चुनाव आयोग पर द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार सुर्खियों में आ गए हैं। चुनाव आयोग के प्रमुख के तौर पर उनका करीब 19 महीने का कार्यकाल कई विवादों से घिरा रहा है।

ज्ञानेश कुमार पहले ऐसे मुख्य चुनाव आयुक्त हैं, जिनकी नियुक्ति उस विवादित कानून के लागू होने के बाद हुई है, जिसके तहत चुनाव आयोग के प्रमुख के चयन की व्यवस्था बदली गई है। चयन समिति में अब सरकार का पलड़ा भारी है।

ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के दौरान कई राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर काफी विवाद हुआ। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल लगातार कुमार पर आरोप लगाते रहे हैं कि वह चुनाव आयोग का इस्तेमाल सत्तारूढ़ पार्टी के फायदे के लिए कर रहे हैं। हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त ने इन आरोपों को खारिज किया है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सामने आया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में उनकी जानकारी के बिना लिए गए निर्णयों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति जताई। तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के इन दोनों सदस्यों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर अपनी चिंताएं बताईं। इस रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता की कमी को सामने रखा है।

ज्ञानेश कुमार: केरल से कश्मीर और फिर अयोध्या तक

ज्ञानेश कुमार को मोदी सरकार का भरोसा हासिल करने वाले अधिकारी के तौर पर जाना जाता है। वह 1988 बैच के केरल कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी हैं। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर दी गई उनकी प्रोफाइल के मुताबिक, उन्होंने IIT-कानपुर से बीटेक किया है और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पर्यावरण अर्थशास्त्र का कोर्स किया है।

वर्ष 1990 में ज्ञानेश कुमार की पहली नियुक्ति केरल के पथनमथिट्टा में उप-जिलाधिकारी के तौर पर हुई। इसके बाद उन्होंने राज्य सरकार के अलग-अलग विभागों में काम किया। 2012 में वह दिल्ली स्थित केरल हाउस में रेजिडेंट कमिश्नर बने।

ज्ञानेश कुमार के प्रशासनिक करियर में बड़ा बदलाव तब आया, जब उन्हें इस पद से हटाकर मई 2016 में केंद्रीय गृह मंत्रालय के कश्मीर डिवीजन में संयुक्त सचिव बनाया गया। उस समय गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी राजनाथ सिंह के पास थी। यह वह दौर था जब घाटी में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के नेतृत्व में आतंकवाद की नई लहर देखने को मिली थी। उस समय जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा की गठबंधन सरकार थी।

2019 में अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद ज्ञानेश कुमार को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई। इस कानून के जरिए जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटा गया और अनुच्छेद 370 को खत्म किया गया। यह भाजपा के पुराने वैचारिक एजेंडे में शामिल प्रमुख मुद्दों में से एक था।

कहा जाता है कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर की स्थिति संभालने में कुमार की भूमिका ने उन्होंने अमित शाह का भरोसा हासिल करने में मदद किया। इसके बाद उन्हें राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की जिम्मेदारी दी गई। यह ट्रस्ट अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की देखरेख करता था।

2020 में ज्ञानेश कुमार के करियर में थोड़ी रुकावट आई। सरकार ने 1988 बैच के 24 आईएएस अधिकारियों को सचिव पद के लिए पैनल में शामिल किया, लेकिन कुमार का नाम इसमें नहीं था। हालांकि, फरवरी 2021 में उनकी वापसी हुई और उन्हें संसदीय कार्य मंत्रालय का सचिव बनाया गया। इसके बाद अमित शाह ने उन्हें अपने अधीन बने नए सहकारिता मंत्रालय में भी जिम्मेदारी दी।

