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पैसों के लिए लड़कों से लड़ती थी दिव्या काकरान, गरीबी इतनी कि दूध की जगह मिलता था ग्लूकोज

दिव्या बेहद तंगहाली में पली-बढ़ीं। पिता के पास इतने पैसे ना थे कि बेटी को नियमित रूप से दूध पिला सकें। कई बार उन्हें दूध की जगह दिव्या को ग्लूकोज ही पिलाना पड़ता, ताकि कम से कम शरीर में एनर्जी बनी रहे।

मैच के दौरान दिव्या काकरान। (Photo Courtesy: Twitter)

भारत की महिला पहलवान दिव्या काकरान ने 18वें एशियाई खेलों के तीसरे दिन मंगलवार (21 अगस्त) को 68 किलोग्राम भारवर्ग फ्री स्टाइल स्पर्धा में कांस्य पदक अपने नाम किया। दिव्या ने कांस्य पदक के मैच में चीनी ताइपे की चेन वेनलिंग को 10-0 से मात देकर अपने पहले ही एशियाई खेलों में पदक जीता। दिव्या को मंगोलिया की पहलवान तुमेनटसेटसेग शारखु ने क्वार्टर फाइनल में 11-1 से मात दी थी। क्वार्टर फाइनल में हार के बाद दिव्या का स्वर्ण जीतने का सपना टूट गया था लेकिन उन्हें कांस्य पदक का मैच खेलने का मौका मिला जहां उन्होंने बाजी मारी।

दिव्या बेहद तंगहाली में पली-बढ़ीं। पिता के पास इतने पैसे ना थे कि बेटी को नियमित रूप से दूध पिला सकें। कई बार उन्हें दूध की जगह दिव्या को ग्लूकोज ही पिलाना पड़ता, ताकि कम से कम शरीर में एनर्जी बनी रहे। दो भाइयों की बहन दिव्या के परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी। दिव्या को बचपन से ही कुश्ती का शौक था। एक दिन पिता जब अखाड़े में लेकर गए, तो घोषणा कि गई कि उनका मुकाबला लड़के से होगा। इतने में एक शख्स ने कहा कि अगर दिव्या जीती, तो 500 रुपये इनाम में देंगे। दिव्या को बस इनाम का लालच था। कभी इतने पैसे हाथ में एक साथ ना पकड़े थे। उस मुकाबले में दिव्या ने जीत दर्ज की और सभी को चौंका दिया।

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पिता अब अक्सर दिव्या को लेकर दंगलों में जाते। लड़की को देख लोग अच्छी रकम देने को तैयार हो जाते। दिव्या मैच जीतती गई और परिवार के खर्च में हाथ बंटाने लगीं। दिव्या ने इसी साल ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में आयोजित किए गए राष्ट्रमंडल खेलों में भी कांस्य पदक पर कब्जा जमाया था। दिव्या ने इसी साल भारत केसरी दंगल में दिग्गज पहलवान गीता फोगाट को मात दी थी।

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