इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी जंग ने पूरी दुनिया में तेल संकट पैदा कर दिया है। भारत में भी जगह-जगह एलपीजी कमी की चर्चा तेज हो चुकी है। गैस सिलेंडर के लिए लग रही लंबी लाइनें, मीडिया कैमरे के सामने रोते-बिलखते दुकानदारों की दास्तां ये बताने के लिए काफी है कि स्थिति चिंताजनक है। भारत कच्चा तेल, एलएनजी और एलपीजी आयात करता है मगर सबसे ज्यादा संकट एलपीजी को लेकर है। आंकड़ों के द्वारा हम आपको बताएंगे कि आखिर क्यों पेट्रोल, डीजल और एलएनजी की तुलना में एलपीजी को लेकर भारत ज्यादा चिंतित है।

1990 में भारत ने बड़ा आर्थिक सुधार करते हुए अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोल दिया था। तब की नरसिम्हा राव सरकार ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति को अपनाया। पहले जिस एलपीजी के उत्पादन और विपणन का काम सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों के पास था, 1990 के सुधारों के बाद वो बदल गया। नई निजी रिफाइनरियां बनीं, आयात बढ़ा और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार हुआ। इसका असर यह हुआ कि भारत में एलपीजी की उपलब्धता बढ़ने लगी।

1991 के खाड़ी युद्ध के वक्त कितनी LPG खपत?

अगस्त 1990 में इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला कर दिया था। इस हमले के जरिए इराक ने न सिर्फ कुवैत पर कब्जा कर लिया, बल्कि उसे अपना हिस्सा भी घोषित कर दिया। उस समय कुवैत दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों में से एक था। ऐसे में इराक के इस हमले ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी।

कुवैत की मदद के लिए अमेरिका आगे आया और अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म की शुरुआत की। करीब चार दिन तक चले जमीनी युद्ध में इराक बुरी तरह पराजित हुआ और कुवैत को आज़ाद करा लिया गया। हालांकि इस युद्ध ने पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई को लेकर बड़ा संकट पैदा कर दिया।

जून 1990 में कच्चे तेल की स्पॉट मार्केट कीमत लगभग 17 डॉलर प्रति बैरल थी। यह जुलाई 1990 के अंत तक बढ़कर करीब 21 डॉलर प्रति बैरल हो गई। इसके बाद 2 अगस्त 1990 को जब इराक ने कुवैत पर हमला किया, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला और कीमत लगभग 28 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। अक्टूबर तक आते-आते एक समय यह कीमत 40 डॉलर प्रति बैरल तक चली गई थी।

उस समय भारत भी अपनी जरूरत का कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से ही खरीदता था। इसलिए तेल की कीमतों में आई इस तेजी का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा। खाड़ी युद्ध का भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। जनवरी 1991 में भारत के पास मात्र लगभग 89 करोड़ डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत के पास सिर्फ दो सप्ताह के आयात के लिए ही विदेशी मुद्रा बची थी। इसके पीछे सबसे बड़ी वजहों में से एक तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी भी थी।

इसी दौर में भारत में एलपीजी की खपत भी सीमित थी। 1990-91 में भारत में एलपीजी की घरेलू मांग लगभग 2.42 मिलियन टन थी, जो 1991-92 के बीच बढ़कर करीब 2.65 मिलियन मीट्रिक टन हो गई। India Brand Equity Foundation (IBEF) के डेटा के मुताबिक खाड़ी युद्ध के दौरान भारत ने 74 MMT कच्चा तेल आयात किया था। उस दौर में 69.8% तेल आयात के जरिए भारत आया था।

2003 इराक युद्ध के वक्त भारत की LPG स्थिति?

20 मार्च 2003 को अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने मिलकर इराक पर हमला किया था। इस युद्ध में सद्दाम हुसैन को अपनी सरकार गंवानी पड़ी थी। इस युद्ध का सबसे बड़ा कारण यह बताया गया कि इराक के पास विनाशकारी हथियार (Weapons of Mass Destruction) मौजूद हैं। 1990 की तरह 2003 में भी अमेरिकी हमले की वजह से पूरे मध्य-पूर्व में तेल सप्लाई बाधित होने का डर पैदा हो गया था। इसी डर के कारण तेल की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिली थी।

2003 के इराक युद्ध के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत 34 से लेकर 37 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। हालांकि, 1990 की तरह इस बार तेल बाजार को उतना बड़ा झटका नहीं लगा। युद्ध के कुछ महीनों बाद ही तेल की कीमतें एक बार फिर घटकर 25 से 30 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं।

यह वह दौर था जब भारत में एलपीजी की खपत 9.27 मिलियन मीट्रिक टन दर्ज की गई थी। Petroleum Planning and Analysis Cell की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 2000 के बाद से धीरे-धीरे एलपीजी की खपत बढ़ने लगी थी। 2001-02 में भारत में एलपीजी खपत 7.7 मीट्रिक टन दर्ज की गई, 2004-05 में ये आंकड़ा बढ़कर 10.2 मीट्रिक टन पहुंच गया, 2008-09 में एलपीजी खपत 12.2 मीट्रिक टन रही।

भारत में कितने लोग एलपीजी का इस्तेमाल कर रहे हैं, इसे लेकर भी राज्यसभा ने कुछ आंकड़े जारी किए थे। राज्यसभा में दिए आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च, 2003 तक भारत में एलपीजी उपभोक्ता की संख्या 7 करोड़ थी। 31 मार्च 1998 को यह संख्या 3.37 करोड़ थी जो 1999 में 3.81 करोड़ हो गई, 2000 में 4.73 करोड़, 2001 में 5.43 करोड़ और 2002 में 6.35 करोड़। इसका मतलब है कि भारत में पांच सालों के भीतर ही एलपीजी उपभोगक्तों की संख्या दोगुनी से भी अधिक बढ़ गई।

2003 में भारत ने कितनी एलपीजी आयात की, इसे लेकर भी विश्वनीय डेटा मिलता है। लोकसभा में दिए गए जवाब के अनुसार 2002-03 में भारत ने 1.073 मिलियन मीट्रिक टन एलपीजी का आयात किया था। 2003-04 में यह आंकड़ा बढ़कर 1.708 मिलियन मीट्रिक टन हो गया था।

2003
इराक युद्ध काल

भारत में LPG की खपत और आयात

2003 के इराक युद्ध के दौरान भारत में एलपीजी की स्थिति

कुल LPG खपत
(2002-03)
9.27 MMT
LPG उपभोक्ता
(31 मार्च 2003)
7 करोड़

एलपीजी खपत का रुझान (मीट्रिक टन में)

2001-02
7.7 MT
7.7
2002-03
9.27 MT
9.27
2004-05
10.2 MT
10.2
2008-09
12.2 MT
12.2

उपभोक्ताओं की संख्या में वृद्धि (राज्यसभा डेटा)

1998
3.37 करोड़
1999
3.81 करोड़
2000
4.73 करोड़
2001
5.43 करोड़
2002
6.35 करोड़
2003
7 करोड़

एलपीजी आयात (लोकसभा डेटा)

2002-03
1.073 MMT
2003-04
1.708 MMT
+59.2% वृद्धि (एक साल में)
स्रोत: Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC) | राज्यसभा | लोकसभा

वर्तमान ईरान युद्ध के वक्त भारत की LPG खपत, आयात

ईरान-इजरायल युद्ध में भारत की कोई सीधी भागीदारी नहीं है। लेकिन इस युद्ध ने तेल संकट पैदा किया है और उस संकट ने देश में एलपीजी किल्लत को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इस चिंता को आंकड़ों की कसौटी पर परखने की कोशिश करते हैं। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक दशक में भारत में एलपीजी की खपत 60 फीसदी तक बढ़ी है। 2015-16 में जो आंकड़ा 19.6 मिलियन मीट्रिक टन था, वो बढ़कर 2024-25 में 31.3 एमएमटी दर्ज किया गया।

उपभोक्ताओं की बात करें तो 2015-16 में एलपीजी इस्तेमाल कर रहे लोगों की संख्या 16.6 करोड़ थी। वर्तमान में यह आंकड़ा 33 करोड़ है। इसका मतलब है कि उपभोक्ताओं की संख्या में दोगुनी बढ़ोतरी देखने को मिली है।

आयात की बात करें तो पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक भारत वर्तमान में 60 फीसदी एलपीजी आयात कर रहा है। यहां भी 85 प्रतिशत एलपीजी स्ट्रेट ऑफ होमर्ज के रास्ते से होकर भारत आती है।

उज्ज्वला ने खपत बढ़ाई, उत्पादन बन रहा चुनौती

मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत एक मई 2016 को की थी। इस योजना के तहत गरीब परिवारों को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन देना था। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) का डेटा कहता है कि उज्ज्वला योजना के बाद 2017 में एलपीजी उपभोक्ता 19.9 करोड़ हो गए थे. 2018 में आंकड़ा 22.4 करोड़ रहा। फिर चार साल बाद 2022 में आंकड़ा बढ़कर 27.9 करोड़ पहुंच गया। 2023 में 30.5 करोड़ उपभोक्ता दर्ज किए गए और 2025 में 33 करोड़ के करीब पहुंच गए।

