Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति को केवल चुनावी नतीजों, अपराध के आंकड़ों या राजनीतिक हिंसा की खबरों से समझना हमेशा अधूरा रहा है। यह वह राज्य है, जहां सत्ता परिवर्तन सिर्फ सरकार बदलने की घटना नहीं होता, बल्कि समाज की गहरी संरचना, पहचान और भरोसे में आए बदलाव का संकेत देता है। शायद यही वजह है कि यहां न तो कांग्रेस लंबे समय तक टिक पाई, न 34 वर्षों तक शासन करने के बाद सीपीएम अपनी सत्ता बचा सकी और न ही लगातार आक्रामक मौजूदगी के बावजूद भाजपा अब तक सत्ता का दरवाजा खोल पाई है—जबकि हिंसा, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक आरोप हर दौर में मौजूद रहे हैं।
वाम शासन से दीदी की राजनीति तक भाजपा का नैरेटिव
सवाल यह नहीं है कि बंगाल में हिंसा क्यों जारी है, बल्कि यह है कि हिंसा के बावजूद सत्ता क्यों नहीं बदलती। ज्योति बसु के वाम शासन से लेकर ममता बनर्जी की ‘दीदी राजनीति’ तक और भाजपा के राष्ट्रवादी नैरेटिव तक, बंगाल की राजनीति बार-बार यह संकेत देती है कि यहां चुनावी जीत का पैमाना कानून-व्यवस्था से ज्यादा भरोसा, स्थानीय जुड़ाव और सामाजिक प्रतिनिधित्व है। यही वह बिंदु है, जहां सीपीएम सत्ता से बाहर हुई, ममता बनर्जी अब तक टिकी हुई हैं और भाजपा आज भी निर्णायक चुनौती बनने के लिए जूझ रही है।
राजनीतिक इतिहासकार तथा हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के भतीजे सुगाता बोस और कोलकाता के सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज़ (CSSSC) के पूर्व निदेशक समाजशास्त्री पार्थ चटर्जी बार-बार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि बंगाल में राजनीति “केवल शासन” नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक प्रतिनिधित्व का बड़ा सवाल रहा है। वोटर यह नहीं देखता कि हिंसा है या नहीं, बल्कि यह देखता है कि सत्ता में बैठा दल उसके समाज, उसकी पहचान और उसकी रोजमर्रा की सच्चाइयों को कितना दिखाता है या समझता है। यही सूत्र बंगाल में ज्योति बसु के लंबे शासन, सीपीएम के पतन, ममता बनर्जी के उभार और भाजपा की सीमाओं — तीनों को एक साथ जोड़ता है।
वामपंथी युग: पार्टी राज्य से बड़ी हो गई और सरकार पार्टी की शाखा बन गई
1977 से 2011 तक चला वाम मोर्चा शासन भारतीय लोकतंत्र में एक अपवाद था। ज्योति बसु के नेतृत्व में सीपीएम ने जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार और पंचायत व्यवस्था को मजबूत किया। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक अतुल कोहली अपने अध्ययन भारत में राज्य और गरीबी (State and Poverty in India) में लिखते हैं कि बंगाल का वाम शासन गरीबों को राजनीतिक प्रक्रिया में लाने में सफल रहा। यह उसका ऐतिहासिक योगदान था। लेकिन वही शासन धीरे-धीरे संगठन-केंद्रित होता चला गया। पार्टी राज्य से बड़ी हो गई और सरकार पार्टी की शाखा बनती गई।
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पद्म भूषण से सम्मानित इतिहासकार रामचंद्र गुहा और नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन दोनों ने अलग-अलग संदर्भों में यह कहा कि वाम शासन ने सामाजिक न्याय तो दिया, लेकिन आर्थिक अवसर और राजनीतिक लचीलापन खो दिया। सिंगूर और नंदीग्राम केवल भूमि विवाद नहीं थे, वे संकेत थे कि राज्य सत्ता और समाज के बीच संवाद टूट रहा है। सीपीएम की वाम राजनीति वर्ग आधारित थी, लेकिन बदलते बंगाल में जाति, पहचान, आकांक्षा और सांस्कृतिक स्वाभिमान जैसे तत्व अधिक प्रभावी हो चुके थे। यहीं से वह जगह बनी, जहां ममता बनर्जी का उदय संभव हुआ।
ममता बनर्जी: पार्टी नहीं, व्यक्तित्व आधारित सत्ता
राजनीतिक विचारक पार्थ चटर्जी ममता बनर्जी को “पोस्ट-लेफ्ट पॉपुलिज़्म” का उदाहरण मानते हैं। ममता की राजनीति विचारधारा से अधिक अनुभूति आधारित रही है। उन्होंने सीपीएम के खिलाफ वैचारिक बहस नहीं छेड़ी, बल्कि यह संदेश दिया कि सत्ता “संगठन” नहीं बल्कि “जनता” के पास होनी चाहिए।
2011 के बाद तृणमूल कांग्रेस का शासन संस्थागत रूप से कमजोर लेकिन सामाजिक रूप से व्यापक हुआ। ममता बनर्जी ने — कन्याश्री, लक्ष्मी भंडार, स्वास्थ्य साथी — जैसी योजनाओं के जरिए सीधे उन समूहों तक पहुंच बनाई, जो पहले राजनीतिक रूप से हाशिये पर थे, खासकर महिलाएं।
