भारत 15 अगस्त को श्रीलंका के खिलाफ गॉल में जब अपना 600वां टेस्ट खेलने उतरेगा तो यह सिर्फ एक ऐतिहासिक आंकड़े तक पहुंचने का मौका नहीं होगा, बल्कि उस यात्रा की भी झलक मिलेगी, जिसमें टीम ने सबसे बड़ा बदलाव घरेलू मैदानों पर नहीं, बल्कि विदेशी जमीन पर किया है।
साल 1932 में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण करने वाला भारत 600 टेस्ट खेलने वाली दुनिया की तीसरी टीम बनने जा रहा है। भारत ने अपने शुरुआती दौर में घरेलू मैदान पर भी संघर्ष किया और विदेशी परिस्थितियों में तो उसकी स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण रही।
पहले चार 100-टेस्ट के दौर (1-100, 101-200, 201-300, 301-400 टेस्ट मैच) में भारत ने 193 विदेशी मैचों में सिर्फ 26 जीत दर्ज की थीं। इसके बाद तस्वीर तेजी से बदली। पिछले दो 100 टेस्ट के दौर (401-500 और 501-599) में भारत ने विदेश में 107 में से 37 मुकाबलों में जीत हासिल कीं।
इसका मतलब शुरुआती 193 मैचों में भारत की जीत का प्रतिशत करीब 13.5 रहा। वहीं पिछले 107 मैचों में यह बढ़कर करीब 34.6 प्रतिशत हो गया। भारत के टेस्ट इतिहास के सबसे हालिया 100 टेस्ट के आंकड़े इस बदलाव को और स्पष्ट करते हैं।
विदेश में बराबरी के करीब पहुंचा भारत
भारत ने 501वें से 599वें टेस्ट के बीच विदेश में 49 टेस्ट मैच खेले। इनमें से उसे 21 में जीत मिली, जबकि 22 में हार का सामना करना पड़ा। उसका जीत-हार अनुपात 0.955 रहा। गॉल में भारत यदि अपने 600वें टेस्ट में जीत हासिल करता है तो इस दौर में विदेशी में भारत की जीत-हार की संख्या 22-22 हो जाएगी और यह अनुपात 1.00 हो जाएगा।
इसका मतलब श्रीलंका के खिलाफ 600वें टेस्ट की जीत भारत के लिए केवल एक ऐतिहासिक मैच जीतने की उपलब्धि नहीं होगी। यह पिछले करीब एक दशक में विदेशी टेस्ट क्रिकेट में टीम के बदलाव का सांख्यिकीय प्रमाण भी होगी।
घर में दबदबा, लेकिन असली छलांग बाहर
भारत के टेस्ट क्रिकेट में हाल के दशकों में घरेलू प्रदर्शन में भी जबरदस्त सुधार हुआ। पिछले दो 100-टेस्ट दौर में भारत ने घर में 92 टेस्ट खेले और इनमें 61 मैच जीते। साल 2013 से 2024 तक भारत ने घरेलू मैदान पर लगातार 18 टेस्ट सीरीज जीतीं। इस बदलाव को सिर्फ घरेलू दबदबे से समझना अधूरा होगा। भारत की टेस्ट टीम के मजबूत होने की असली परीक्षा विदेशी परिस्थितियों में हुई।
शुरुआती चार दौर में 193 विदेशी टेस्ट में 26 जीत के मुकाबले पिछले दो दौर में 107 मुकाबलों में 37 जीत इस बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर पेश करती है। यही वह अंतर है जिसने भारत को लंबे समय तक घरेलू मैदान पर मजबूत टीम से बदलकर दुनिया की शीर्ष टेस्ट टीमों में शामिल कराया।
विराट कोहली के दौर में तेज हुआ बदलाव
भारत की विदेशी टेस्ट सफलता की चर्चा विराट कोहली की कप्तानी के बिना पूरी नहीं हो सकती। आंकड़ों के मुताबिक, भारत के छठे 100-टेस्ट दौर में आए बदलाव का संबंध विराट कोहली के कप्तानी काल से भी रहा। उन्होंने भारत को 68 टेस्ट में 40 जीत दिलाईं।
छठे दौर (501 से 599 टेस्ट मैच के दौरान) में भारत ने विराट कोहली की कप्तानी में 53 टेस्ट में 32 जीत हासिल कीं, जो किसी भी अन्य भारतीय कप्तान के पूरे करियर में इस तरह के 100-टेस्ट ब्लॉक में मिली जीत से पांच अधिक थीं।