एलपीजी कनेक्शन की बात करें तो उसमें भी बढ़ोतरी देखने को मिली है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 2010 से लगातार एलपीजी कनेक्शन का विस्तार हुआ है। 2010 में भारत में एलपीजी के कनेक्शन 10.6 करोड़ थे, मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 2014 में आंकड़ा बढ़कर 14.52 पहुंच गया। फिर 2015 में 14.9 करोड़ कनेक्शन दिए गए। 2016 में यह संख्या 16.6 करोड़ रही। 2025 आते-आते यह संख्या बढ़कर 33 करोड़ हो गई। नीचे दिए गए ग्राफिक से इस ट्रेंड को समझने की कोशिश करते हैं-

PM UJJWALA YOJANA

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना
और एलपीजी विस्तार

गरीब परिवारों को मुफ्त LPG कनेक्शन — एक ऐतिहासिक कदम

शुभारंभ: 1 मई 2016
प्रमुख उपलब्धियाँ
33 करोड़
कुल उपभोक्ता
2025
33 करोड़
कुल कनेक्शन
2025
वृद्धि 2010→2025
कनेक्शन

एलपीजी उपभोक्ता (करोड़ में)

2017
19.9 Cr
19.9
2018
22.4 Cr
22.4
2022
27.9 Cr
27.9
2023
30.5 Cr
30.5
2025
~33 Cr
~33
एलपीजी कनेक्शन विस्तार

पूर्व-उज्ज्वला

2010
10.6 Cr
2014
14.52 Cr
2016
16.6 Cr

उज्ज्वला के बाद

2017
19.9 Cr
2018
22.4 Cr
2023
30.5 Cr
2025
~33 Cr

वृद्धि की तुलना

2010
10.6 Cr
2014
14.52 Cr
+36%
2016
16.6 Cr
2025
~33 Cr
+99%

उज्ज्वला योजना: 1 मई 2016 को शुरू हुई इस योजना में गरीब परिवारों को मुफ्त LPG कनेक्शन दिए गए।

2010 से 2025 तक: LPG कनेक्शन 10.6 करोड़ से बढ़कर लगभग 33 करोड़ हो गए — यानी तीन गुना से अधिक वृद्धि।

स्रोत: PPAC (Petroleum Planning and Analysis Cell) | पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय

अगर राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो एलपीजी कनेक्शनों के मामले में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और बिहार शीर्ष पांच राज्यों में शामिल हैं। नीचे दी गई टेबल से 2019 से 2023 के ट्रेंड को समझने की कोशिश करते हैं, ये सभी आंकड़े पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के हैं-

राज्य/केंद्र शासित प्रदेश2019 (लाखों में)2020 (लाखों में)2021 (लाखों में)2022 (लाखों में)2023 (लाखों में)
चंडीगढ़2.752.82.82.93
दिल्ली49.4249.650.551.554.4
हरियाणा66.146972.174.877.3
हिमाचल प्रदेश17.2719.720.521.121.7
जम्मू और कश्मीर29.8432.333.335.734.6
लद्दाख0.91
पंजाब83.0785.588.591.694.1
राजस्थान154.47162.5167171.7176.6
उत्तर प्रदेश375.98403.8423.2452.3466.2
उत्तराखंड25.2226.527.929.230.8
अरुणाचल प्रदेश2.472.72.833.1
असम63.871.173.779.384.2
मणिपुर5.045.55.96.26.6
मेघालय2.983.23.33.64.1
मिजोरम2.8333.23.33.5
नागालैंड2.472.62.83.13.4
सिक्किम1.371.51.61.71.7
त्रिपुरा6.987.47.67.77.9
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह0.951.11.21.21.2
बिहार164.06175.9186.5206.9217.3
झारखंड51.7256.257.760.763
ओडिशा79.7785.988.994.797.4
पश्चिम बंगाल209.39220.6228.2252.1267.9
छत्तीसगढ़47.875253.257.359.2
दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव1.491.61.61.61.7
गोवा4.8255.25.45.6
गुजरात100.6105.3109115.8122.2
मध्य प्रदेश141.14149.6153.7163.2167
महाराष्ट्र269.28276.3287.6298.5306.4
आंध्र प्रदेश134.01137142.9147.1150.6
कर्नाटक154.13160.2167173.4180.3
केरल86.0987.99193.495.9
लक्षद्वीप0.080.10.10.10.1
पुडुचेरी3.693.73.83.94
तमिलनाडु206.91211.1216.9221.8228.3
तेलंगाना105.55109113.6117.3121.7
सोर्स: पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल

