अमृतसर के गोल्डन टेम्पल को अलगाववादियों से आजाद कराने की सैन्य कार्रवाई ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ को 42 साल पूरे हो गए। 06 जून 1984 की देर रात जरनैल सिंह भिंडरावाले की मौत के बाद लाश मिलने पर यह सैन्य अभियान खत्म हुआ था।

इस सैन्य अभियान 83 सेना के जवान मारे गए थे, इनमें तीन अधिकारी भी शामिल थे। इस दौरान कुल 492 लोग मारे गए थे और 248 लोग घायल हुए थे।

इंदिरा गांधी को क्यों करना पड़ा था ऑपरेशन ब्लू स्टार?

भारत के आधुनिक इतिहास में सबसे विवादास्पद सैन्य कार्रवाईयों में से ऑपरेशन ब्लू स्टार थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किसी एक दिन के राजनीतिक फैसले के कारण इस ऑपरेशन की मंजूरी नहीं दी थी बल्कि यह फैसला वर्षों से चले आ रहे भिंडरावाले के अलगाववाद और आतंक फैलाने के कारण लिया गया था। ऐसे में आज ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी पर जानेंगे कि इंदिरा गांधी को क्यों करना पड़ा था ऑपरेशन ब्लू स्टार?

बात 1970 के दशक के अंत की है, जरनैल सिंह भिंडरावाले तेजी से पंजाब में प्रभावशाली धार्मिक नेता बनकर उभरा। तब पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल का बोल बाला था। उस समय कांग्रेस पंजाब में अपने मजबूती के लिए जमीन तलाश रही थी, इस दौर में जरनैल सिंह तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे।

शुरुआत में कांग्रेस के कुछ नेताओं को जरनैल सिंह अकाली दल के लिए चुनौती लगे, लेकिन बाद में वे केंद्र और राज्य सरकार दोनों के लिए एक बड़ा चुनौती बन गए।

साल 1973 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया, इसमें राज्यों को अधिक अधिकार देने, पंजाब के हितों की रक्षा और सिख पहचान से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे। केंद्र सरकार और कई राष्ट्रीय दलों ने इसके कुछ पहलुओं को संघीय ढांचे के लिए चुनौती माना।

शुरुआत में तो भिंडरावाले को एक धार्मिक नेता के रूप में माना गया, जो युवाओं को शराब, नशे और सामाजिक बुराइयों से दूर रहने की सलाह देता था। पर समय के साथ- साथ लोकप्रियता धार्मिक सीमाओं से निकल राजनीतिक प्रभाव में बदलने लगी और कुछ समय बाद केंद्र सरकार को लगा कि यह सिर्फ एक धार्मिक आंदोलन नहीं रह गया है।

1978 में पहला टकराव भी देखने को मिला

13 अप्रैल 1978 को अमृतसर में सिखों और निरंकारी के बीच वैचारिक और धार्मिक कारणों से हिंसक झड़प हुई। सिखों की अगुवाई जरनैल सिंह भिंडरांवाले कर रहे थे। इ इसमें 16 लोगों की मौत हो गई थी और करीबन 150 लोग घायल हुए थे। इसी घटना के बाद पंजाब में जरनैल सिंह भिंडरावाले की प्रसिद्धि तेजी से फैली, जो राज्य में 1980 आते-आते चरमपंथ व उग्रवाद के पंजों में जकड़ गई। अब भिंडरावाले केवल धार्मिक प्रचारक नहीं रहे, बल्कि सिख अस्मिता से भी जोड़कर देखे जाने लगे। साल दर साल भिंडरावाले की कट्टरता बढ़ती रही।

विरोध में होने लगी कई हत्याएं

साल 1981 में पंजाब केसरी के संपादक लाला जगत नारायण की सरेआम हत्या कर दी क्यों वे उग्रवाद के खिलाफ लिखते रहते थे। पुलिस ने इस मामले में भिंडरावाले को आरोपी बनाया, लेकिन पर्याप्त सबूत न होने के कारण उन्हें छोड़ दिया गया। इसके बाद राज्य में आए दिन पुलिस अधिकारियों व राजनेताओं की हत्याएं होने लगी। बम विस्फोट होने लगे और उग्रवादी गतिविधियां तेजी से लगातार बढ़ने लगीं। पंजाब धीरे-धीरे अशांति की बढ़ने लगा।

1983 में डीआईजी ए.एस. अटवाल, जो पंजाब में बढ़ रहे उग्रवाद और खालिस्तानी चरमपंथियों के खिलाफ कड़ा रूख अपनाए हुए थे। उनकी स्वर्णमंदिर की सीढ़ियों पर गोली मारकर हत्या कर दी गई। इतना ही नहीं पुलिस उनके शव को उठाने की हिम्मत तक जुटा न सकी। पुलिस के आला अफसरों को भिंडरावाले से मिन्नतें करनी पड़ी।

फिर अक्टूबर 1983 में उग्रवादियों ने एक बस को रोककर हिंदू यात्रियों को चुन-चुनकर गोली मार दी। कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ती दिखे इसके अगले ही दिन इंदिरा गांधी ने पंजाब के तत्कालीन दरबारा सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया और पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा दिया।

