीमा कालीरमना: …तो वर्कआउट करने में किसी को कोई परेशानी नहीं है। सबका वर्कआउट बेस्ट है। सब अपने सर्वश्रेष्ठ के हिसाब से करते हैं। बस आपको उसके साथ अपनी फील अटैच करनी है। बस उसके बारे में सोचते रहना है कि हां मुझे अपना बेस्ट करना है… मैं यह कर सकती हूं, क्योंकि हर एक एथलीट के अंदर यह क्षमता है कि अगर वह सोचे तो सब कुछ कर सकता है और पा भी सकता है।

सवाल: अभी तकनीकी रूप से किन-किन चीजों पर काम करना है?

सीमा कालीरमना: डिस्कस और हैमर सबसे ज्यादा टेक्निकल इवेंट हैं। सबसे ज्यादा हैमर है, क्योंकि उसमें 4 टर्न होते हैं। वह सोच समझ कर लेना पड़ता है कि कहां पर उसको रिलीज करना है, फिर कैसे-कैसे करना है। सेकंड इवेंट डिस्कस है। तो मुख्यतः जो आपका कोऑर्डिनेशन है, आपका जो रिदम है, आपको किस समय हाथ को ढीला छोड़ना है, कहां पर आपको हाई पॉइंट बनाना है। डिस्कस का रिलीज एंगल क्या होगा?

सीमा कालीरमना: सबसे मुख्य तो रिलीज एंगल ही है। अगर आपका रिलीज एंगल परफेक्ट है तो वह डिस्कस कहीं ना कहीं दो या तीन मीटर और ज्यादा दूर जा सकता है। अगर रिलीज एंगल अच्छा नहीं है तो वह कम भी जा सकता है। मुख्य रूप से यही है। आपका रिदम क्या है। आपके शरीर का जो कोऑर्डिनेशन है। आपका रिलीज एंगल क्या है। आप उन पर काम कर रहे या नहीं कर रहे हैं।

प्लाई बोर्ड से कॉमनवेल्थ गेम्स के सिल्वर मेडल तक का सफर, अब एशियन गेम्स में इतिहास रचने की तैयारी में ज्ञानेश्वरी

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव की साधारण व्यायामशाला में प्लाई के बोर्ड पर वजन उठाने से शुरू हुआ ज्ञानेश्वरी यादव का सफर राष्ट्रमंडल खेलों के रजत पदक तक पहुंचा। अब 53 किलोग्राम भार वर्ग में वह एशियाई खेलों की चुनौती के लिए तैयार हैं। (पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें)