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रोमिला थापर को क्यों पसंद नहीं है नरेंद्र मोदी का भारत, हिंदुत्व के इतिहास को क्यों खारिज करती हैं जेएनयू से जुड़ी प्रोफेसर?

87 साल की रोमिला थापर प्राचीन भारतीय इतिहास की चर्चित प्रोफेसर हैं। दुनिया के 6 विश्वविद्यालय उन्हें मानद उपाधि दे चुके हैं।

रोमिला थापर को क्यों पसंद नहीं है नरेंद्र मोदी का भारत, हिंदुत्व के इतिहास को क्यों खारिज करती हैं जेएनयू से जुड़ी प्रोफेसर?
रोमिला थापर आधी सदी से जेएनयू में पढ़ा रही हैं। (Photo Credit – Express archive)

इतिहासकार रोमिला थापर ने अपने हालिया साक्षात्कार में बताया है कि हिंदुत्वादी राजनीति के प्रतिनिधित्व में भारत उन मूल्यों और आदर्शों के उलट खड़ा है, जिनके लिए भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन हुआ था। थापर का मानना है कि देश की निरंतर चली आ रही यात्रा में एक ब्रेक लग गया है।

87 साल की रोमिला थापर प्राचीन भारतीय इतिहास की चर्चित प्रोफेसर हैं। वह आधी सदी से जेएनयू में पढ़ा रही हैं। दुनिया के 6 विश्वविद्यालय उन्हें मानद उपाधि दे चुके हैं। न्यूज वेबसाइट द वायर के लिए वरिष्ठ पत्रकार करण थापर ने रोमिला थापर का इंटरव्यू किया है, इस साक्षात्कार में इतिहासकार ने हिंदुत्व की राजनीति के खतरों के बारे में भी बताया है।

क्यों पसंद नहीं मोदी का भारत?

जब रोमिला थापर से पूछा गया कि क्या उन्हें मोदी का भारत पसंद नहीं है? तो उन्होंने बहुत स्पष्टता से कहा, नहीं। मुझे मोदी का भारत नहीं पसंद है। क्योंकि यह बहुत संकीर्ण है। यब बहुत सीमित है। इसमें वो समृद्धि नहीं है। मोदी के भारत में उस तरह की कल्पना नहीं है जिस तरह के इंसान हम खुद बना सकते हैं।

रोमिला थापर ने विस्तार से बताया कि कैसे, स्वतंत्रता के बाद, इतिहासकारों ने साक्ष्य के आधार पर भारतीय इतिहास के बारे में अधिक सूक्ष्म और धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाया था। और कैसे पुरातत्व और आनुवंशिकी से जानकारी के नए स्रोतों के साथ ऐसा करना जारी रखा था।

उन्होंने पुनरुत्थानवादी इतिहास की भ्रांतियों के प्रति आगाह किया और बताया कि कैसे इतिहास लेखन के तर्कसंगत तरीके को अपनाए रहने के कारण उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। थापर कहती हैं, “जो हो रहा है वह भारत के औपनिवेशिक इतिहास का पुनरुत्थान है, बस दिखावा किया जा रहा है कि यह स्वदेशी इतिहास है। पेशेवर इतिहासकार जो आज सबूत दिखाते हैं, उन्हें खारिज कर दिया जाता है। क्योंकि उन्हें सबूत चाहिए ही नहीं। वह जिस अतीत में विश्वास करते हैं, उसकी धारणा को बनाए रखना चाहते हैं।”

‘वह इतिहास नहीं है’

पिछले छह से आठ वर्षों में इतिहास को फिर से लिखने के प्रयासों पर जेएनयू की प्रोफेसर एमेरिटा ने कहा, ”मुझे लगता है कि यह एक विकृति है। मुझ पर सबसे बुरे और सबसे घृणित तरीकों से हमला किया गया है क्योंकि मैं एक महिला हूं और महिलाएं विशेष रूप से सेक्सिस्ट हमलों के लिए आसान शिकार हैं…। लेकिन मैं अब भी मानता हूं कि जिस इतिहास को हिंदुत्व के इतिहास के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, वह इतिहास नहीं है।”

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