अलग बलूचिस्तान की लड़ाई लड़ रहे लड़ाकों ने पाकिस्तान में पिछले दिनों एक साथ कई जगहों पर जोरदार हमले किए। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों और सुरक्षा बलों के जवानों को निशाना बनाया। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने इसे ‘ऑपरेशन हेरोफ 2.0’ का दूसरा चरण बताया।

क्या है बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई की कहानी, कब से यह लड़ाई चल रही है, बलूचिस्तान के लोगों की क्या शिकायत है, ऐसे ही कई सवालों के जवाब हम इस स्पेशल स्टोरी में खोजने की कोशिश करेंगे।

1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ तो इससे अलग पाकिस्तान अस्तित्व में आया। तभी से बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी की मांग की आवाज को बुलंद कर रहे हैं।

1947 से पहले बलूचिस्तान में चार रियासतें- मकरान, लास बेला, खारन और कलात शामिल थीं। इन रियासतों के सरदार ब्रिटिश हुकूमत के प्रति वफादार थे। इनमें से कलात का सरदार सबसे ज्यादा ताकतवर था।

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अहमद यार खान ने मांगा बलूच राज्य

जब अंग्रेजों का भारत छोड़कर जाने का वक्त नजदीक आया तो कलात के अंतिम सरदार अहमद यार खान ने एक स्वतंत्र बलूच राज्य की वकालत करना शुरू कर दिया। अहमद यार खान को इस बात की उम्मीद थी कि क्योंकि वह मोहम्मद अली जिन्ना के अच्छे दोस्त हैं, इससे उन्हें पाकिस्तान में शामिल होने के बजाय अपना अलग राज्य हासिल करने में मदद मिलेगी।

11 अगस्त, 1947 को ऐसा होता भी दिखाई दिया जब पाकिस्तान ने कलात को अपने साथ शामिल होने के लिए मजबूर करने के बजाय उसके साथ दोस्ती के समझौते पर दस्तखत कर दिए लेकिन ब्रिटिश सरकार इसका विरोध कर रही थी क्योंकि अंग्रेजों को इस बात का डर था कि अगर कलात आजाद हो गया तो सोवियत संघ का इस इलाके में असर बढ़ सकता है।

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दबाव के आगे झुक गए खान

उस वक्त कलात के लिए हालात इसलिए भी मुश्किल हो गए क्योंकि कलात के अधीन आने वाली तीनों रियासतों के जागीरदार पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे। अक्टूबर, 1947 में पाकिस्तान ने अपना रुख बदल लिया और उसने कलात पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि उसे भी पाकिस्तान में शामिल होना चाहिए।

17 मार्च, 1948 को पाकिस्तान की सरकार ने कलात के अधीन आने वाली तीनों रियासतों को अपने साथ मिला लिया। इससे अहमद यार खान पर काफी दबाव पड़ गया। इस बीच, ऑल इंडिया रेडियो पर इस तरह की अफवाह फैल गई थी कि अहमद यार खान भारत के साथ विलय करना चाहते हैं। इस वजह से 26 मार्च, 1948 को पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान पहुंच गई। दबाव में आकर 27 मार्च को खान ने पाकिस्तान के साथ विलय किए जाने की संधि पर दस्तखत कर दिए।

फैसले के खिलाफ हुआ विद्रोह

उसी साल जुलाई में अहमद यार खान के भाई, राजकुमार अब्दुल करीम ने इस समझौते के खिलाफ विद्रोह कर दिया और तब बलूचिस्तान की आजादी की पहली लड़ाई शुरू हुई थी। तब से यह लड़ाई जारी है।

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पाकिस्तान की सेना पर जुल्म के आरोप

पाकिस्तान की सेना पर इस बात का आरोप लगता है कि वह बलूचिस्तान की आजादी की मांग करने वालों को बेरहमी से कुचल रही है। पाकिस्तान की सेना पर बलूचिस्तान के लोगों का अपहरण करने, उन पर अत्याचार करने, मनमानी ढंग से गिरफ्तारी करने और हत्याएं करने के आरोप लग चुके हैं। कहा जाता है कि 1948 से अब तक हजारों बेकसूर बलोच नागरिकों को मारा जा चुका है और हजारों लोग लापता हैं।

पिछले कुछ सालों में बलूच लिबरेशन फ्रंट, बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी जैसे संगठनों ने पाकिस्तान की सेना को कई बार निशाना बनाया है। बीते साल बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने जाफर एक्सप्रेस नाम की ट्रेन को हाईजैक कर लिया था।

नवाब अकबर खान बुगती की हत्या

साल 2005 में बलूचिस्तान की आजादी के लिए चल रहा आंदोलन एक बार फिर से तब तेज हुआ, जब पाकिस्तान के पूर्व रक्षा मंत्री और बलूचिस्तान के पूर्व गवर्नर नवाब अकबर खान बुगती ने पाकिस्तान की सरकार के खिलाफ हथियार उठा लिए। उन्होंने पाकिस्तान की सरकार के सामने 15 मांगें रखी। इसमें एक मांग यह भी थी कि बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर ज्यादा हक वहां के लोगों का होना चाहिए। इससे उनका पाकिस्तान की सेना के साथ टकराव शुरू हो गया लेकिन अगले साल ही बुगती की हत्या कर दी गई।

इस हत्या का आरोप पाकिस्तान के तत्कालीन आर्मी चीफ और पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर लगा। इस हत्या से बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान के खिलाफ बुरी तरह भड़क गए और इसने अलग बलूचिस्तान के लिए चल रही लड़ाई की आग में पेट्रोल का काम किया।

क्या हैं बलोच लोगों के आरोप?

बलूचिस्तान के लोगों का आरोप है कि पाकिस्तान में लगातार उनकी उपेक्षा की जा रही है। बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और यह प्राकृतिक संसाधनों और खनिज से भरपूर है लेकिन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में उसका योगदान सिर्फ चार प्रतिशत का है। बलूचिस्तान के लोगों का यह भी आरोप है कि पाकिस्तान ने बलोचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का काम अपने दोस्त चीन को सौंप दिया है और चीन के खिलाफ यहां के लोगों में काफी नाराजगी है।

आजाद हो पाएगा बलूचिस्तान ?

बलूचिस्तान के लोग 1947 से ही आजादी की सुबह का इंतजार कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने लोकतांत्रिक ढंग से प्रदर्शन करने के साथ ही सशस्त्र संघर्ष भी किया है लेकिन पाकिस्तान की सेना और वहां की सरकार अलग बलूचिस्तान की मांग को पूरा नहीं होने देना चाहती। ऐसे में कई सालों से चल रही यह लड़ाई पाकिस्तान की सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है।

बलूचिस्तान पाकिस्तान के कुल भू-भाग में 44% की हिस्सेदारी रखता है। अगर बलूचिस्तान आजाद हो जाता है तो इससे पाकिस्तान का आकार तो कम हो ही जाएगा, साथ ही यहां के प्राकृतिक संसाधनों पर भी उसका कब्जा छिन जाएगा। इस वजह से वह किसी भी कीमत पर वह अलग बलूचिस्तान नहीं बनने देना चाहता।

बलूचिस्तान के विद्रोहियों या लड़ाकों ने आजादी की लड़ाई को जारी रखा है लेकिन क्या उनका अलग देश हासिल करने का सपना कभी पूरा होगा?

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