लगभग एक सदी पहले लंदन के आलिशान सेंट जेम्स पैलेस में एक बैठक होने जा रही थी, जिसमें भारतीय इतिहास की दो महान हस्तियां एक ऐसे मुद्दे पर पहली बार आमने-सामने आने वाली थीं, जो आज भी भारतीय राजनीति और समाज में बहस का केंद्रीय मुद्दा बना हुआ है।

मौका था दूसरे गोलमेज सम्मेलन का, जो 7 सितंबर 1931 शुरू हुआ और 31 दिसंबर 1931 तक चला। संवैधानिक सुधारों पर चर्चा के लिए बुलाई गई इस बैठक में पहली बार महात्मा गांधी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में शामिल हो रहे थे, जबकि डॉ. भीम राव आंबेडकर दूसरी बार शामिल हो रहे थे।

यह वह पहला मौका था, जब भारतीय इतिहास के दोनों शिखर पुरुष बहस में आमने-सामने थे। आखिर क्या था वह मुद्दा? लेकिन उससे पहले समझते हैं कि यह बैठक क्यों बुलाई गई थी?

गोलमेज सम्मेलन क्या था और इसे क्यों बुलाया गया था

मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की समीक्षा के लिए ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1927 में साइमन कमिशन का गठन किया था। 1928 में कमिशन भारत आया और जून 1930 में उसने अपनी रिपोर्ट पेश की। इसी रिपोर्ट पर चर्चा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारतीय प्रतिनिधियों को लंदन आमंत्रित किया, जहाँ यह चर्चा होनी थी कि भारतीयों को और कितना राजनीतिक अधिकार दिया जाएगा।

पहली गोलमेज बैठक 12 नवंबर 1930 से 19 जनवरी 1931 तक हुई थी, लेकिन इसमें देश का प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस शामिल नहीं हुआ था। उस समय कांग्रेस ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग को लेकर सविनय अवज्ञा आंदोलन चला रही थी। बैठक असफल हुआ।

अंततः कांग्रेस के साथ गतिरोध को खत्म करने के उद्देश्य से तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरवीन ने गांधी को समझौते के लिए आमंत्रित किया। दोनों के बीच 5 मार्च को हुए समझौते के तहत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर दिया और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए तैयार हो गई। कांग्रेस ने गांधी को अपने एक मात्र प्रतिनिधि के रूप में लंदन भेजा।

इस सम्मेलन को मुख्य तौर पर भारत के लिए संवैधानिक ढांचा तय करने के लिए बुलाया गया था, जिसमें प्रांतीय और केंद्रीय स्तर पर शासन के स्वरूप को तय किया जाना था, लेकिन सबसे तीखी बहस गांधी और आंबेडकर के बीच दलितों के प्रतिनिधित्व को लेकर शुरू हो गई।

गांधी और आंबेडकर के बीच बहस का मुद्दा क्या था

गांधी और आंबेडकर के बीच बहस का मुख्य मुद्दा दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल को लेकर था। डॉ. आंबेडकर ने मांग की कि दलितों को मुसलमानों और सिखों की तरह एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई माना जाए और उन्हें शुरुआत के 10 वर्षों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र दिए जाएं, ताकि दलित मतदाता अपने प्रतिनिधियों को खुद चुन सकें। उनका तर्क था कि दलितों की मुक्ति का मार्ग केवल राजनीतिक सत्ता में उनकी सीधी और स्वतंत्र हिस्सेदारी से ही संभव है।

हालांकि गांधी ने इसका तीव्र विरोध किया। उनका मानना था कि दलितों को अलग राजनीतिक दर्जा देना ‘पूरी तरह से आत्मघाती’ होगा, क्योंकि इससे वे हमेशा के लिए सवर्ण हिंदुओं से अलग हो जाएंगे और ग्रामीण भारत में सामाजिक सद्भाव पूरी तरह बिखर जाएगा। उन्होंने अल्पसंख्यक समिति में चेतावनी दी कि वे इस अलगाव का ‘अपने प्राणों की बाजी लगाकर’ विरोध करेंगे।

गांधी और आंबेडकर की बीच की बहस जब तीखी हुई तो गांधी ने आंबेडकर से यह भी पूछा कि वह आखिर किस अधिकार से दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग कर रहे हैं? आंबेडकर ने दलितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा किया। जिसपर गांधी ने दावा पेश किया कि कांग्रेस भारत की शोषित, वंचित जनता की एकमात्र सच्ची प्रतिनिधि है। उनका मानना था कि अछूतों या दलितों की समस्या एक सामाजिक और धार्मिक सुधार का विषय है, जिसे हिंदू समाज के भीतर सवर्णों के हृदय परिवर्तन के जरिए ही हल किया जा सकता है।

दूसरी ओर डॉ. आंबेडकर का दावा था कि वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व वह करते हैं। उन्होंने घोषित किया कि दलित वर्ग भले ही हिंदुओं में गिने जाते हों, लेकिन वे किसी भी मायने में हिंदू समुदाय का हिस्सा नहीं रहे हैं, क्योंकि उन्हें बुनियादी मानवाधिकारों से भी वंचित रखा गया है।

सांप्रदायिक पंचाट और पूना पैक्ट क्या था

दोनों अपने-अपने विचारों पर अडिग रहे और कोई समझौता नहीं हो सका। हालांकि दोनों में आपसी सहमति न बन पाने के बाद भी ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को ‘सांप्रदायिक पंचाट’ जारी कर दलितों को पृथक निर्वाचन का अधिकार दे दिया।

इसके जवाब में पुणे की यरवड़ा जेल में बंद गांधी ने 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन शुरू कर दिया। दबाव में आंबेडकर समझौते के लिए तैयार हो गए और 24 सितंबर 1932 को ऐतिहासिक ‘पूना समझौता’ हुआ। आंबेडकर ने पृथक निर्वाचन की मांग वापस ले ली, और इसके बदले संयुक्त निर्वाचन के भीतर दलितों के लिए आरक्षित प्रांतीय सीटों की संख्या को 71 से बढ़ाकर 147 (या 148) और केंद्रीय असेंबली में 18% कर दिया गया।

बाद में स्वतंत्र भारत के संविधान में पूना समझौते की इसी ‘आरक्षण’ की भावना को स्थायी स्थान मिला। लेकिन दोनों नेताओं के बीच शुरु हुआ वैचारिक संघर्ष आज भी जारी है। समय-समय पर आरक्षण के मुद्दे पर विभिन्न सवाल उठते रहते हैं और समर्थकों और विरोधियों के बीच बहस चलती रहती है।

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महात्मा गांधी सितंबर 1932 में जब आमरण अनशन शुरू करने की तैयारी कर रहे थे, तब डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि गांधी उन्हें “अपने जीवन और मेरे लोगों के अधिकारों में से किसी एक को चुनने की मजबूरी में नहीं डालेंगे। क्योंकि, मैं अपने लोगों की आने वाली पीढ़ियों को हाथ-पैर बांधकर उच्च जातियों के हवाले करने के लिए कभी सहमत नहीं हो सकता।” पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।