कभी-कभी टेक्नोलॉजी सिर्फ सुविधा नहीं होती बल्कि न्याय व्यवस्था के इतिहास में एक ऐसा मोड़ बन जाती है जिसे आने वाली पीढ़ियां मिसाल के तौर पर याद करती हैं। ऐसी ही एक घटना ने लगभग ढाई दशक पहले दुनिया को यह दिखा दिया था कि न्याय केवल अदालत की चारदीवारी में ही नहीं बल्कि अस्पताल के एक कमरे से भी उतनी ही गरिमा और प्रभाव के साथ दिया जा सकता है।
यह कहानी है उस ऐतिहासिक वर्चुअल हियरिंग की जिसमें एक जज ने अस्पताल के बिस्तर से बैठकर सुनवाई की थी और एक सु्र्खियों में छाए अरबों डॉलर के केस का फैसला सुनाया था। कई बार अदालतों में कुछ ऐसे फैसले लिए जाते हैं जो इतिहास बन जात हैं। वरिष्ठ वकील और भारत के सॉलिसिटर जनलर तुषार मेहता की हाल ही में आई किताब ‘The Lawful and the Awful: Quirky Tales’ में कानून की दुनिया से जुड़ी विचित्र और हटकर कहानियों का जिक्र किया गया है। इस किताब में ऐसा ही एक किस्सा है साल 1999 का जब ब्रिटेन में अरबों रुपये के फ्रॉड के मामले में एक जज ने हॉस्पिटल के बेड से फैसला सुनाया। जानते हैं आखिर क्या है यह किस्सा और क्यों यह फैसला कानून की दुनिया में ऐतिहासिक बन गया…
एक असामान्य सुबह की शुरुआत
30 जुलाई 1999 की सुबह कोई सामान्य नहीं थी। ना भारी-भरकम कोर्टरूम, ना लकड़ी की गूंजती हुई मेज और ना खड़े होकर ‘All rise’ की औपचारिकता। उस दिन माहौल अलग था।
62 वर्षी जज वैलेरी पर्लमैन (Valerie Pearlman) उस समय गंभीर स्वास्थ्य समस्या से जूझ रही थीं। गिरने की वजह से मार्च में उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया था। डॉक्टरों ने उन्हें अस्पताल में आराम करने की सलाह दी थी। लेकिन मामला ऐसा था कि उसे टाला नहीं जा सकता था। लाखों-करोड़ों डॉलर के इस केस में देरी का मतलब सिर्फ कानूनी जटिलता नहीं बल्कि आर्थिक नुकसान भी था।
ऐसे में जो फैसला लिया गया, वह उस समय के लिए क्रांतिकारी था-कोर्ट को अस्पताल से वर्चुअल रूप से चलाना। जी हां, आज भले ही वर्चुअल सुनवाई बहुत आम हो लेकिन 1999 में इसके बारे में सोचना असाधारण था। आज के युग में भी केवल कुछ ही मुकदमों में अदालत के साथ लाइव वीडियो लिंक का इस्तेमाल किया जाता है।
लंदन के साउथवार्क क्राउन कोर्ट में एक मुकदमा पहले से चल रहा था और इसी दौरान उनका ऑपरेशन किया गया जिसमें टूटी हड्डी को सहारा देने के लिए एक प्लेट डाली गई।
छह सप्ताह बाद मुकदमा फिर से शुरू हुआ और जज पर्लमैन अदालत में चलने-फिरने के लिए वॉकिंग स्टिक का इस्तेमाल कर रही थीं। सब कुछ तीन सप्ताह तक ठीक चलता रहा लेकिन फिर प्लेट टूट गई और यह पता चला कि फ्रैक्चर पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ था।
जब मामले की सुनवाई का लगभग 75 प्रतिशत भाग पूरा हो चुका था और जज को सेंट बार्थोलोम्यू अस्पताल ले जाया गया था। तब उन्होंने यह फैसला किया कि उन्हें पुनः सुनवाई (री-ट्रायल) का आदेश नहीं देना है। जज वैलेरी पर्लमैन ने उस समय नई-नई इंटरनेट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके करीब 2.5 मिलियन पाउंड बचाए क्योंकि इससे मामले की दोबारा सुनवाई (Re-trail) नहीं हुई।
कोर्ट और टेक्नोलॉजी की जुगलबंदी
आज भले ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग आम बात हो लेकिन उस दौर में यह किसी प्रयोग से कम नहीं था। इंटरनेट अभी इतना विकसित नहीं था और ना ही डिजिटल कोर्ट को कोई सिस्टम था। लेकिन अदालत ने जोखिम उठाया।
सिर्फ एक घंटे के नोटिस पर जूरी को सेंट बार्थोलोम्यू अस्पताल ले जाया गया और उन्हें वहां 30 फुट ऊची, ओक-पैनल वाली भव्यता वाले ग्रेट हॉल में बने अस्थायी अदालत कक्ष में बैठाया गया। एक घंटे के नोटिस में अस्पताल के कमरे में एक टेबल पर एक स्क्रीन लगाई गई। कैमरा, माइक्रोफोन और एक सुरक्षित कनेक्शन के जरिए कोर्टरूम को कनेक्ट किया गया। दूसरी तरफ वकील, कोर्ट स्टाफ और पक्षकार बैठे थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी सामान्य सुनवाई में। बस अंतर इतना था कि ‘My Lord’ भौतिक रूप से वहां नहीं थीं बल्कि वो स्क्रीन पर दिख रही थीं।
