भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देशों में से एक है और अपनी कुल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। भारत तक आने वाले अधिकांश कच्चे तेल की सप्लाई समुद्री मार्गों के जरिए होती है। पश्चिम एशिया में तनाव के बीच सबसे जरूरी Strait of Hormuz की चर्चा लगातार हो रही है क्योंकि यह दुनिया का सबसे अहम तेल परिवहन मार्ग (Oil Shipping Route) माना जाता है। लेकिन इसके अलावा भी कई समुद्री रास्ते हैं जिनसे भारत को कच्चा तेल मिलता है।
दुनिया में हर दिन करीब 100 मिलियन बैरल तेल की खपत होती है और इसमें से 20 प्रतिशत होर्मुज़ से गुजरता है। अब जबकि सबसे संवेदनशील ‘चोकपॉइन्ट’ लगभग बंद है तो दुनिया पर तेल के संकट का खतरा मंडरा रहा है। बात करते हैं उन अन्य प्रमुख समुद्री चोकपॉइन्ट्स और पाइपलाइन तक पहुंचाने तेल पहुंचाने वाले उन रास्तों की जिससे ऊर्जा जरूरतें पूरी की जा रही हैं।
इन समुद्री रास्तों से होती है 80 प्रतिशत तेल की सप्लाई
मलक्का स्ट्रेट
पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया से आने वाले ऊर्जा संसाधनों के लिए Strait of Malacca बेहद महत्वपूर्ण है। मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच स्थित यह रास्ता एशिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। खास बात है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री चेकपॉइन्ट है। इस जलडमरूमध्य से हर दिन 2.32 करोड़ बैरल तेल की सप्लाई होती है यानी दुनिया का 29.1 प्रतिशत कच्चा तेल यहीं से गुजरता है। अगर यह स्ट्रेट बंद हो जाए तो सुंडा स्ट्रेट और लोम्बोक स्ट्रेट से सप्लाई हो सकती है लेकिन ये दोनों रास्ते बहुत ज्यादा लंबे हैं।
स्वेज नहर, SUMED पाइपलाइन
मध्य-पूर्व और भूमध्यसागर के बीच तेल के परिवहन के लिए स्वेज नहर महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यहां से गुजरने वाले टैंकर यूरोप और एशिया के बाजारों तक तेल पहुंचाते हैं। इन तीनों रूट से दुनिया के लगभग 11 प्रतिशत क्रूड ऑयल की सप्लाई होती है। स्वेज नहर और SUMED पाइपलान मिस्र है और यह कैनाल लाल सागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है। यूरोप और अमेरिका तक तेल पहुंचाने के लिए यह सबसे छोटा और किफायती रूट है। 2025 के पहले छह महीनों की बात करें तो स्वेज नहर और SUMED पाइपलाइन से हर दिन 49 लाख बैरल क्रूड ऑयल की सप्लाई हुई।

बाब अल-मंडेब स्ट्रेट
लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाला Bab el‑Mandeb Strait भी एक अहम समुद्री मार्ग है। यूरोप और अफ्रीका के कई हिस्सों से आने वाला तेल इसी रास्ते से होकर हिंद महासागर की ओर बढ़ता है। नाइजीरिया और अंगोला जैसे अफ्रीकी देशों से निकलने वाला तेल इसी रास्ते यूरोप पहुंचता है। बाब अल-मंडेब स्ट्रेट से 42 लाख बैरल कच्चा तेल निकाला गया।
डेनिश स्ट्रेट
Danish Straits यूरोप का एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है जो बाल्टिक सागर (Baltic Sea) को उत्तरी सागर (North Sea) से जोड़ता है। यह दरअसल कई जलडमरूमध्यों का समूह है, जिनमें मुख्य रूप से Øresund, Great Belt और Little Belt शामिल हैं। यूक्रेन युद्ध से पहले डेनिश स्ट्रेट, रूस के समुद्री रास्ते से यूरोप में तेल एक्सपोर्ट करने का एक जरूरी था। इस स्ट्रेट से 2025 में लगभग 4.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन (49 लाख बैरल/दिन) कच्चा तेल निकाला गया। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार में डेनिश स्ट्रेट का हिस्सा करीब 6% है।
2023 में इस जलडमरूमध्य के जरिए रूस ने भारत को भेजे जाने वाले तेल का एक्सपोर्ट बढ़ाया था क्योंकि भारत ने मिडिल ईस्ट के बजाय रूस से ज्यादा तेल खरीदा।
यह बाल्टिक क्षेत्र के देशों (रूस, स्वीडन, फिनलैंड, पोलैंड आदि) के लिए समुद्री व्यापार का मुख्य रास्ता है। इस मार्ग से रूस और कजाकिस्तान का कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद यूरोप और अन्य देशों तक पहुंचते हैं। यूरोप की ऊर्जा सप्लाई चेन के लिए यह मार्ग रणनीतिक रूप से काफी अहम माना जाता है। बाल्टिक बंदरगाहों से निकलने वाले तेल टैंकर इसी रास्ते से होकर उत्तरी सागर में प्रवेश करते हैं और फिर दुनिया के विभिन्न बाजारों तक पहुंचते हैं।
टर्किश स्ट्रेट
Turkish Straits यूरोप और एशिया के बीच स्थित एक बेहद जरूरी समुद्री मार्ग है। यह दरअसल दो जलडमरूमध्यों- Bosporus Strait और Dardanelles Strait से मिलकर बना है जो काले सागर को Mediterranean Sea से जोड़ते हैं। डार्डानेल्स वॉटरवे मरमारा सी को एजियन और मेडिटेरेनियन सी से लिंक करता है। ये दोनों वाटरवे तुर्की में है।
2025 में इस मार्ग से लगभग 3.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन (37 लाख बैरल/दिन) कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का उत्पादन हुआ। यह वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का करीब 5% हिस्सा है।