भारतीय राजनीति और राजनेताओं पर गहरी नजर रखने वाले फ्रांसीसी राजनीतिक विश्लेषक क्रिस्टोफ जाफरलॉट (Christophe Jaffrelot) और गाइल्स वर्नियर्स (Gilles Verniers के चुनावी अध्ययनों में यह सामने आता है कि बंगाल में महिलाओं का मतदान व्यवहार अब पार्टी से अधिक नेतृत्व-भरोसे पर आधारित है। ममता की “दीदी” छवि इसी का नतीजा है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार या हिंसा के आरोप सत्ता को कमजोर तो करते हैं, लेकिन उसे गिरा नहीं पाते।
उनके अनुसार, भारत के कई राज्यों में सत्ता परिवर्तन केवल सरकार की विफलताओं से निर्धारित नहीं होता, बल्कि इस बात से भी कि विपक्ष सामाजिक गठबंधनों और संगठनात्मक तंत्र को कितनी गहराई से चुनौती दे पाता है। बंगाल में भाजपा की चुनौती इसी संदर्भ में अटकती दिखाई देती है।
भाजपा की सीमा: राष्ट्रीय राजनीति बनाम क्षेत्रीय समाज
भाजपा की बंगाल में असफलता का मूल कारण चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि राजनीतिक संरचना का असंतुलन है। भाजपा का उभार उत्तर और पश्चिम भारत में उस सामाजिक गठजोड़ से हुआ, जहां जाति-धर्म-राष्ट्रवाद की राजनीति ऐतिहासिक रूप से प्रभावी रही है। लेकिन बंगाल में सामाजिक चेतना अलग तरह से विकसित हुई। इतिहासकार और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे सुमित सरकार बताते हैं कि बंगाल की राजनीतिक संस्कृति में “धर्म” हमेशा सार्वजनिक जीवन से दूरी पर रहा है, जबकि भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक अस्मिता राजनीति का केंद्र रही है। भाजपा का मुख्य राजनीतिक नैरेटिव — हिंदुत्व और राष्ट्रवाद — बंगाल में स्थानीय अनुभव से मेल नहीं खाता। इसके अलावा पार्टी के पास ऐसा क्षेत्रीय चेहरा नहीं उभर सका, जो ममता की तरह सामाजिक रूप से स्वीकार्य हो।
यह भी महत्वपूर्ण है कि भाजपा ने बंगाल में वामपंथ के संगठनात्मक ढांचे को तोड़ा, लेकिन उसकी जगह स्थायी सामाजिक नेटवर्क नहीं बना पाया। चुनावी समाजशास्त्र के अध्येता और चुनावी विश्लेषक योगेंद्र यादव के अनुसार- किसी भी राज्य में सत्ता के लिए केवल विरोध पर्याप्त नहीं होता, बल्कि “जनता का भरोसा जीतने वाला नेता” जरूरी होता है।
हिंसा: स्थायी समस्या, निर्णायक कारक नहीं
बंगाल में राजनीतिक हिंसा कोई नई घटना नहीं है। यह सीपीएम के वाम शासन में भी थी, ममता बनर्जी के तृणमूल शासन में भी है और सत्ता संघर्ष के दौर में बढ़ती रही है। लेकिन राजनीतिक इतिहास बताता है कि हिंसा कारण नहीं, बल्कि सत्ता संघर्ष का परिणाम होती है।
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मतदाता हिंसा को नैतिक समस्या के रूप में देखता है, लेकिन चुनावी निर्णय अकसर जीवन के भौतिक हालातों — आय, सुरक्षा, सामाजिक योजनाएं और पहचान — से तय होते हैं। इसीलिए हिंसा के बावजूद सत्ता परिवर्तन नहीं होता।
आगे क्या हो सकता है: इतिहास क्या संकेत देता है
इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों की व्यापक सहमति है कि बंगाल में सत्ता तभी बदलेगी, जब कोई विकल्प सामाजिक रूप से उतना ही जनता में जुड़ाव रखने वाला हो, जितना तृणमूल है। केवल केंद्र की ताकत, राष्ट्रीय नेतृत्व या वैचारिक आक्रामकता से यह संभव नहीं होगा।
ममता बनर्जी की राजनीति व्यक्तिगत नेतृत्व पर आधारित है। इतिहास बताता है कि ऐसी सत्ता तब कमजोर होती है, जब नेतृत्व अपना भरोसा खो देता है या सामाजिक गठबंधन टूटता है — फिलहाल ऐसा नहीं हुआ है।
बंगाल की राजनीति को समझने की कुंजी हिंसा या भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि समाज और सत्ता के रिश्ते में छिपी है। सीपीएम की वाम सरकार गिरी क्योंकि वह समाज से कट गई। भाजपा नहीं उभर पा रही क्योंकि वह समाज में गहरी जड़ें नहीं जमा सकी है। ममता बनी हुई हैं क्योंकि उन्होंने राज्य को एक राजनीतिक पहचान दी — चाहे वह प्रशासनिक रूप से कितनी भी विवादास्पद क्यों न हो। बंगाल में सत्ता का सवाल अंततः यही है: कौन राज्य के समाज को अपने भीतर प्रतिबिंबित कर पाता है।
