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मजदूर दिवस: अपने रोजगार से दूर होकर गैरकानूनी रोजी अपना रहे लोग, इस नई समस्‍या का हल सोचा है कभी?

Labour Day 2018: बीते 27 सालों में भूमंडलीकरण के साये में बढ़ी व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता ने तकनीक के विकास किया और कम से कम श्रम के इस्तेमाल से अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृति ने बेरोजगारों की एक बड़ी खेप तैयार की है।

नई आर्थिक नीतियों के 27 बरस बाद आज देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सीमित होते जा रहे हैं और कृषि के हालात भी बेहद खराब हैं।

पंकज सिंह

नई आर्थिक नीतियों के 27 बरस बाद आज देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सीमित होते जा रहे हैं और कृषि के हालात भी बेहद खराब हैं। नतीजतन हमारे शहरों पर दबाव बढ़ रहा है। देश के शहरों को हमने समृद्धि के टापू में बदल दिया है, जहां हर रोज लाखों युवा, बेरोजगार जैसे-तैसे जीने की चाह में खिंचे चले आ रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ भारतीय शहरों को ‘विश्व स्तरीय शहर’ (वल्र्ड क्लास सिटी), सुविधायुक्त ‘सक्षम विकास केंद्र’ और ‘नवीनतायुक्त केंद्र’ बनने की होड़ भी लगी है। सरकारी नीतियों और शहरी योजनाओं के जरिये विकास का जो नया ककहरा लिखा जा रहा है, उसमें दो तस्वीर उभरती हैं। पहली, शहर आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विस्तार पा रहे हैं। इससे विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) की कीमत पर सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) को बढ़ावा दिया जा रहा है।

दूसरी तस्वीर ज्यादा भयावह है, इसमें बस्तियों और झुग्गी-झोपडिय़ों को उजाड़कर विश्व स्तरीय शहर के सपनों की नींव रखी जा रही है। ऐसे हालात में, शहरी मेहनतकश दो तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। एक तरफ वे घरों से बेदखल होकर विस्थापित किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आधुनिकीकरण एवं मशीनीकरण के नाम पर उनके रोजगार के साधनों को छीना जा रहा है।

आज सरकार दावा कर रही है कि देश की अर्थव्यवस्था बेहतरीन दौर में हैं। अर्थव्यवस्था की मजबूती का सूचकांक शेयर बाजार दिन-प्रतिदिन नई ऊचांइयों को छूता हुआ 30,000 के जादुई आंकड़े को कब का पार कर गया है और दावा है कि यह जल्द ही 40 हजार के पार भी पहुंच जाएगा। पंच सितारा होटल, बड़े-बड़े शापिंग मॉल, फ्लाईओवर, मेट्रो रेल, सस्ती होती हवाई यात्रा आर्थिक व्यवस्था की मजबूती का खुशनुमा अहसास कराती हैं। हालांकि इस खुशहाली के दूसरे पहलू के रूप में उजड़ती बस्तियां, छूटते रोजगार, बढ़ती आत्महत्याएं तथा आपराधिक गतिविधियां हमें चारों तरफ दिखाई देती हैं। इससे देश के 93 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र के कामगार प्रभावित हुए हैं।

बताने की जरूरत नहीं कि बीते 27 सालों में भूमंडलीकरण के साये में बढ़ी व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता ने तकनीक के विकास किया और कम से कम श्रम के इस्तेमाल से अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृति ने बेरोजगारों की एक बड़ी खेप तैयार की है। सिमटते औद्योगिकीकरण के दौर में शहर के बस्ती वाले, रेहड़ी-पटरी वाले, बेघर मजदूर, निर्माण मजदूर, घरेलू कामगार, रिक्शा चालक, कूड़ा बीनने वाले एवं कच्ची बस्तियों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, वहीं मध्य वर्ग के युवा भी बेरोजगार की इस मार से बच नहीं पाए हैं। मैन्यूफैक्चरिंग के बजाय सेवा क्षेत्र को बढ़ावा देने के कारण अनौपचारिक क्षेत्र में ज्यादा संख्या में लोग आए और इससे बढ़ी बेदखली के कारण लोग अपने रोजगार से दूर होकर तथाकथित गैरकानूनी रोजगार करने लगे।

अब सबसे बड़ा सवाल है कि इस नई प्रकार की समस्या का हल क्या हो? इन शहरी कामगारों की समस्याओं को समझने के लिए पिछले दिनों दिल्ली की 6 पुनर्वास बस्तियों में यूएनडीपी की एक परियोजना के तहत साझा मंच ने शहरी रोजगार योजना बनाने के लिए कई शोध (शिक्षा, स्वाथ्य, न्यूनतम मजदूरी इत्यादी) और कार्यशालाएं कीं। इससे ये बात सामने आई कि शहर में मुख्यत: तीन प्रकार के रोजगार हैं। (1) वेतन भोगी रोजगार, जो असुरक्षित है। (2) स्वरोजगार, यह गैरकानूनी है। (3) अद्र्ध रोजगार, यह असुरक्षित और गैरकानूनी। इन अध्ययनों से तीन महत्वपूर्ण मांगें सामने आईं। (1) कानूनी पहचान का हक, (2) वैध जगह एवं साधन, (3) आसान शर्तों पर कर्ज।