यह रूस, कजाकिस्तान और अजरबैजान के तेल निर्यात के लिए अहम रास्ता है। ब्लैक सी के बंदरगाहों से निकलने वाले तेल टैंकर इसी रास्ते से भूमध्य सागर और फिर वैश्विक बाजार तक पहुंचते हैं।
पनामा नहर
पनामा नहर अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। यह नहर मध्य अमेरिका के पनामा में स्थित है। इस नहर से हर साल लाखों बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते हैं। इस नहर की लंबाई 50 मील है।
इस समुद्री रूट से हर दिन लगभग 23 लाख बैरल तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की सप्लाई होती है जो ग्लोबल ट्रेड का महज 3 प्रतिशत है। यह रूट जहाजों को दक्षिण अमेरिका के लंबे चक्कर से बचाता है। अमेरिका, लैटिन अमेरिका और एशिया के बीच ऊर्जा और व्यापार के लिए यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है।
केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope)
केप ऑफ गुड होप अफ्रीका के दक्षिणी सिरे पर स्थित एक प्रमुख समुद्री मार्ग है जो दक्षिण अफ्रीका में पड़ता है। यहां से रोजाना लगभग 91 लाख बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते हैं। यह ग्लोबल ट्रेड का करीब 11 प्रतिशत है।
यह मार्ग तब ज्यादा इस्तेमाल होता है जब स्वेज नहर या बाब अल-मंडेब स्ट्रेट में किसी तरह की रुकावट आती है। यह यूरोप, मध्य-पूर्व और एशिया के बीच समुद्री रूट का वैकल्पिक रास्ता है। अगर लाल सागर या स्वेज नहर का रास्ता बंद हो जाए तो जहाज इसी रास्ते से होकर गुजरते हैं। हालांकि यह रास्ता लंबा और महंगा होता है। इसलिए आमतौर पर इसे बैकअप रूट माना जाता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़
दुनिया का सबसे बड़ा ऑयल शिपिंग रूट स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ (Strait of Hormuz) इन दिनों खबरों में है। अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे ईरान के युद्ध का असर इस स्ट्रेट पर पड़ा है और दुनियाभर में कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे हैं। इस महत्वपूर्ण शिपिंग रूट से तेल टैंकरों की आवाजाही करीब-करीब बंद है। ईरान चाहता है कि उसके Islamic Revolutionary Guard Corps की मंजूरी से ही तेल टैंकर इस स्ट्रेट से गुजरें। भारत की क्रूड ऑयल सप्लाई भी पश्चिम एशिया में जारी इस तनाव से प्रभावित हुई है।
13 मार्च तक शिपिंग जहाजों पर 13 हमले हो चुके हैं जिसके चलते दुनियाभर की शिपिंग कंपनियां और टैंकर इस समुद्री रूट से गुजरने से बच रहे हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है लेकिन इसमें रुकावट आने से ग्लोबल ऑयल सप्लाई और कीमतों पर असर पड़ रहा है।
भारत के लिए क्यों अहम हैं ये समुद्री रास्ते
भारत की ज्यादातर रिफाइनरियां तटीय इलाकों में स्थित हैं। इसलिए समुद्री मार्गों से तेल की सप्लाई देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। इन समुद्री मार्गों पर किसी भी तरह का संघर्ष, समुद्री डकैती या भू-राजनीतिक तनाव तेल की कीमतों और सप्लाई चेन पर सीधा असर डाल सकता है।
यही वजह है कि भारत लगातार अपने तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाने और रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने पर जोर दे रहा है ताकि वैश्विक संकट के समय भी ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो।
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पेट्रोलियम मंत्री ने सदन को बताया कि इस समय रिफाइनरियां हाई कैपेसिटी यूटिलाइजेशन पर काम कर रही हैं। कई मामलों में तो ये 100% से भी ज्यादा हैं। उन्होंने कहा कि देश में पेट्रोल, डीजल, केरोसीन, ATF की कोई कमी नहीं है। इस समय नॉन होर्मुज सोर्सिंग क्रूड इंपोर्ट का लगभग 70% हो गई है। यह पश्चिम एशिया संघर्ष से पहले पहले 55% थी। हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि भारत के 2006 और 2007 में 27 देशों से तेल खरीदता था जो अब बढ़कर 40 हो गए हैं। उन्होंने कहा कि लगातार कई सालों तक लगातार पॉलिसी से बने इस स्ट्रक्चरल डाइवर्सिफिकेशन ने हमें ऐसे ऑप्शन दिए हैं जो दूसरे देशों के पास नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि बड़े LNG कार्गो लगभग रोज दूसरे सप्लाई रास्तों से आ रहे हैं। भारत के पास गैस प्रोडक्शन और सप्लाई के इतने इंतजाम हैं कि लंबे समय तक लड़ाई चलने पर भी यह स्थिति बनी रहेगी। हर घर और इंडस्ट्री के लिए बिजली का प्रोडक्शन पूरी तरह से सुरक्षित है… अब प्रोक्योरमेंट को एक्टिवली डायवर्सिफाई किया गया है और कार्गो यूनाइटेड स्टेट्स, नॉर्वे, कनाडा, अल्जीरिया और रूस से मंगाया जा रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर…
दुनिया के 8 प्रमुख तेल चोकपॉइन्ट्स
Strait of Hormuz: वैश्विक तेल संकट का खतरा
- शिपिंग कंपनियां इस रूट से बच रही हैं
- भारत की क्रूड ऑयल सप्लाई प्रभावित
- दुनियाभर में कच्चे तेल के दाम बढ़े
- ग्लोबल ऑयल सप्लाई और कीमतों पर असर
