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46 साल के खिलाड़ी की 3 मिनट में 210 दंड-बैठक, 58 की उम्र में पिता भी दे चुके हैं 35 साल के रेसलर को पटखनी

अप्पासाहेब ने बताया, ‘पिता का देहांत हो गया था। मेरे पास अपनी मां और तीन बहनों का पेट भरने के लिए फैक्ट्री में काम करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। लेकिन तभी मेरे पिता की सलाह मुझे याद आई।’

Author Edited By आलोक श्रीवास्तव नई दिल्ली | Updated: November 12, 2020 2:37 PM
Appasaheb Gaikwad

अप्पासाहेब गायकवाड़ ने 3 मिनट (180 सेंकंड) में 210 दंड-बैठक लगाने का रिकॉर्ड बनाया है। मराठवाड़ा के औरंगाबाद जिले के पैथन स्थित सुपे गांव के रहने वाले उन तीन मिनटों को अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय मानते हैं। पूर्व रेसलर और कबड्डी खिलाड़ी अप्पासाहेब 21 साल से अपने वजन को 68-70 किलोग्राम के बीच बनाए हुए हैं। 46 साल के अप्पासाहेब को ऐसा एक भी दिन याद नहीं है, जब से उन्होंने यह शुरू किया है तब से किसी भी दिन 200 से कम दंड-बैठक लगाईं हों।

इंडियन एक्सप्रेस से हुई बातचीत में अप्पासाहेब गायकवाड़ ने बताया, ‘जब जीवन कठिन था और हम पेट भरने के लिए भाखरी चूड़ा को नमक-मिर्च के साथ खाते थे। तब भी मुझे याद है कि कुछ सौ बैठकें करना मेरी रोजाना की दिनचर्या थी।’ अप्पासाहेब ने 2018 में गिनीज बुक रिकॉर्ड अपना नाम दर्ज कराने की कोशिश की थी, लेकिन तब ज्यूरी ने उनके दंड-बैठक के तरीके को सही नहीं पाया था। अप्पासाहेब ने बताया, ‘मैं खेल में उच्च स्तर पर कुछ भी करने में असफल रहा, इसलिए मैं कम से कम इसे हासिल करना चाहता था।’

अपने प्रयास के खारिज होने के बाद अप्पासाहेब गायकवाड़ ने गुरुत्वाकर्षण के केंद्र को कम करने के लिए अपने पैरों को दूर-दूर रखकर प्रैक्टिस की। उन्होंने शरीर को सीधा रखते हुए और घुटने और जांघ के एंगल को 90 डिग्री पर रखते हुए और पैरों (पैर की उंगलियों, एड़ी) को सपाट रखते हुए दंड-बैठक करना शुरू किया और फिर इसे तेजी से करने में दक्षता हासिल की। उनकी मेहनत रंग लाई। अब वह 3 मिनट में 210 दंड-बैठक करने वाले कबड्डी खिलाड़ी बन गए हैं।

अप्पासाहेब को जीत का यह यह जुनून पिता से विरासत में मिला है। उनके पिता दूध का व्यापार करते थे। उन्होंने बताया, ‘मेरे पिता को भी कुश्ती का शौक था। उन्होंने 58 साल की उम्र में भी चुनौती स्वीकार की।’ अप्पासाहेब ने कहा, ‘मेरे पिता बगल वाले गांव में दूध देने जाते थे। उसी दौरान उनको एक 35 साल के पहलवान ने चुनौती दे दी। उन्होंने तुरंत उसकी चुनौती स्वीकार कर ली। पिता ने यह बात किसी भी रिश्तेदार या गांववालों को नहीं बताया, क्योंकि उन्हें डर था कि यदि वह हार गए तो गांव पर कलंक लग जाएगा।’

अप्पासाहेब ने बताया, ‘तब मैं 12 साल का था, लेकिन उस दिन उनके पीछे-पीछे गया। वहां करीब 500 लोगों की भीड़ इकट्ठा थी। मैं भी छिपकर खड़ा हो गया। मैंने पिता को जीतते हुए देखा। वह घटना मेरे जेहन में आज भी कैद है।’ पुराने यादें ताजा करते अप्पासाहेब ने बताया, ‘आप जानते हैं मैं कबड्डी में अच्छा था, मैं गोपाल समाज (दूधवाले) से आता हूं, जहां शिक्षा पर जोर नहीं दिया जाता था। लेकिन मेरे पिता ने मुझे स्कूल भेजा।’

अप्पासाहेब ने बताया, ‘एक समय घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई। उस समय मैं हाईस्कूल में था। पिता का देहांत हो गया। मेरे पास अपनी मां और तीन बहनों का पेट भरने के लिए फैक्ट्री में काम करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। लेकिन तभी मेरे पिता की सलाह मुझे याद आई। उन्होंने मुझसे कहा था कि कारखाने में काम करने के लिए फिजिकल ट्रेनिंग (शारीरिक प्रशिक्षण) का कभी त्याग मत करना। मैं आज भी उनकी सलाह पर काम कर रहा हूं।’

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