देश की राजनीति इन दिनों कई दिलचस्प मोड़ों से गुजर रही है। तमिलनाडु में अभिनेता से मुख्यमंत्री बने विजय भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाकर नई राजनीतिक पहचान गढ़ रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस राज्यसभा चुनावों में रणनीतिक चूकों से जूझ रही है। भाजपा संगठन और सत्ता के स्तर पर नए समीकरण बना रही है, जबकि सहयोगी दलों की भूमिका पहले जैसी निर्णायक नहीं दिख रही। इन घटनाक्रमों ने भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप को नई दिशा दी है।

विजय की मुहिम

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनूठी मुहिम शुरू की है। विजय तमिल फिल्मों के मशहूर अभिनेता हैं। उनकी नई बनी पार्टी टीवीके ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में करिश्मा कर दिखाया। पिछले चार दशक से द्रमुक और अन्ना द्रमुक के बीच सीमित रहने वाली तमिलनाडु की सियासत में विजय एक नई धुरी बनकर उभरे हैं। उसी तरह, जैसे 1980 के दशक में आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव का उभार हुआ था। विजय ने चुनाव पूर्व जो वादे किए थे उनमें भ्रष्टाचार पर अंकुश मुख्य है। लिहाजा इस दिशा में उनकी सरकार ने न केवल भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों की सेवा समाप्त करने की नीति घोषित की है बल्कि भ्रष्टाचार को उजागर करने वालों को इनाम देने का भी एलान किया है। रिश्वत मांगने वाले सरकारी कर्मचारी का वीडियो पेश करने वाले को एक लाख रुपए का इनाम देगी राज्य सरकार। फैसले का पुरजोर स्वागत हुआ है। और तो और वायको जैसे कद्दावर नेता ने भी उनकी मुक्त कंठ से सराहना की है। वायको की पार्टी एमडीएमके राज्य में द्रमुक की सहयोगी है। वायको की पार्टी का लोकसभा में एक और विधानसभा में दो सदस्य हैं। वायको मुख्यमंत्री विजय से मिलने गए थे। विजय की उनके मुख से सराहना पर द्रमुक की प्रतिक्रिया नहीं आई है। यह संकेत तो मिलता ही है कि विधानसभा में वायको के विधायक टीवीके सरकार के अच्छे फैसलों का समर्थन करें तो अचरज नहीं होना चाहिए।

चूक पर चूक

राहुल गांधी का सियासी प्रबंधन कमजोर साबित हो रहा है। उसी के कारण कांग्रेस ने राज्यसभा की दो जीती हुई सीटें गंवा दीं। मध्य प्रदेश में मीनाक्षी नटराजन की चूक कहें या पार्टी के किसी नेता की मुखबिरी, आसानी से मिलती दिख रही सीट हाथ से निकल गई। मीनाक्षी के मामले मेंकानूनी नजरिए से सतर्कतता का अभाव नुकसानदेह साबित हुआ। मध्य प्रदेश के बाद झारखंड में भी पार्टी को राज्यसभा सीट पर हार का मुंह देखना पड़ा, क्योंकि गठबंधन के दलों में एकता नहीं थी। राजद और भाकपा (माले) के विधायकों ने क्रास वोट कर भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवानी का साथ दिया। कांग्रेस के प्रणव झा हार गए। हेमंत सोरेन ने भी झा को जिताने के लिए खास मेहनत नहीं की। बिहार में राज्यसभा चुनाव के समय कांग्रेस के विधायक गायब हो गए थे, जिससे राजद के उम्मीदवार एडी सिंह हार गए थे। कहा जा रहा है कि तेजस्वी ने उस हार का हिसाब झारखंड में चुकता कर लिया।