अब सरकार ने एलपीजी कनेक्शन्स तो घर-घर पहुंचाने की कोशिश की, उस वजह से एलपीजी की मांग भी तेजी से बढ़ी। लेकिन इसकी तुलना में उत्पादन उतना नहीं हो पाया है। आंकड़े इस बात की तस्दीक कर रहे हैं। वर्तमान में भारत में इस्तेमाल होने वाली एलपीजी का करीब 41 प्रतिशत से थोड़ा अधिक हिस्सा ही देश के अंदर तैयार हो रहा है। पिछले आठ सालों का डेटा बता रहा है कि घरेलू एलपीजी उत्पादन क़रीब 12 एमएमटी के आसपास है।

भारत के लिए चिंता की बात यह भी है कि भारतीय रिफाइनरियों ने अब तक एलपीजी उत्पादन क्षमता में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं देखी है। 2022-23 में भारतीय रिफाइनरियों में बनने वाली एलपीजी कुल क्रूड प्रोसेसिंग क्षमता का सिर्फ लगभग 4.2 प्रतिशत दर्ज की गई थी। जानकार मानते हैं कि भारत की अधिकांश रिफाइनरियां मुख्य रूप से पेट्रोल और डीजल उत्पादन के लिए डिजाइन हुई हैं, ऐसे में एलपीजी का उत्पादन कुछ कम रहता है। नीचे दिए गए ग्राफिक से एलपीजी के प्रोडक्शन और डिमांड के अंतर को समझने की कोशिश करते हैं-

भारत में एलपीजी की बढ़ती मांग और सीमित घरेलू उत्पादन

मांग तेज़ी से बढ़ी, उत्पादन पिछड़ता रहा — आयात पर निर्भरता बढ़ी

2013-14 से 2022-23
प्रमुख आँकड़े
31.1
मांग (MMT)
12.8
उत्पादन (MMT)
18.3
आयात अंतर

मांग व उत्पादन का वार्षिक रुझान (MMT)

स्रोत: J. M. Baxi Group
मांग
उत्पादन
2013
2014
2015
2016
2017
2018
2019
2020
2021
2022

मांग-उत्पादन का अंतर (आयात की ज़रूरत)

2013
2016
2022
मुख्य अंतर्दृष्टि
+28%
उत्पादन वृद्धि
2013 → 2022
+87%
मांग वृद्धि
2013 → 2022
59%
2022 में आयात निर्भरता
आयात की जरूरत में वृद्धि
स्रोत: J.M. Baxi Group | Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC)

भारतीय रिफाइनरियों ने अब तक एलपीजी उत्पादन क्षमता में खास बढ़ोतरी नहीं की है। 2022-23 में भारतीय रिफाइनरियों में बनने वाली एलपीजी कुल क्रूड प्रोसेसिंग क्षमता का सिर्फ लगभग 4.2 प्रतिशत ही थी। दरअसल भारत की अधिकांश रिफाइनरियां मुख्य रूप से पेट्रोल और डीजल उत्पादन के लिए डिजाइन की गई हैं, जिससे एलपीजी का उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है। इसी वजह से देश में एलपीजी का घरेलू उत्पादन सीमित रहता है।

दोहरी पेट्रोलियम निर्भरता की चुनौती

जानकारों के मुताबिक भारत इस समय दोहरी पेट्रोलियम निर्भरता से जूझ रहा है। इसका मतलब है कि लोगों को अब पेट्रोलियम उत्पादों पर दो तरह से निर्भर रहना पड़ रहा है। पहला तो रहा खाना पकाने के लिए एलपीजी सिलेंडर। वहीं दूसरा पेट्रोल, डीजल और परिवहन किराए के रूप में। अब ये दोनों ईंधन ही सीधे-सीधे वैश्विक आपूर्ति पर निर्भर रहते हैं, इसी वजह से जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अगर कोई भी संकट आता है, भारत के आम घरों को दो तरह की मार झेलनी पड़ती है और उनका बजट भी बिगड़ जाता है।

यह सच है कि पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने एलपीजी कनेक्शन को तेजी से गरीबों तक पहुंचाया है। लेकिन पहले की तुलना में अब रोजमर्रा के काम- खाना बनाना, यात्रा करना और घर का खर्च अब सीधे-सीधे वैश्विक पेट्रोलियम आपूर्ति से जुड़ चुके हैं। इसी वजह से तेल संकट होने पर भारत में चुनौतियां ज्यादा बढ़ जाती हैं।

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