देश की राजनीति में महिला सशक्तीकरण, दलगत रणनीति और बदलते सत्ता समीकरण एक बार फिर चर्चा में हैं। महिला आरक्षण की बात करने वाले दलों के भीतर महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सवालों के घेरे में है। वहीं तमिलनाडु में कांग्रेस की राजनीतिक सफलता, कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन और पश्चिम बंगाल में सत्ता-विपक्ष की नई परिस्थितियां क्षेत्रीय राजनीति के बदलते स्वरूप को उजागर कर रही हैं। इन घटनाक्रमों ने राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया है।

शक्तिहीन नारी

इस साल जब नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन का विधेयक संसद के विशेष सत्र में पेश किया गया तो लगा था, भाजपा और उसके नेताओं को महिला सशक्तीकरण की परवाह है। विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध भले किया था, लेकिन महिलाओं के प्रति जुबानी जमाखर्च करने में उन्होंने भी कोई कंजूसी नहीं दिखाई थी। फिर पांच राज्यों के चुनाव में प्रधानमंत्री के नेतृत्व में प्रचार के दौरान विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने में भी भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी। भाजपा खुद को इस बात के लिए प्रतिबद्ध बता रही है कि वह महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण देगी। लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनाव में उसने 294 सीटों में से कुल 33 सीटों पर ही महिलाओं को उतारा था।

मतलब करीब 11 फीसद टिकट महिलाओं को दिए थे। भाजपा को 207 सीटें मिली हैं, जिनमें से 21 महिलाएं हैं। इनमें से सात महिलाओं को शुभेंदु अधिकारी सरकार में मंत्री बनाया गया है। 41 मंत्रियों में महज सात महिलाएं, 20 फीसद भी नहीं। साफ है कि जब तक कानून नहीं बनेगा, तब तक महिलाओं को 33 फीसद हिस्सेदारी भाजपा भी नहीं देगी। उधर, कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी तो पहले चरण में 14 मंत्रियों ने शपथ ली है। उनमें एक भी महिला मंत्री नहीं है। केरल की कांग्रेस सरकार में भी सिर्फ दो महिलाएं ही मंत्री हैं। नए बने संगठन काकरोच जनता पार्टी के संस्थापक ने तीन प्रवक्ताओं की नियुक्ति की है पर महिला एक भी नहीं।

कांग्रेस के दांव

इस समय कांग्रेस के दांव सफल हो रहे हैं। तमिलनाडु में पार्टी को 60 साल बाद सत्ता का सुख नसीब हुआ है। टीवीके से हाथ मिलाने के लिए पार्टी ने इंडिया गठबंधन की सहयोगी द्रविड़ मुुनेत्र कषगम से नाता तोड़ने में देर नहीं लगाई। उसके विधानसभा में पांच विधायक हैं। फिर भी मुख्यमंत्री तलपति विजय ने पार्टी को दो मंत्री पद दे दिए हैं। इतना ही नहीं, राज्यसभा की एक सीट भी कांग्रेस के लिए छोड़ दी है। माना जा रहा था कि वे अन्ना द्रमुक के सीवी षणमुगम के त्यागपत्र से खाली हुई इस सीट के उपचुनाव में अपनी पार्टी के किसी नेता को संसद के उच्च सदन भेजेंगे। इससे पहले भी अप्रैल में ही कांग्रेस ने तब की अपनी सहयोगी द्रमुक से भी राज्यसभा की एक सीट ले ली थी। हालांकि, तब उसके अपने 18 विधायकों के बल पर राज्यसभा की सीट जीत पाना संभव नहीं था। इस सीट पर कांग्रेस ने क्रिस्टोफर तिलक को राज्यसभा भेजा था।

‘खातों के पैसे भी उड़ रहे हैं’

