पश्चिम एशिया एक बार फिर धधक रहा है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ा हुआ तनाव और एक-दूसरे पर हफ्ते भर से जारी हमले, हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में जहाजों पर हमले, और होर्मुज जलडमरूमध्य पर छाया खतरा-यह सब मिलकर एक ऐसा भू-राजनीतिक तूफान ला चुके हैं, जिसकी आंच भारत तक सीधे पहुंच रही है। इसका असर भी दिखाई दे रहा है।

देश में खाना पकाने की गैस के दाम बढ़ा दिए गए हैं। इसी बीच अमेरिका ने पांच मार्च 2026 को एक नाटकीय फैसला लिया और भारत को रूसी तेल खरीदने की 30 दिन की अस्थायी छूट दी। लेकिन यह छूट जितनी राहत देती नजर आती है, उतनी है नहीं। अमेरिका ने साफ कर दिया है कि यह केवल उस रूसी तेल के लिए है जो जहाजों पर पहले से लदा और समुद्र में फंसा हुआ है। नई खरीद की अनुमति नहीं है। इसके बदले में भारत को भविष्य में अमेरिकी तेल अधिक खरीदना होगा- यानी यह राहत नहीं, एक रणनीतिक दबाव का हथियार है। साथ ही, भारत में उद्योग-धंधों पर असर पड़ रहा है। माल गोदामों में सामान फंसा पड़ा है और गुजरात में औद्योगिक इकाइयां ठप पड़ने लगी हैं। मसले पर सरोकार की पड़ताल।

होर्मुज जलडमरूमध्य मात्र 33 किलोमीटर चौड़ा है, लेकिन इसी संकरे रास्ते से दुनिया के कुल तेल व्यापार का 20 फीसद और भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा गुजरता है। साल 2025 में प्रतिदिन 1.5 करोड़ बैरल कच्चा और 50 लाख बैरल तेल उत्पाद इसी रास्ते से गुजरा। मार्च 2026 तक ब्रेंट क्रूड 85 डालर प्रति बैरल के पार जा चुका था। यह तीन साल का सर्वोच्च स्तर है। पिछले हफ्ते से तुलना करें तो यह 15 फीसद से अधिक की उछाल थी। भारत प्रतिदिन लगभग 55 लाख बैरल तेल की खपत करता है, जिसमें से 15-20 लाख बैरल होर्मुज से गुजरता है।

भारत के पास कितना भंडार?

रयस्टेड एनर्जी के एपीएसी तेल-गैस अनुसंधान के अनुसार भारत के पास इस समय लगभग दस करोड़ बैरल का कच्चा तेल भंडार है। यानी केवल 45 दिनों की मांग के बराबर। वे कहते हैं कि अगले तीन-चार हफ्ते भारतीय रिफाइनरियां सामान्य रूप से चलती रहेंगी, लेकिन यदि मध्य-पूर्व में व्यवधान इससे अधिक लंबा खिंचा तो गंभीर चिंता होगी।

अमेरिका की 30 दिन की छूट…राहत या जाल?

पांच मार्च 2026 को अमेरिकी वित्त मंत्री स्काट बेसेंट ने घोषणा की कि भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने की 30 दिन की अस्थायी छूट दी जा रही है। यह छूट पांच मार्च से चार अप्रैल 2026 तक मान्य है। इसे ओएफएसी का जनरल लाइसेंस 133 कहा गया है। बेसेंट ने ‘एक्स’ पर लिखा- वैश्विक बाजार में तेल का प्रवाह बनाए रखने के लिए वित्त विभाग भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने की अस्थायी 30 दिन की छूट दे रहा है। यह छूट जानबूझकर अल्पकालिक रखी गई है। इससे रूसी सरकार को कोई उल्लेखनीय आर्थिक लाभ नहीं होगा क्योंकि यह केवल उस तेल पर लागू है जो समुद्र में पहले से फंसा है।

छूट की शर्तें-क्या मिला, क्या नहीं?

