12वीं की बोर्ड परीक्षा खत्म होने के महज 48 घंटे के भीतर जब कोई 17 साल की छात्रा राष्ट्रीय प्रतियोगिता के पोडियम पर पदक के साथ खड़ी हो तो वह पल किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के एक साधारण से गांव संतोषपुर की एलिश एक्का ने कुछ ऐसा ही किया है।
एलिश एक्का के गले में चमकता रजत पदक सिर्फ एक खेल की जीत नहीं, बल्कि उनकी मां के अथाह त्याग और अदम्य साहस का एक सुंदर उदाहरण भी है।
एलिश का साहसिक फैसला
एलिश की कहानी की शुरुआत हॉकी के मैदान से होती है। एलिश की मां प्रमिला एक्का खुद राज्य स्तर की हॉकी खिलाड़ी रह चुकी हैं। प्रमिला को पारिवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक तंगी के कारण अपना खेल छोड़ना पड़ा था।
मां की तरह एलिश ने भी बतौर स्ट्राइकर हॉकी में भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना देखा। हालांकि, टीम स्पोर्ट्स में मिलने वाले सीमित अवसरों ने एलिश को अपने खेल सफर पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया।
ऐसा विचार आने के बाद एलिश ने गांव से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित ‘बिरसा मुंडा एथलेटिक्स स्टेडियम’ के कोचों से बात की और फिर हॉकी छोड़कर ‘रेस वॉकिंग’ में करियर बनाने का बेहद साहसिक कदम उठाया।
पढ़ाई, कड़ी मेहनत और शानदार जीत
एलिश ने पिछले दो साल में बोर्ड परीक्षा की तैयारी और कड़ी ट्रेनिंग के बीच बेहतरीन संतुलन बनाए रखा। अभ्यास के लिए एलिश को अक्सर लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। इस अनवरत मेहनत का फल तब मिला जब एलिश ने जगदलपुर में खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स (KITG) 2026 में महिला दस हजार मीटर रेस वॉक में 1:04.59 का समय निकालकर रजत पदक जीता।
एलिश एक्का के मुताबिक, ‘‘शुरुआत में यह बहुत मुश्किल था क्योंकि मैंने पहले कभी रेस वॉक नहीं की थी, लेकिन कोच ने मुझसे कहा कि अगर कड़ी मेहनत करूंगी तो इस खेल में अच्छा कर सकती हूं। मैंने उन पर भरोसा किया और अपना सर्वश्रेष्ठ देने का फैसला किया।’’
एलिश एक्का की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है, क्योंकि खेलो इंडिया ट्रायबल गेम्स (खेलो इंडिया जनजातीय खेल) के लिए रवाना होने से ठीक एक दिन पहले ही उन्होंने 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा दी थी।
एलिश एक्का ने बताया, ‘‘मेरे पास KITG (केआईटीजी) की तैयारी के लिए ज्यादा समय नहीं था। मैंने परीक्षा खत्म की और यह सोचकर यहां आई कि बस अपना सर्वश्रेष्ठ दूंगी। जब मैंने फिनिश लाइन पार की और महसूस किया कि मैंने पदक जीत लिया तो सबकुछ बहुत अविश्वसनीय लगा।’’
मां के त्याग का फल
एलिश की उपलब्धि के पीछे मां प्रमिला का लंबा संघर्ष छिपा है। चार लोगों के परिवार में प्रमिला इकलौती कमाने वाली हैं। वह ज्वेलरी स्टोर में काम करती हैं और करीब पांच हजार रुपया महीना कमाती हैं। इस मामूली आय में वह न सिर्फ घर चलाती हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करती हैं कि एलिश और कक्षा 3 में पढ़ने वाले उनके बेटे की हर इच्छा पूरी हो।
मां प्रमिला के संघर्षों को याद करते हुए एलिश भावुक हो गईं। एलिश ने कहा, ‘‘मेरी मां ने कई समस्याएं झेली हैं। आर्थिक दिक्कतों के कारण अपने खेलने का सपना छोड़ दिया। मैंने देखा कि परिवार चलाने के लिए वह कितनी कड़ी मेहनत करती हैं। हाल ही में उनकी आंखों की रोशनी में कुछ समस्या आई थी। उन्हें नए चश्मा चाहिए था, लेकिन वह उसे खरीदने में हिचकिचा रही थीं, क्योंकि इससे महीने का बजट बिगड़ जाता।’’
एलिश ने बताया, ‘‘मां कभी शिकायत नहीं करतीं और हमेशा मुझे उस खेल में अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं जो मैं खेलती हूं। यह पदक उनके बलिदानों का ही नतीजा है।’’ हॉकी के मैदान से रेस वॉकिंग के ट्रैक तक एलिश एक्का का यह सफर साबित करता है कि जब इरादे मजबूत हों और मां का आशीर्वाद साथ हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती।
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