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फार्मास्यूटिकल इंजीनियरिंग में भविष्य उज्ज्वल

2008 में फार्मास्यूटिकल उद्योग का आकार 33,500 करोड़ रुपए था और 2020 तक यह 1,40,000 करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। भारत अमेरिका सहित दुनिया के लगभग हर देश को दवाएं निर्यात करता है।

Author Published on: January 16, 2020 4:14 AM
इस क्षेत्र में पेशेवरों की मांग लगातार बढ़ रही है।

दिन प्रतिदिन बीमारियों के सामने आते नए रूपों ने चिकित्सा विज्ञानियों और दवा निर्माताओं के सामने नई और कड़ी चुनौतियां पेश की हैं। इन बीमारियों से निपटने के क्रम में कुछ नए विषयों का भी विकास हुआ है। फार्मास्यूटिकल इंजीनियरिंग ऐसा ही एक विषय है, जो दवा उद्योग की नींव जैसा है। इस विषय के पेशेवरों को नई दवाओं की खोज और उनकी उत्पादन तकनीक का विकास करना होता है। एक अनुमान के मुताबिक, 2008 में फार्मास्यूटिकल उद्योग का आकार 33,500 करोड़ रुपए था और 2020 तक यह 1,40,000 करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। भारत अमेरिका सहित दुनिया के लगभग हर देश को दवाएं निर्यात करता है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में पेशेवरों की मांग लगातार बढ़ रही है।

शैक्षणिक योग्यता

भौतिकी, रसायन और गणित विषयों के साथ 12वीं पास करने के बाद फार्मास्यूटिकल इंजीनियरिंग के स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया जा सकता है। स्नातक पाठ्यक्रम में दाखिला प्रवेश परीक्षा के आधार पर होता है। एमटेक पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए फार्मास्यूटिकल इंजीनियरिंग में बीई या बीटेक उपाधि होना आवश्यक है। स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में भी दाखिला प्रवेश परीक्षा के माध्यम से होता है।

पाठ्यक्रम
बीटेक इन फार्मास्यूटिकल इंजीनियरिंग
एमटेक इन फार्मास्यूटिकल टेक्नोलॉजी (बायोटेक्नोलॉजी)
एमटेक इन फार्मास्यूटिकल टेक्नोलॉजी (बल्क ड्रग्स)

संस्थान
प्रौद्योगिकी संस्थान बीएचयू, वाराणसी
केमिकल प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई विश्वविद्यालय
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, वारंगल, आंध्र प्रदेश
राष्ट्रीय फार्मास्यूटिकल शिक्षा एवं शोध संस्थान, मोहाली
अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई
जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, हैदराबाद
निरमा विश्वविद्यालय, अमदाबाद, गुजरात

कार्य का दायरा और वेतन

किसी फार्मा कंपनी में दवा के विकसित होने से लेकर उसके पैकेट बनने तक की प्रक्रिया में हर स्तर पर फार्मास्यूटिकल इंजीनियर की जरूरत होती है। इन पेशेवरों के पास फार्मा क्षेत्र से अलग इंजीनियरिंग और विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में भी काम करने का मौका होता है। वह केमिकल इंजीनियरिंग, बायोप्रोसेस इंजीनियरिंग और बायोकेमिस्ट्री से जुड़े क्षेत्रों में भी काम कर सकते हैं। शिक्षण कार्य में रुचि होने पर फार्मास्यूटिकल इंजीनियरिंग के शिक्षण संस्थानों में लेक्चरर के रूप में काम किया जा सकता है। फार्मास्यूटिकल इंजीनियरिंग में स्नातक डिग्री हासिल करने के बाद फार्मा कंपनियों में नियुक्ति मिलती है। शुरुआत में इन कंपनियों में 20 से 25 हजार रुपए के बीच वेतन मिलता है। संबंधित विषय में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल करने के बाद पद में भी इजाफा होता है और वेतन में भी। इस स्थिति में अनुमानित वेतन 40 से 60 हजार रुपए के बीच हो सकता है।

फार्मास्यूटिकल इंजीनियर के कार्य

दवाओं का विकास : इन पेशेवरों को दवा के विकास के लिए नए पदार्थों के सूत्र तैयार करने के अलावा उन्हें बनाने की तकनीक का भी विकास करना होता है। इसके साथ वहां मौजूदा दवाओं को उन्नत बनाने के लिए उनमें आवश्यक बदलावों को लेकर फार्मा कंपनियों को जरूरी सलाह देते हैं।

सस्ती दवाओं का निर्माण : दवाओं के लिए विकसित किए गए सूत्रों के अनुरूप पदार्थ का निर्माण करने के लिए सस्ती तकनीक की जरूरत होती है। क्योंकि निर्माण तकनीक के महंगा होने का असर दवा की कीमत पर पड़ता है, इसलिए फार्मा कंपनियां ऐसी तकनीक चाहती हैं, जो कम खर्चीली हों।

मानकों का पालन : दवाओं के निर्माण में किसी पदार्थ का इस्तेमाल करते समय उसके बारे में नियामक संस्थाओं के निर्देशों का ख्याल रखना आवश्यक होता है। ऐसा न होने की स्थिति में फार्मा कंपनी को दवा के व्यावसायिक उत्पादन की अनुमति नहीं मिलती। फार्मास्यूटिकल इंजीनियर को काम के दौरान इन नियमों के पालन का खास ध्यान रखना होता है।

उपकरणों का विकास : दवा के उत्पादन, भंडारण और इस्तेमाल में सहायक उपकरणों को विकसित करने में फार्मास्यूटिकल इंजीनियर का विशेष योगदान होता है। इसके लिए वे ऐसे उपकरण भी सुझाते हैं और तैयार करवाते हैं जिनमें विभिन्न दवाइयां बिना खराब हुए लंबे समय तक रखी जा सकें। साथ में इन दवाओं को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में भी दवाओं को कोई नुकसान न पहुंचे।

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