जन्मदिन पर मिला तोहफा

राहुल गांधी के जन्मदिन के मौके पर कांग्रेस के पार्टी मुख्यालय में जबरदस्त भीड़ थी। इस भीड़ में भी राहुल गांधी ने पार्टी मुख्यालय पर हमेशा तैनात रहने वाले सुरक्षाकर्मी को एक खास तोहफा दे दिया। दरसअल, ये सुरक्षाकर्मी कांग्रेस मुख्यालय पर तैनात थे, जहां एक ओर नेताओं का हुजूम फूलों के गुलदस्ते और पटके के साथ आगे बढ़ रहा था, वहीं ये भी राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देना चाहते थे। सबको पीछे छोड़कर राहुल गांधी अपने मुख्यालय के एक सुरक्षाकर्मी की तरफ गए और उनसे हाथ मिलाकर बड़े प्रेम से जन्मदिन की शुभकामनाएं ली। इसके बाद सुरक्षाकर्मी भी खुश नजर आए, और बोले, साहब का जन्मदिन था लेकिन आज वे मुझे ही तोहफा दे गए।

वक्त का फेर

महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे हों या बिहार में नीतीश कुमार और चिराग पासवान, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू हों या उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी, सबको राजग में रहकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुणगान करना होगा। जून 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद सहयोगी दलों के इन नेताओं का भाजपा के लिए महत्त्व काफी बढ़ गया था। पर पार्टी ने दो साल के भीतर सियासी तस्वीर बदल दी है। ममता बनर्जी के 20 लोकसभा सदस्यों के टूटने के बाद भाजपा संसद में मजबूत हुई है। हाल के सियासी घटनाक्रम ने भाजपा के सहयोगी दलों की चिंता बढ़ा दी है। अब एकनाथ शिंदे की भी पहले जैसी अहमियत नहीं बची। महाराष्ट्र और बिहार के विधानसभा चुनाव नतीजों ने शिंदे और नीतीश को बेदम बना दिया। तभी भाजपा ने शिंदे से परामर्श किए बिना ही देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बना दिया था। नीतीश को चुनावी वादे के मुताबिक बिहार का मुख्यमंत्री बनाया तो जरूर पर छह महीने के भीतर ही हटाकर वहां अपना मुख्यमंत्री बना लिया। राज्यसभा में भी अगले कुछ महीनों में भाजपा के बहुमत पा जाने के संकेत साफ दिख रहे हैं। यानी पार्टी 123 तक पहुंच जाएगी। गौरतलब है कि 1988 के बाद किसी भी पार्टी को राज्यसभा में अकेले बहुमत नहीं मिला, पर भाजपा यह मुकाम पा जाएगी। अहमियत भले घट जाए पर सहयोगी दलों को चिंतित होने की जरूरत नहीं है, जब तक भाजपा के साथ रहेंगे कम से कम टूट के खतरे से बचे रहेंगे। आंखें तरेरेंगे तो मुश्किल में फंसेंगे।

बदला एजंडा

नितिन नवीन को भाजपा अध्यक्ष बने पांच महीने हो चुके हैं, पर उन्होंने अभी तक अपनी टीम नहीं बनाई। संगठन में बदलाव की चर्चा पर विराम लग गया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में बदलाव की भी कोई बात नहीं हो रही। नितिन नवीन अभी जेपी नड्डा की टीम से ही अपना काम चला रहे हैं। पार्टी के एक महासचिव तरुण चुघ को मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया, तो उनके केंद्र में मंत्री बनाए जाने की चर्चा है। पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं। चुघ पंजाब के प्रभारी हैं। चर्चा तो दूसरे महासचिव विनोद तावड़े के भी केंद्र में मंत्री बनने की है। महासचिवों में से एक राधामोहन दास अग्रवाल को बदले जाने की भी चर्चा रही है। बीएल संतोष की जगह सुनील बंसल को महासचिव (संगठन) बनाए जाने पर भी विचार हुआ था। सरकार और संगठन में बदलाव की संभावित समय-सीमा 20 जून आंकी जा रही थी, पर अब फोकस संसद के मानसून सत्र में कुछ बड़ा किया जाने पर है। विपक्षी दलों के सांसदों को तोड़ने की कवायद से नई चर्चा को जोड़कर देखा जा रहा है। तृणमूल के बाद उद्धव की शिवसेना भी बिखर गई। अगला नंबर शरद पवार की राकांपा और सपा का माना जा रहा है।