सवाल: कौन सा तेल आयात कर सकता है भारत?
जवाब: केवल वह रूसी कच्चा तेल जो पांच मार्च से पहले जहाजों पर लादा जा चुका था।

सवाल: क्या नया तेल आयात कर सकता है भारत?
जवाब: नहीं-नई खरीद की अनुमति नहीं, यह पुराने फंसे माल के लिए है।

सवाल: ईरान से जुड़ा तेल भारत आयात कर सकता है?
जवाब: बिल्कुल नहीं, ईरानी मूल का कोई भी तेल इस छूट में शामिल नहीं

सवाल: अमेरिका की शर्त क्या है?
जवाब: भविष्य में भारत को अमेरिकी तेल अधिक खरीदना होगा।

सवाल: भारत को वास्तविक फायदा कितना?
जवाब: केपलर के एक शोध विश्लेषक के अनुसार, समुद्र में फंसे लगभग 14.5 करोड़ बैरल रूसी कच्चे तेल को भारत की ओर मोड़ा जा सकता है- यदि व्यावसायिक सौदे जल्दी पूरे हों।

तेल पर तनाव, पीछे की कहानी

यह छूट भारत के लिए आर्थिक रूप से उतनी फायदेमंद नहीं है, जितनी दिखती है। फरवरी 2026 में रूसी उराल्स क्रूड ब्रेंट से 13 डालर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा था। युद्ध के बाद अब यही तेल ब्रेंट से चार-पांच डालर प्रति बैरल महंगा हो गया है-यानी प्रीमियम पर। एचपीसीएल ने युद्ध से पहले 13 डालर छूट पर दो कार्गो खरीदे थे। आयल एनालिटिक्स, एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी सेरा के मुताबिक इस छूट का उद्देश्य बाजार की भावना को शांत करना और तत्काल आपूर्ति जोखिम को दूर करना है, न कि प्रतिबंध नीति में बदलाव।

होर्मुज में पिछले पांच दिनों में जो व्यवधान हुआ है, वह शायद इतने कम समय में अब तक का सबसे बड़ा आपूर्ति व्यवधान है। इस छूट का लक्ष्य बढ़े हुए भू-राजनीतिक जोखिम से उपजी निकट-भविष्य की आपूर्ति बाधा को रोकना है-प्रतिबंध नीति में बदलाव नहीं। होर्मुज में पांच दिनों का व्यवधान शायद इतने कम समय में अब तक का सबसे बड़ा आपूर्ति संकट है।

यह छूट नि:शुल्क नहीं है। बेसेंट ने स्पष्ट किया कि भारत अमेरिका का अनिवार्य भागीदार है, और हम पूरी तरह अपेक्षा करते हैं कि वह अमेरिकी तेल की खरीद बढ़ाएगा। फरवरी 2026 में ही ट्रंप ने घोषणा की थी कि भारत ने रूसी तेल बंद करने और अमेरिकी-वेनेजुएलाई तेल खरीदने पर सहमति दी है। 50 फीसद शुल्क हटाकर 18 फीसद किया गया था। यानी यह 30 दिन की छूट एक रणनीतिक लेन-देन है, आज की जरूरत पूरी करो, पर अमेरिकी तेल का बाजार बनो। भारत की सामरिक स्वायत्तता पर यह एक और बड़ा दबाव है।

49 अरब डालर दांव पर

विश्व बैंक के अनुसार भारत 2024 में 129 अरब डालर के धन प्रेषण का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता देश बना। इसमें से लगभग 38 फीसद यानी करीब 47-49 अरब डालर खाड़ी देशों से आता है। यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान में मिलकर एक करोड़ से अधिक भारतीय रहते हैं। महाराष्ट्र (20.5%), केरल (19.7%), तमिलनाडु (10.4%), तेलंगाना (8.1%) और कर्नाटक (7.7%) – इन राज्यों के लाखों परिवारों की आजीविका खाड़ी से जुड़ी है।