कामगार तबकों के इन्हीं अध्ययनों के आधार पर राष्ट्रीय शहरी रोजगार का अधिकार कानून का प्रारूप भी तैयार किया गया है। इस प्रारूप पर असंगठित मजदूर संस्थाओं, राष्ट्रीय मजदूर संघों एवं नागरिक संगठनों के साथ अलग-अलग सेमिनारों में चर्चा भी की गई है और मौटे तौर पर राष्ट्रीय शहरी रोजगार का अधिकार कानून पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस की जरूरत पर सहमति बनी है। ताकि इस कानून के मसौदे पर विभिन्न मजदूर आंदोलनों की एक समझ बन सके और ये एक व्यापक एवं प्रभावशाली कानून बन सके। मौजूदा समय में इसके लिए व्यापक अभियान चलाने की भी जरूरत है ताकि सरकार इसे जल्द से जल्द लागू कर सके।

इस प्रारूप कानून के महत्वपूर्ण बिंदू निम्न हैं-
1- शहरी क्षेत्रों में कामगारों की आजीविका को सुनिश्चित करने के लिए पहली मांग है प्रत्येक वयस्क व्यक्ति, जिसने उत्पादन कार्य के लिए पंजीकरण करवाया है, को साल के 300 दिन काम मिलना चाहिए।
2- इसमें प्रत्येक व्यक्ति को, 15 वीं भारतीय श्रम सम्मेलन, 1957 के मुताबिक और जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना है, न्यूनतम मजदूरी की जगह जीने लायक मजदूरी मिलने का हक होना चाहिए।
3- जहां वेतन भोगी मजदूर के लिए मालिक है जिसे त्रिपक्षीय आयोग में रखा जा सकता है, वहां स्व-रोजगार अद्र्ध-रोजगार और बेरोजगार के लिए कोई मालिक नहीं होता, इसलिए सबके लिए सरकार को ही प्रधान नियोक्ता (जिम्मेदार मालिक) मानना चाहिए।
4- इसका मतलब यह भी है कि अगर वेतन-भोगी या स्व-रोजगार या बेरोजगार व्यक्ति को जीने लायक मजदूरी से कम मिल रहा हो तो उसकी भरपाई कल्याणकारी सरकार और श्रम विभाग द्वारा की जाएगी।
5- मजदूर वर्गों के कल्याण के लिए अलग-अलग बोर्ड बनाने के स्थान पर इसकी पूरी जिम्मेदारी श्रम विभाग को लेनी चाहिए जिससे मजदूर वर्गों की एकता बनी रहेगी एवं श्रम विभाग को भी अधिक उत्तरदायी बनया जाएगा।
6- इस प्रारूप में काम का अधिकार एक मौलिक अधिकार के रूप में रखा गया है और केवल रोजगाार गारंटी की मांग नहीं है जो एक प्रकार से सरकार की मर्जी और लोगों की मजबूरी पर निर्भर है तथा अधिकार को कल्याण का रूप दे देती है।
7- मजदूर के रहने की व्यवस्था काम के नजदीक अनिवार्य रूप से होना चाहिए ताकि आमदनी का बड़ा हिस्सा परिवहन पर खर्च करने की जरूरत न हो।
8- हर काम करने या चाहने वाले को श्रम विभाग की ओर से रोजगार पहचान पत्र मिलना चाहिए जो शहर में ही नहीं लेकिन गांव में भी काम के लिए स्वीकृत हो ताकि प्रवासी मजदूर अधर में न लटका रहे।
9- हर रोजगार स्वस्थ और सुरक्षित होना चाहिए, तथा विकलांग और कमजोर व्यक्तियों के लिए भी उपलब्ध होना चाहिए, ताकि मजदूर के साथ-साथ पर्यावरण और समाज की भी हिफाजत हो।
10- रोजगार बढ़ाने के लिए हर सार्वजनिक काम और योजना में 40 प्रतिशत राशि रोजगार के लिए सुरक्षित होनी चाहिए तथा सरकारी विभागों में नियुक्तियों पर लगी रोक हटाई जानी चाहिए- इससे श्रम विभाग की कार्यकुशलता भी बढ़ेगी।
12- पूरी प्रणाली में मजदूरों की भागीदारी होनी चाहिए जिसमें संगठन बनाने का हक शामिल है। इससे सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही को कायम रखा जा सके।

आज समय की मांग है कि इन बिंदुओं पर खुली चर्चा हो और व्यापक समझ बनाई जाए एवं इस पर आधारित प्रारूप पर एक राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया जाना चाहिए।

(लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के गोल्ड मेडलिस्ट छात्र रहे हैं और सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। यहां व्‍यक्‍त विचार उनके निजी हैं।)

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