जम्मू-कश्मीर में काम कर चुके एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कुमार ने अपनी ‘मेहनत और समझदारी’ से लोगों पर प्रभाव डाला था, लेकिन ‘सबसे महत्वपूर्ण उनकी प्रशासनिक समझ थी।’ अधिकारी के मुताबिक, “वह हमेशा यह स्पष्ट रूप से समझते थे कि उन्हें अपना सिर झुकाकर ऊपर से मिले आदेशों को लागू करना है। वह बेवजह दिखावा या किसी तरह की चमक-दमक नहीं करते थे। यही वजह थी कि नेतृत्व उन्हें पसंद करता था।”

गृह मंत्रालय में कुमार के साथ करने वाले एक अधिकारी ने कहा कि उनकी सबसे अलग बात चीजों पर बारीकी से ध्यान देना है। अधिकारी ने कहा, “वह कभी भी चीजें दूसरों के भरोसे नहीं छोड़ते थे, खुद पूरी तरह शामिल रहते थे… 5 अगस्त 2019 के बाद के दौर में हमने दबाव में काम पूरा करने की उनकी क्षमता भी देखी। इसके बावजूद वह अपने सहयोगियों के साथ हमेशा सहज और गर्मजोशी से पेश आते थे। मैंने उन्हें कभी अपना आपा खोते नहीं देखा।”

कुमार की दोनों बेटियां भी सरकारी सेवाओं में हैं। इनमें से एक आईएएस और दूसरी आईआरएस अधिकारी हैं। दोनों की शादी आईएएस अधिकारियों से हुई है।

रिटायरमेंट के बाद चुनाव आयोग में जिम्मेदारी

जनवरी 2024 में रिटायर होने के दो महीने से भी कम समय बाद ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति की घोषणा 15 मार्च 2024 को हुई और अगले ही दिन चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनावों का कार्यक्रम घोषित कर दिया।

उस साल अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में चुनाव हुए। इसके अलावा कुमार हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली के चुनावों में भी शामिल रहे।

चुनाव आयोग में सबसे वरिष्ठ अधिकारी होने के कारण कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने की उम्मीद थी। सूत्रों के मुताबिक, नए नियम को ध्यान में रखते हुए उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभालने से कई महीने पहले ही अधिकारियों के साथ बातचीत शुरू कर दी थी। आखिरकार वह पिछले साल फरवरी में मुख्य चुनाव आयुक्त बने।

मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर ज्ञानेश कुमार

मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद कुमार के शुरुआती आदेशों में से एक चुनाव सदन के सभी कर्मचारियों के लिए बायोमेट्रिक मशीन से अनिवार्य रूप से उपस्थिति दर्ज कराने का था। अधिकारियों के मुताबिक, बैठकों में तीखी बहस भी आम होने लगी थी। यह उनके पूर्ववर्ती राजीव कुमार के कार्यकाल से अलग स्थिति थी।

इसके बाद SIR का मुद्दा सामने आया। इसने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं। विपक्ष ने आरोप लगाया कि देशभर के चुनावों में भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए मतदाता सूचियों में मतदाताओं के नाम जोड़े और हटाए जा रहे हैं।

विपक्ष के आरोपों पर चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया भी चर्चा में रही। आयोग ने सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता बढ़ाई और विपक्ष के आरोपों को ‘भ्रामक’ बताया। कुमार ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को चुनौती दी कि वह अपने ‘वोट चोरी’ के आरोपों को साबित करें या ‘देश से माफी मांगें।’

कई लोगों के लिए यह वही अधिकारी थे जो अपने पुराने दिनों से काफी बदल चुके थे। पहले उनके दरवाजे हमेशा खुले रहते थे और वह अपने मेहमानों से तब तक जाने के लिए नहीं कहते थे, जब तक वे कहवा न पी लें। सर्दियों में मेहमानों को गर्मजोशी से कश्मीर का यह पारंपरिक पेय पेश करना उनके आतिथ्य का हिस्सा था।

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‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों पर आई जांच रिपोर्ट के कुछ घंटे बाद ही राजनीतिक हलचल तेज हो गई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सत्तारूढ़ बीजेपी और चुनाव आयोग पर देशद्रोह का आरोप लगाया। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।