साल 1990 में जब कुवैत पर हमला हुआ था तब कुल धन प्रेषण 2.1 अरब डालर था। आज यह 60 गुना बढ़ चुका है। जानकार 1990 के खाड़ी संकट से इसे इसलिए ज्यादा गंभीर मान रहे हैं क्योंकि भारत तेल आपूर्ति के लिए मध्य-पूर्व पर जितना निर्भर अभी है, उतना पहले कभी नहीं था। फिर आज 36 साल पहले इतनी बड़ी संख्या में भारतीय मध्य-पूर्व के देशों में नहीं रहते थे। 1990 में तेल पर निर्भरता 77 फीसद थी, आज 87.7 फीसद है।धन प्रेषण का आकार 1991 में 2.1 अरब डालर था, आज 129 अरब डालर (साल 2024) है। यानी यह अब 60 गुना अधिक है। खाड़ी में तब भारतीय 20 लाख थे। आज एक करोड़ से अधिक हैं।

लाल सागर का लंबा रास्ता

लाल सागर और बाब-अल-मंदेब पर हमलों के कारण जहाजों को केप आफ गुड होप का रास्ता लेना पड़ रहा है। इससे यात्रा में 15-20 दिन और लागत में 3-6 लाख डालर प्रति यात्रा की वृद्धि हो रही है। जनवरी 2026 में भारत का व्यापार घाटा 34.68 अरब डालर है यानी तीन महीने का सर्वोच्च। हवाई मार्ग भी प्रभावित हैं। एविलाज कंसल्टंट्स के सीईओ संज लाजर के अनुसार मध्य-पूर्व गलियारा भारत का सबसे बड़ा पश्चिमी हवाई मार्ग है। पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र पहले से बंद हैं। ईरान और खाड़ी का मार्ग भी अवरुद्ध है। इंडिगो और एअर इंडिया की यूरोपीय उड़ानें प्रभावित हुई हैं।

1990 बनाम 2026 की हकीकत

साल 1990-91 के खाड़ी युद्ध के समय भारत की अर्थव्यवस्था आज से बिल्कुल अलग थी। बंद, आत्मनिर्भर और खाड़ी के साथ सीमित जुड़ाव वाली। 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार मात्र तीन हफ्ते का था। आज 640 अरब डालर से अधिक है। यह एक बड़ी सुरक्षा है। लेकिन खुली अर्थव्यवस्था का अर्थ यह भी है कि हर बाहरी झटका सीधे घर तक पहुंचता है। साल 1990 में केवल तेल का झटका था। आज तेल, धन प्रेषण, व्यापार, नौ-परिवहन ढुलाई और कूटनीति-सब एक साथ दांव पर हैं। बीआइएमसीओ के आंकड़े बताते हैं कि भारत 2025 में रूस के समुद्री कच्चे निर्यात का 25 फीसद खरीदता था। 2026 की शुरुआत में यह 34 फीसद घट गया था और अब होर्मुज बंद होने से फिर रूसी तेल की जरूरत आ पड़ी है।

भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस युद्ध में उसके सभी प्रमुख साझेदार अलग-अलग खेमों में हैं। ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और आइएनएसटीसी गलियारा है। इजराइल के साथ रक्षा साझेदारी है। जीसीसी के साथ 179 अरब डालर का व्यापार और लाखों प्रवासियों की आजीविका है। भारत का असली काम अब यह है कि 30 दिन के भीतर समुद्र में फंसे रूसी तेल को भारतीय बंदरगाहों तक लाना, रणनीतिक भंडार बढ़ाना, और ऊर्जा विविधीकरण की दीर्घकालिक नीति को तेज करना। यह संकट एक बार फिर याद दिला रहा है कि सामरिक स्वायत्तता की परीक्षा हर बार अलग तरह की होती है।

