एनर्जी ड्रिंक्स पर अब सरकार की सख्ती बढ़ गई है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने कई कैफीनयुक्त पेय बनाने वाली कंपनियों को नोटिस जारी किया है। स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उत्पादों पर ‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही ऐसे दावे भी नहीं किए जाने चाहिए कि इन्हें पीने से शरीर में ऊर्जा बढ़ती है या फोकस बेहतर होता है।

फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक मानक तय नहीं किया गया है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि कौन-सा पेय ‘एनर्जी ड्रिंक’ की श्रेणी में आएगा। इस बात पर भी जोर दिया गया है कि कोई भी खाद्य उत्पाद ऐसे दावे नहीं कर सकता जिनका वैज्ञानिक आधार उपलब्ध न हो।

असल में, बाजार में मौजूद ज्यादातर तथाकथित एनर्जी ड्रिंक्स में कैफीन और चीनी दोनों की मात्रा अधिक होती है। अगर 250 एमएल के एक सामान्य कैन की बात करें तो उसमें करीब 75 एमजी कैफीन और 27 ग्राम एडेड शुगर होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह लगभग 7 चम्मच चीनी के बराबर है। इसके अलावा इनमें टॉरिन, ग्लूकुरोनोलैक्टोन और कुछ विटामिन भी मौजूद रहते हैं। हालांकि सबसे बड़ी चिंता कैफीन और एडेड शुगर को लेकर ही है। डॉक्टर सप्तर्षि भट्टाचार्य भी इसी बात पर जोर देते हैं।

अगर कैफीन की बात करें, तो यह कुछ समय के लिए थकान कम कर सकता है और अलर्टनेस बढ़ा सकता है। लेकिन FSSAI स्पष्ट करता है कि कैफीन केवल अस्थायी रूप से नींद की कमी को कम करता है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि शरीर को पर्याप्त नींद की जरूरत नहीं होती। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह बात समझना जरूरी है क्योंकि कैफीन खुद कोई नई ऊर्जा पैदा नहीं करता, बल्कि केवल कुछ समय के लिए व्यक्ति को अधिक सतर्क बनाता है। शरीर को पूरी तरह रिकवर होने के लिए पर्याप्त नींद की आवश्यकता होती है।

अगर टॉरिन की बात करें तो यह भारत में बिकने वाली कई एनर्जी ड्रिंक्स का एक प्रमुख घटक है। यह एक अमीनो एसिड है, जो मांसपेशियों के कामकाज, कैल्शियम रेगुलेशन और नर्वस सिस्टम की गतिविधियों में भूमिका निभाता है। हालांकि अभी तक ऐसे पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले हैं कि केवल टॉरिन की वजह से ऊर्जा में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है। इसी तरह विटामिन-बी शरीर में एनर्जी के लिए जरूरी जरूर है, लेकिन यह कभी भी इंस्टेंट फ्यूल की तरह काम नहीं करता।

वैसे ‘एनर्जी’ शब्द अपने आप में ही कुछ हद तक भ्रम पैदा करता है। न्यूट्रिशन की भाषा में एनर्जी का मतलब सिर्फ कैलोरी होता है, जबकि आम बोलचाल में इसे अलर्टनेस, स्टैमिना और बेहतर प्रदर्शन से जोड़कर देखा जाता है। इन पेयों में अलर्टनेस बढ़ाने का काम कैफीन करती है जबकि कैलोरी चीनी से मिलती है। लेकिन कई बार मार्केटिंग के जरिए इन दोनों चीजों के बीच का फर्क धुंधला कर दिया जाता है। इससे उपभोक्ताओं को लगने लगता है कि स्टिमुलेशन और ऊर्जा एक ही चीज हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि इन उत्पादों को Caffeinated Beverage कहना ज्यादा उचित होगा, न कि एनर्जी ड्रिंक।

विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि कैफीन को पूरी तरह नकारात्मक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। अगर सही मात्रा में इसका सेवन किया जाए तो यह सुरक्षित माना जाता है। एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति रोजाना 400 एमजी तक कैफीन ले सकता है। इसमें चाय, कॉफी, कोला, चॉकलेट, सप्लीमेंट और अन्य कैफीनयुक्त पेय भी शामिल हैं। वहीं किशोरों के लिए 75 एमजी तक कैफीन सुरक्षित माना जाता है। समस्या तब पैदा होती है जब एक ही दिन में या कम समय के भीतर कई कैफीनयुक्त पेय पी लिए जाते हैं।

जरूरत से ज्यादा कैफीन लेने पर धड़कन तेज होना, घबराहट, हाथ कांपना, अनिद्रा और ब्लड प्रेशर बढ़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी कैफीन का सीमित सेवन करने की सलाह दी जाती है। वहीं बच्चों और किशोरों को ऐसे पेयों से बचने की सलाह दी जाती है क्योंकि इनमें मौजूद स्टिम्युलेंट्स के दुष्प्रभाव हो सकते हैं।

एनर्जी ड्रिंक्स में केवल कैफीन ही चिंता का विषय नहीं है बल्कि इनमें मौजूद चीनी भी बड़ी समस्या है। 250 एमएल के एक कैन में करीब 27 ग्राम एडेड शुगर, यानी लगभग 7 चम्मच चीनी होती है। अगर किसी व्यक्ति को डायबिटीज है तो इतनी अधिक मात्रा में चीनी लेना नुकसानदायक हो सकता है। वहीं खाली पेट ऐसे पेय का सेवन करने से परेशानी और बढ़ सकती है।

एनर्जी ड्रिंक्स को लेकर यह दावा भी किया जाता है कि इससे एक्सरसाइज परफॉर्मेंस बेहतर होती है और शरीर हाइड्रेट रहता है। लेकिन सच्चाई यह है कि स्पोर्ट्स ड्रिंक और एनर्जी ड्रिंक दोनों अलग-अलग चीजें हैं। स्पोर्ट्स ड्रिंक खास तौर पर शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी पूरी करने के लिए बनाई जाती हैं जबकि एनर्जी ड्रिंक्स कैफीनयुक्त स्टिम्युलेंट बेवरेज होती हैं जिनका मुख्य उद्देश्य अलर्टनेस बढ़ाना होता है। इनका हाइड्रेशन से सीधा संबंध नहीं होता।

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