गिरफ्तारी के डर से स्वर्ण मंदिर में जमाया डेरा

इस कांड के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए जरनैल सिंह भिंडरावाले ने हरमंदिर परिसर (स्वर्ण मंदिर) को अपना मुख्यालय बना लिया। पहले वह गुरु नानक निवास में रहा फिर वह सिखों के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक केंद्र अकाल तख्त पर काबिज हो गया।

मंदिर में जमा हो रहे थे आधुनिक हथियार

अब यहां हथियारों की तस्करी भी शुरू हो चुकी थी और इसमें उनका साथ भारतीय सेना के निष्कासित जनरल शाबेग सिंह ने दिया और स्वर्ण मंदिर परिसर की अभेद्द किलेबंदी कर डाली। मंदिर के अंदर भारी मात्रा में आधुनिक हथियार, मशीन गन, आरपीजी और गोला-बारूद तस्करी कर जमा कर लिए गए थे। इतना ही नहीं बंकर भी बनाए जा रहे थे।

भिंडरावाले के समर्थक इसे लेकर कहते थे कि यह आत्मरक्षा के लिए हैं जबकि सरकार का मानना था कि यह सशस्त्र विद्रोह की तैयारी है। पूरा मंदिर परिसर उग्रवादियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह में तब्दील हो गया था, यहीं बैठकर हिंसक वारदातों की योजनाएं बनाई जाने लगीं।

पहले सैन्य कार्रवाई से बचना चाहती थी इंदिरा सरकार

इधर इंदिरा सरकार धार्मिक दृष्टिकोण के मद्देनजर सैन्य कार्रवाई से बचना चाहती थी, इसलिए उन्होंने कूटनीति और राजनीति का रास्ता अपनाया। उनकी सरकार ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को लागू करने की मांग कर रहे अकाली दल के साथ बातचीत शुरू कर दी, कई बार सरकार और अकाली दल के बीच वार्ता हुई।

जैसे-तैसे सरकार और उदारवादी अकाली दल के नेताओं के बीच समझौते की स्थितियां बनी, लेकिन भिंडरावाले के डर और उसकी चरमपंथी मांगों के आगे अकाली नेता पीछे हट जाते। भिंडरावाला किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं हुआ, इससे शांति की सभी कोशिश नाकाम हो गईं।

अनाज नाकाबंदी की धमकी

मई 1984 के अंत में अकाली दल ने घोषणा कर दी कि 3 जून 1984 से वे पूरे राज्य में एक बड़ा आंदोलन चलाएंगे, जिसके तहत पंजाब से देश के अन्य हिस्सों में जाने वाले अनाज खासकर गेहूं की आपूर्ति को पूरी तरह रोक दी जाएगी। चूंकि पंजाब को उस समय भारत का अन्न भंडार कहा जाता था, ऐसे में यह नाकाबंदी पूरे देश में भुखमरी और आर्थिक संकट पैदा कर सकती थी।

देश की अखंडता पर खतरा

इंदिरा गांधी के सामने जनवरी 1985 तक आम चुनाव की एक बड़ी चुनौती थी, पूरे देश में संदेश जा रहा कि केंद्र पंजाब के उग्रवादियों के सामने पूरी तरह लाचार है। इसी दौरान खुफिया एजेंसियों ने इनपुट दिए कि उग्रवादियों को पाकिस्तान से भारी तादाद में हथियार और ट्रेनिंग दी जा रही है। इससे देश की अखंडता को सीधा खतरा था।

ऑपरेशन ब्लू स्टार को हरी झंडी

अमृतसर में हथियारों की बढ़ती नुमाइश, समानांतर सरकार का चलना और देश के बंटवारे के खतरे को भांपते हुए इंदिरा गांधी ने मान लिया कि बस बहुत हो गया, अब पानी सिर के ऊपर जा चुका है। 1 जून को बातचीत के अंतिम प्रयास फेल होने के बाद इंदिरा ने भारी मन से भारतीय सेना को अमृतसर में घुसने की हरी झंडी दे दी और ऑपरेशन का नाम रखा गया ऑपरेशन ब्लू स्टार।

2 जून 1984 को इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो पर देश को संबोधित करते हुए भावुक अपील की- खून मत बहाओ, नफरत छोड़ो। लेकिन पर्दे के पीछ सेना अमृतसर और स्वर्ण मंदिर को घेर चुकी थी। 2 जून को पंजाब में कर्फ्यू लगा दिया गया, संचार के सारे माध्यम बंद कर दिए गए। फिर 5 जून की रात सेना ने कार्रवाई शुरू की, सेना को कई जगहों पर भारी गोलीबारी का सामना करना पड़ा। रातभर लड़ाई चली, स्थिति इतनी कठिन हो गई कि सेना को बख्तर बंद गाड़ियों की जरूरत पड़ गई और फिर 6 जून की रात को सेना ने टैंकों और भारी हथियारों के साथ मंदिर में प्रवेश किया।

इस ऑपरेशन में जरनैल सिंह भिंडरावाले और शाबेग सिंह मारे गए, लेकिन अकाल तख्त को भी भारी नुकसान पहुंचा। साथ ही सैकड़ों आम श्रद्धालुओं को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। इसी सैन्य कार्रवाई के आक्रोश में कुछ माह बाद 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की उनके ही सिख अंगरक्षकों ने गोली मार कर हत्या कर दी।