बंदरगाहों पर बिगड़ रहे हैं हालात

पांच मार्च 2026 को वह खबर आई, जिसका डर था। दुनिया की सबसे बड़ी नौ-परिवहन कंपनी मैर्स्क ने भारत और मध्य-पूर्व के बीच नया लेन-देन तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया। एमएससी, हापेग-लायड और वन ने भी यही किया। एक ही झटके में भारत के निर्यातकों के सामने वह दरवाजा बंद हो गया, जिससे हर साल 180 अरब डालर का माल गुजरता है। मुंद्रा, जेएनपीटी और चेन्नई बंदरगाहों पर खाड़ी देशों के लिए तैयार कंटेनर के ढेर लगने लगे। जानकारों ने चेतावनी दी कि अगर जहाज रवाना नहीं हुए तो बंदरगाहों पर स्थिति बेकाबू हो जाएगी।

संकट में मोरबी का कारोबार

गुजरात के मोरबी से हर साल तीन अरब डालर से अधिक का ‘सिरेमिक उत्पाद’ निर्यात होता है। इसका सबसे बड़ा बाजार संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कतर हैं। युद्ध के बाद से जेबेल अली बंदरगाह (दुबई) पर कई खेप फंसी हुई हैं। नई मांग आनी बंद हो गई हैं। खरीदारी रोक दी गई है और माल ढुलाई कंपनियों ने 2,000 डालर से 4,000 डालर प्रति कंटेनर का आपातकालीन संघर्ष उपकर लगा दिया है। यह पहले से ही कम मुनाफे पर चलने वाले इस उद्योग के लिए बड़ा झटका है।

चाय का निर्यात: भुगतान फंसा, माल समुद्र में अटका

भारत के कुल चाय निर्यात का 41 फीसद खाड़ी देशों को जाता है। चाय बोर्ड के अनुसार यूएई, ईरान और इराक को मिलाकर साल 2025 में 114.55 मिलियन किलो चाय निर्यात हुई थी। अब नौ-परिवहन कंपनियों ने नई लेन-देन रोक दी है। ईरान में भुगतान फंसा है और माल समुद्र में अटका हुआ है। पूरा पश्चिमी गोलार्द्ध प्रभावित हो गया है। माल भाड़ा दर जो स्थिर थी, अब बढ़ सकती है। अमेरिका और यूरोप को माल की खेप भेजने का समय बढ़ेगा। ईरान में भेजे गए माल का भुगतान फंसा है और सामान भेजने के लिए तैयार पड़ा है।

बासमती चावल की कीमत दस फीसद तक गिरी

पिछले 72 घंटों में बासमती के दाम सात से दस फीसद तक गिर चुके हैं। कंटेनर की भारी कमी है, खाड़ी के लिए जाने वाले जहाजों से होने वाली आपूर्ति रद्द हो रही है और माल भाड़ा 15-20 फीसद बढ़ चुके हैं। बंकर ईंधन 520 से बढ़कर 580 डालर प्रति टन हो गया है।

कोयंबटूर: माल परिवहन में ज्यादा समय, नई खेप अटकी

तमिलनाडु के कोयंबटूर से वस्त्र और ‘वेट ग्राइंडर’ के निर्यात पर सीधा असर पड़ा है। केप आफ गुड होप के रास्ते से माल परिवहन में 20-25 दिन अतिरिक्त लग रहे हैं। जेबेल अली में कई खेप अटकी पड़ी हैं। नई खेप पूरी तरह रुक गई हैं।

हस्तशिल्प: छुट्टी पर भेजे गए कारीगर

उत्तर प्रदेश के संभल और मुरादाबाद के हस्तशिल्प व्यापारियों की हालत सबसे खराब है। हस्तशिल्प ठेकेदारों के शब्दों में, ‘न आर्डर आ रहे हैं, न भुगतान’। सारे कारखाने बंद हैं। कारीगरों को छुट्टी पर भेजना पड़ गया है। फरवरी में दिल्ली में हस्तशिल्प प्रदर्शनी हुई थी, खरीदार आए थे, उम्मीद थी। लेकिन युद्ध शुरू होते ही सब खत्म हो गया।