दिल्ली में पंद्रह साल राज कर चुकी कांग्रेस पार्टी के नेताओं के सामने कभी पानी उड़ जाने की समस्या सामने नहीं आई। यह दावा कांग्रेस नेता ने शुक्रवार को किया। सोशल मीडिया में चल रहे दिल्ली की मुख्यमंत्री के वीडियो पर उन्होंने तंज किया कि गर्मी में पानी उड़ जाने की वजह से लोगों को परेशानी हो रही है, लेकिन सिर्फ पानी नहीं, योजनाओं के बीच में आम जनता का पैसा भी उड़ रहा है। आम जनता के खातों में आने वाला पैसा भी नहीं पहुंच रहा है, जिसका वादा केंद्र सरकार ने किया था। उन्होंने यहां तक दावा किया कि भाजपा चाहे जितनी कोशिश कर ले, जिस रफ्तार से घोटाले सामने आ रहे हैं, उस रफ्तार से लोगों के खातों मेंपंद्रह साल पूरे होने पर भी पैसे नहीं आएंगे।

बिगड़ा गणित

भाजपा आश्वस्त थी कि जिस तरह राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के झगड़े से या छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के झगड़े से वह आसानी से चुनाव जीत गई, वैसे ही कर्नाटक में सिद्धरमैया और डीके शिवकुमार की खींचतान में वह जीत जाएगी। लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। कांग्रेस आलाकमान ने अपनी ताकत दिखाई और चुनाव से दो साल पहले डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बना दिया। सिद्धरमैया के लोगों को भी समायोजित कर दिया गया है। यहां तक कि उनके बेटे को भी मंत्रिपद मिल गया है। गुटबाजी खत्म होने की संभावना फिर भी नहीं लगती। भाजपा को अब इस गुटबाजी से ही फायदा उठाना है।

पार्टी के जानकार नेताओं का कहना है कि डीके के मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा। भाजपा अभी तक सिद्धरमैया के हिसाब से रणनीति बना कर काम कर रही थी। डीके मुख्यमंत्री नहीं बनते तो अगले चुनाव में भाजपा को आसानी होती। लिंगायत उसके साथ थे और शिवकुमार के मुख्यमंत्री नहीं बनने पर वोक्कालिगा उसके और उसकी सहयोगी जद (सेकु) के साथ आ जाते। अब भाजपा को रणनीति बदलनी पड़ेगी। डीके सबसे बड़ा वोक्कालिगा चेहरा हैं। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद वोक्कालिगा वोट कांग्रेस के साथ और एकजुट होगा। इससे जद (सेकु) की मुश्किलें बढ़ेंगी। भाजपा को अब जद (सेकु) से खास फायदा भी नहीं मिल पाएगा।

पक्ष भी, विपक्ष भी

पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्तापक्ष तो है ही, विपक्ष की भूमिका भी परोक्ष रूप से उसके हाथ आ गई है। चुनाव में भाजपा ने 294 में से 207 सीटें और तृणमूल ने 80 सीटें जीती थीं। लग रहा था कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएगी जिसके पास 29 लोकसभा सांसद और 80 विधायकों की ताकत थी। अब उनकी पार्टी के करीब 60 विधायक अलग हो गए हैं और उन्हें अलग समूह की मान्यता मिली है। तृणमूल से निकाले गए ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता मिल गई है।

ऋतब्रत ने कहा है कि उनका समूह रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएगा और जरूरत पड़ने पर सरकार का विरोध भी करेगा लेकिन जहां सरकार अच्छा काम करेगी वहां उसका समर्थन भी किया जाएगा। उन्होंने साफ कर दिया है कि बंगाल का विपक्ष भी सरकार के साथ है। कौन नहीं जानता कि ऋतब्रत बनर्जी खुद विधायक नहीं जुटा सकते थे। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पर्दे के पीछे से मदद की। वे लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस में रहे और सबको जानते हैं। उन्होंने विधायकों को ऋतब्रत और संदीपन साहा के साथ जोड़ा।