मैं बंगाल हूं और ये मेरी कहानी है। आज की दुनिया मुझे सिर्फ एक राज्य के रूप में जानती है, लेकिन मेरा अस्तित्व हजारों साल पुराना है और मेरी विरासत इससे कहीं बड़ी है। महाभारत काल में भी मेरा जिक्र आपको मिलेगा, मुगलों के दौर में भी मेरी अलग पहचान थी और अंग्रेजों की हुकूमत में तो मैं व्यापार का सबसे केंद्र था। आज आप मुझे पश्चिम बंगाल कहते हैं। कभी मुझे सिर्फ बंगाल कह देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा- “बंगाल” नाम आखिर पड़ा कैसे? ये उसी सफर की कहानी है, ये मेरे बंगाल बनने की कहानी है

नितिश सेनगुप्ता की किताब ‘लैंड ऑफ टू रिवर्स’ के अनुसार प्राचीन भारत में बंगाल नाम का कोई जिक्र नहीं मिलता है, ये एक बहुत बड़ा क्षेत्र था, इसके अलग-अलग भाग थे। वंग, हरिकेला, वरेंद्र, राढ़ कुछ ऐसे नाम थे जो इतिहास के पन्ने टटोलने पर मिलते हैं। वंग क्षेत्र को वर्तमान में ढाका के आसपास माना जाता है। हरिकेला चटगांव का ही एक हिस्सा था। इसी तरह वरेंद्र उत्तर बंगाल में आता था और राढ़ पश्चिमी बंगाल में। यानी कि उस समय के ये अलग-अलग नाम ही आगे चलकर बंगाल बन गए।

महाभारत और महाकवि कालीदास के ग्रंथ रघुवंशम में भी ‘वंग’ शब्द का उल्लेख होता है। वंग एक छोटा सा क्षेत्र था जो आज के पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में स्थित था। कहा जाता है कि वंग साम्राज्य के कई बलशाली राजाओं ने कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ा था लेकिन महाभारत काल के दौरान बंगाल शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ था।

13वीं सदी में पहली बार इस क्षेत्र के एक नाम चर्चा का विषय बना- बंगला। असल में उस क्षेत्र में जब तुर्क और अफगान शासक आए, उनके साथ फारसी और अरबी इतिहासकार भी आए थे। उनमें से कुछ ने इस क्षेत्र को वंग की जगह ‘बंगला’ कहना शुरू किया। दिल्ली में जब मुस्लिम शासकों का राज चला, वहां की सल्तनत में जो इतिहासकार शामिल रहे, उन्होंने एक और नाम का जिक्र किया- लखनौती। कुछ लोगों ने इसे तब लक्ष्मणावती भी कहा। आज के मालदा जिले से 10 मील दूर दक्षिण पश्चिम में ये इलाका आज भी स्थित है।

इतिहास की इस यात्रा में कई अन्वेषकों का जिक्र भी मिलता है जो समय-समय पर बंगाल की इस धरती पर आए थे। उन्होंने भी इस क्षेत्र का नामकरण किया और इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। 1298 में प्रसिद्ध यात्री मार्को पोलो जब दुनिया भ्रमण पर निकले थे, तब उन्होंने दक्षिण के एक प्रांत को ‘बंगला’ कहकर संबोधित किया था। उन्होंने यह भी बताया था कि उस जमाने में इस क्षेत्र को कोई भी पूरी तरह जीत नहीं पाया था यानि कि ये ताकतवर राजाओं के अधीन था और दुश्मन परास्त हो रहे थे।

इसके बाद 1345 में मोरक्को के एक और यात्री इब्न बतूता भारत भ्रमण पर आए थे। वे भी बंगाल पहुंचे थे और उन्होंने इस भूमि की तब एक अलग ही खासियत बताई थी। नितिश सेनगुप्ता की किताब के मुताबिक इब्न बतूता ने बताया था कि यहां चावल भारी मात्रा में था। इसके अलावा इस क्षेत्र में सबकुछ काफी सस्ता था, पूरी दुनिया की तुलना में सबसे सस्ता। इब्न बतूता के भारत आने के 156 साल बाद पुर्तगाली व्यापारियों का भी यहां आना हुआ था। वे बंगाल के इस क्षेत्र को तब ‘बंगला’ कहने लगे थे। देखते ही देखते यूरोप के दूसरे व्यापारी भी इस शब्द का इस्तेमाल करने लगे। लेकिन वहां के उचारण में क्योंकि फर्क रहा, ऐसे में ‘बंगला’ बन गया ‘बंगाल’।

इतिहास खंगालने पर यह भी पता चलता वंग शब्द महाभारत में सिर्फ पूर्वी बंगाल के लिए इस्तेमाल हुआ था। इसी तरह पश्चिमी भाग को 13वीं सदी में ‘गौड़’ कहा गया। 19वीं सदी तक गौड़ और वंग को कई बार साथ में भी प्रयोग किया गया। कभी संबोधन में कहा गया बंगला तो कभी वंगला। आगे चलकर एक बड़े क्षेत्र को बंगाल कहा जाने लगा जिसकी अंतर्गत वर्तमान बिहार के इलाके भी आते थे। असम के कामरूप तक इसकी सीमा थी। सदियों के इस ऐतिहासिक सफर में वंग, गौड़ और लखनौती जैसे नामों से गुजरते हुए अंततः इस पूरे क्षेत्र को बंगाल कहा जाने लगा।