संघर्ष जारी रहने तक कोई वास्तविक विकल्प नहीं

वाणिज्य मंत्रालय ने दो मार्च को आपातकालीन समीक्षा बैठक बुलाई। एफआइईओ ने मांग की है कि भारतीय मिशन खाड़ी में फंसे भुगतान की वसूली में सक्रिय मदद करें। विशेषज्ञों ने एमएसएमई मंत्रालय से ब्याज सबसिडी और निर्यात ऋण गारंटी बढ़ाने की मांग की है। विशेषज्ञों ने सटीक चेतावनी दी है कि समुद्री माल ढुलाई का कोई वास्तविक विकल्प नहीं है। जब तक संघर्ष जारी रहेगा, मध्य-पूर्व के लिए कंटेनर दाम ऊंचे रहेंगे। इतने विकट संकट में भारत के लिए कई तरह के सबक हैं। 437 अरब डालर के सालाना निर्यात में से बड़ा हिस्सा उन्हीं माल भेजे जाने वाले स्थानों पर निर्भर है जो आज युद्ध की चपेट में हैं। इस स्थिति की गहन समीक्षा होनी चाहिए।

ईरान से आसान नहीं भारतीयों की निकासी

ईरान में फंसे 9,000 भारतीयों में कई वर्ग हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या है मेडिकल विद्यार्थियों की। लगभग 3,000 भारतीय छात्र ईरानी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं, जिनमें से करीब 2,000 कश्मीर घाटी से हैं। इसके अलावा चाबहार बंदरगाह के परियोजना-कर्मी, खुजेस्तान के तेल क्षेत्र के तकनीशियन, कोम और मशहद के शिया तीर्थयात्री और कारोबारी भी शामिल हैं। ईरान यूनिवर्सिटी आफ मेडिकल साइंसेज के एक छात्र ने वीडियो अपील में कहा-हम तेहरान में हैं और यहां मिसाइलें गिर रही हैं। हम सभी भारतीय छात्रों की तरफ से भारत सरकार से गुजारिश है-जल्दी निकालिए।

हालात अलग, हवाई क्षेत्र हैं बंद

विदेश मंत्रालय ने एक मार्च की रात आपातकालीन परामर्श जारी किया- उपलब्ध किसी भी साधन से तुरंत ईरान छोड़ें। उड़ान, आर्मेनिया की ओर से जमीनी मार्ग और यूएई के लिए फेरी-ये तीनों विकल्प सुझाए गए। सरकार की तरफ से तेहरान दूतावास के चार आपातकालीन नंबर जारी किए गए।

खाड़ी के अन्य देशों से निकासी अपेक्षाकृत आसान रही, लेकिन ईरान की स्थिति अलग है। ईरान के ऊपर हवाई क्षेत्र लगभग बंद है। विशेषज्ञों ने कहा कि जब तक हवाई क्षेत्र प्रतिबंध और अस्थिर परिस्थितियां बनी हैं, कोई निकासी अभियान संभव नहीं। इंटरनेट और फोन सेवाएं आंशिक रूप से बाधित हैं।

भारत की ऐतिहासिक मिसाल

भारत इससे पहले भी ऐसे अभियान सफलतापूर्वक चला चुका है। आपरेशन सिंधु (जून 2025-इजराइल-ईरान संघर्ष में 4,415 भारतीयों को निकाला गया), आपरेशन देवी शक्ति (अफगानिस्तान, 2021), आपरेशन गंगा (रूस-यूक्रेन, 2022) और वंदे भारत मिशन (कोविड-19, 2020)-इनका हवाला देते हुए सरकार ने भारतीय नागरिकों को पूरी सुरक्षा का भरोसा दिलाया है।