क्रिकेट, फुटबॉल और कबड्डी के बाद अब शतरंज लीग

क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, कबड्डी, कुश्ती, बैडमिंटन और वालीबॉल के बाद अब जो खेल भारत में व्यावसायिकता की सीढ़ी पर चढ़ रहा है वह है ठंडे दिमाग व चतुराई से सोलह खानों की बिसात पर शताब्दियों पूर्व से खेला जाने वाला शतरंज।

शतरंज की बिसात। फाइल फोटो।

आत्माराम भाटी

क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, कबड्डी, कुश्ती, बैडमिंटन और वालीबॉल के बाद अब जो खेल भारत में व्यावसायिकता की सीढ़ी पर चढ़ रहा है वह है ठंडे दिमाग व चतुराई से सोलह खानों की बिसात पर शताब्दियों पूर्व से खेला जाने वाला शतरंज। इसे लेकर पिछले सप्ताह अखिल भारतीय शतरंज महासंघ की जयपुर में हुई बैठख में फैसला लिया गया है।

इसमें दो राय नहीं कि भारत आज बेहतरीन खिलाड़ियों के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शतरंज की दुनिया में अपना एक मजबूत स्थान बना चुका है। देश में भी बड़ी संख्या में युवा वर्ग इस खेल से जुड़ रहा है। लेकिन फिर भी इस खेल व खिलाड़ियों को वो तवज्जो, सुविधाएं व आर्थिक संबल नहीं मिल पा रहा है जैसा कि क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन, पारंपरिक खेल कबड्डी व कुश्ती के खिलाड़ियों को मिलने लगा है।

अखिल भारतीय शतरंज महासंघ ने देश में शतरंज को और ज्यादा लोकप्रिय बनाने व बढ़ावा देने, ज्यादा से ज्यादा बच्चों व युवाओं को इस खेल की ओर खींचने के लिए जल्द ही देश में शतरंज लीग के आयोजन करने का निर्णय लिया है। यह नि:संदेह इस खेल व खेलने वाले शतरंज खिलाड़ियों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का ब्रह्मास्त्र साबित हो सकता है। सबसे मुख्य बात यह है कि शतरंज लीग की बिसात को अमलीजामा पहनाने के लिए देश की नौ बड़ी कंपनियां आगे भी आ चुकी हैं। इसके लिए पांच सदस्यीय स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया जा चुका है। इससे स्पस्ट है कि देश में अब जल्द ही एक नई लीग का आगाज होने वाला है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत को शतरंज खेल का जन्मदाता माना जाता है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस खेल में हमारी पहचान कह सकते हैं कि बहुत कम थी। याद नहीं आता कि विश्व स्तर पर भारत का कोई शतरंज खिलाड़ी बड़ी जीत दर्ज करने में सफल हुआ। लेकिन जब विश्वनाथन आनंद ने रूस, हंगरी, व उक्रेन के दबदबे वाले इस खेल में इन देशों के शतरंज खिलाड़ियों को मात देकर जीत का सिलसिला शुरू करते हुए 1987 में देश के पहले ग्रैंड मास्टर्स बनने की उपलब्धि हासिल की तो सभी खेल प्रेमी चकित हो गए।

आनंद की इस उपलब्धि ने शतरंज के प्रति देश में ऐसा माहौल बनाया की अभिभावक, बच्चे व युवा शतरंज खेल से जुड़ने लगे। आनंद की विश्व स्तर पर मिलने वाली बड़ी सफलताओं ने देश में शतरंज को जिंदा रखा। इसी का प्रतिफल है कि आज भारत के पास इस खेल में एक लंबी कतार शतरंज प्रतिभाओं की मौजूद है। यही नहीं बड़ी संख्या में ग्रैंड मास्टर्स भी मौजूद है।

आज एशियाई व विश्व प्रतियोगिताओं में सब-जूनियर, जूनियर व सीनियर वर्गों में भारतीय खिलाड़ी परचम लहरा रहे हैं। इन सबके आगे आज भी आनंद देश के युवा खिलाड़ियों के साथ तीन दशक बाद भी विश्व के दिग्गजों को अपनी चालों के चक्रव्यूह में फंसाकर पटकनी देने की लगातार कोशिशें कर रहे हैं। जो युवाओं के लिए इस खेल से जुड़ने में प्रेरणा का काम कर रही है।

भले ही भारतवासी आज क्रिकेट के रंग में रंगे हैं, लेकिन फिर भी बड़ी संख्या में पूरे देश में बच्चे व युवा आनंद ही नहीं आनंद के साथ ही आज के शतरंज ग्रैंड मास्टर्स सितारे कोनेरू हंपी, अभिजीत गुप्ता, परिमार्जन नेगी को भी अपनी प्रेरणा मानकर लगातार इस खेल से जुड़ रहे हैं जो भारतीय शतरंज के लिए खुशी की बात है। अब अखिल भारतीय शतरंज महासंघ द्वारा शतरंज को देश में और ज्यादा लोकप्रिय बनाकर ज्यादा से ज्यादा बच्चों व युवाओं को इस खेल से जोड़ने और जो युवा इस खेल में हैं उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए शतरंज लीग करवाने का जो फैसला लिया है, यदि यह सफल हो जाती है तो निश्चित रूप से देश में लोकप्रिय अन्य खेलों के साथ शतरंज महासंघ भी अपने खिलाड़ियों को मजबूत आर्थिक संबल दे कर शतरंज को देश का लोकप्रिय खेल बना सकता है।

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