इसके बाद जज ने अगले दो दिनों तक अपना समापन भाषण दिया। उन्होंने जूरी को समझाते हुए कहा, ”दुर्भाग्य से कल मैं अपने परिवार की कार में चढ़ गई थी…लेकिन जब बाहर निकलने की बारी आई तो मैं अपने घायल पैर पर वजन नहीं डाल सकी।”
इसके बाद जूरी वापस साउथवार्क लौट गई और लगभग 55 घंटे तक विचार-विमर्श कर अपना फैसला (verdict) तैयार किया जबकि यह मुकदमा कुल छह महीने चला था। इस बीच, जज पर्लमैन को उनके पैर की सर्जरी के लिए वेस्ट ससेक्स के वर्थिंग के पास एक अस्पताल में ट्रांसफर कर दिया गया।
अरबों डॉलर का मामला
यह कोई साधारण केस नहीं था। इसमें दांव पर थे अरबों डॉलर, बड़ी कंपनियों की प्रतिष्ठा और कानूनी मिसालें। अगर यह केस दोबारा ट्रायल में जाता तो ना सिर्फ महीनों का समय बर्बाद होता बल्कि सरकारी खजाने पर भी भारी बोझ पड़ता।
इसी संदर्भ में बाद में यह अनुमान लगाया गया कि इस वर्चुअल हियरिंग ने करदाताओं (taxpayers) को लगभग 2.5 मिलियन पाउंड से ज्यादा की बचत कराई। लेकिन शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि एक अस्पताल का एक कमरा इतनी बड़ी कानूनी कहानी का केंद्र बन जाएगा।
अपनी रिकवरी के दौरान उन्होंने लगभग 2,500 पाउंड डॉलर की लागत से लगाए गए विशेष दो-तरफ़ा इंटरनेट वीडियो लिंक का इस्तेमाल किया जिससे वे मुकदमे की प्रगति पर नज़र रख सकीं और जूरी के सवालों के जवाब भी दे सकीं। लगभग एक दर्जन बार यह लिंक एक्टिव हुआ जिसमें जज को गुलाबी और बैंगनी रंग की पैटर्न वाली ड्रेस में अस्प्ताल के बिस्तर के किनारे बैठे हुए देखा गया।
इतिहास में दर्ज हुआ फैसले का किस्सा
बीमारी के बावजूद उन्होंने किसी भी तरह की कमजोरी को कार्यवाही पर हावी नहीं होने दिया। उनकी आवाज में वही सख्ती थी, वही संतुलन था जो एक सामान्य कोर्टरूम में होता है। उन्होंने हर दलील को ध्यान से सुना, सवाल पूछे और अंत में वही किया जो न्याय की मांग थी- एक स्पष्ट और संतुलित फैसला।
तीन लोग- जियान लोम्बार्डी (50), उनकी पत्नी वेरोनिका (28) जो पश्चिम लंदन से थीं और मध्य लंदन से ताल्लुक रखने वाले जियानफ्रैंको उडोविचिच (50) को जनवरी 1994 से सितंबर 1996 के बीच धोखाधड़ी की साज़िश (conspiracy to defraud) में दोषी पाया गया। एक चौथे अभियुक्त को बरी कर दिया गया। अदालत को बताया गया था कि यह गिरोह आलीशान कार्यालयों और सम्मानजनक दिखावे (respectability) का सहारा लेकर लोगों को ऐसे निवेश योजनाओं में फंसाता था जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थीं।
जब फैसला सुनाया गया तो वह सिर्फ एक कानूनी निर्णय नहीं था। वह एक संदेश था। संदेश यह कि न्याय व्यवस्था परिस्थितियों की गुलाम नहीं होती। वह तकनीक का इस्तेमाल करके भी अपनी गरिमा और निष्पक्षता बनाए रख सकती है।
फैसले के बाद जब केस को दोबारा ट्रायल में जाने से रोका गया तो यह स्पष्ट हो गया कि यह प्रयोग सफल था और इसी के साथ यह भी स्थापित हुआ कि टेक्नोलॉजी सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि न्याय की निरंतरता का जरिया भी हो सकती है।
जज वैलेरी पर्लमैन की यह वर्चुअल हियरिंग आज भी एक मिसाल के तौर पर याद की जाती है। यह कहानी सिर्फ टेक्नोलॉजी की नहीं बल्कि उस सोच की है जो बदलाव से नहीं डरती। यह उस भरोसे की कहानी है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी असामान्य क्यों न हों, न्याय अपना रास्ता खोज ही लेता है और कभी-कभी, वह रास्ता अस्पताल के एक कमरे से होकर भी गुजर सकता है।