सबसे खास बात यह रही कि इस दौरान विदेशी जमीन पर भी भारत ने बड़ी संख्या में टेस्ट जीते। छठे ब्लॉक के दौरान भारत ने विराट कोहली की कप्तानी में विदेश में 12 टेस्ट मैच जीते। रिकॉर्ड्स पर नजर डालें तो किसी भी भारतीय कप्तान के करियर में विदेश में इससे अधिक जीत नहीं थीं।
घर से बाहर जीत की आदत बनी
भारत की विदेशी सफलता सिर्फ एक कप्तान या एक सीरीज का परिणाम नहीं रही। पिछले दो 100-टेस्ट दौर में विदेशी जीत की संख्या शुरुआती 4 दौर की तुलना में बढ़ी। शुरुआती 4 दौर में भारत ने विदेश में 193 में सिर्फ 26 टेस्ट जीते थे, जबकि पिछले दो दौर में 107 में से 37 में जीत हासिल की।
यह बदलाव उस दौर में आया जब भारतीय गेंदबाजी आक्रमण का स्वरूप भी बदल रहा था। पहले दो 100-टेस्ट दौर में भारतीय स्पिनरों ने तेज गेंदबाजों से लगभग दोगुने विकेट लिए थे, लेकिन सबसे हालिया 100 टेस्ट में पहली बार तेज गेंदबाजों ने स्पिनरों से ज्यादा विकेट लिए।
तेज गेंदबाजों ने बदली विदेश में तस्वीर
विदेश में टेस्ट जीतने के लिए सिर्फ बल्लेबाजी की मजबूती पर्याप्त नहीं होती। भारत के हालिया बदलाव में गेंदबाजी की भूमिका अहम रही। 501वें से 599वें टेस्ट के बीच भारतीय गेंदबाजों का औसत 25.35 रहा, जबकि इससे पहले के 100 टेस्ट में यह 34.45 था। इसी दौरान गेंदबाजी का स्ट्राइक रेट 65.6 से सुधरकर 50.1 हो गया।
तेज गेंदबाजों का प्रदर्शन भी इसी बदलाव को दिखाता है। हालिया दौर में भारतीय पेसरों का औसत 26 और स्ट्राइक रेट 48.5 रहा। इससे पहले के पांच 100-टेस्ट दौर में तेज गेंदबाजों का औसत कभी 30 से नीचे नहीं गया था।
इसका मतलब है कि जिस भारत की टेस्ट पहचान लंबे समय तक स्पिन गेंदबाजी और घरेलू परिस्थितियों से जुड़ी रही, उसी टीम के पास अब विदेशी परिस्थितियों में मैच जिताने वाला पेस अटैक भी है।
क्यों खास है 600वां टेस्ट मैच
भारत का 600वां टेस्ट एक ऐसे समय में है जब टीम को विदेशी मैदान पर अपने इस बदलाव को फिर साबित करना है। हालिया घरेलू टेस्ट नतीजों ने टीम की स्थिति को चुनौतीपूर्ण बनाया है। विश्व टेस्ट चैंपियनशिप में भारत को आगे बढ़ने के लिए श्रीलंका के खिलाफ अच्छे नतीजों की जरूरत है।
ऐसे में गॉल का मुकाबला दो तरह से अहम होगा। पहला- यह भारतीय क्रिकेट के 94 साल के टेस्ट सफर का 600वां पड़ाव है। दूसरा- जीत मिलने पर भारत हालिया 100-टेस्ट दौर में विदेशी मैदानों पर जीत और हार की संख्या बराबर कर लेगा।
पहले 300 टेस्ट में भारत ने कुल 56 मैच जीते थे। दिलचस्प यह है कि पिछले 100 टेस्ट के दौरान भी भारत की जीत की संख्या 56 रही। यानी शुरुआती 300 टेस्ट में जितनी जीत हासिल करने में भारत को करीब छह दशक लगे, उतनी जीत उसने हाल के सिर्फ 100 टेस्ट में दर्ज की हैं।
भारत की टेस्ट यात्रा का यह सबसे बड़ा बदलाव है। घर में किला बनाने से भारत ने शुरुआत की थी, लेकिन टेस्ट क्रिकेट की बड़ी ताकत बनने की असली कहानी तब लिखी गई जब उसने विदेश में जीतना सीखा। अब 600वें टेस्ट में उसके पास इसी बदलाव को नए आंकड़े में बदलने का मौका है।
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