अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव शुक्रवार को सातवें दिन भी जारी रहा। अमेरिकी सेना ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर हमले तेज़ कर दिए जबकि इजरायल ने भी सैन्य अभियान बढ़ाने का संकेत दिया। इस बीच सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार को बताया कि देश के मध्य अल-खारज प्रांत के पूर्व में एक क्रूज मिसाइल को नष्ट कर दिया। मंत्रालय ने यह भी बताया कि उसने रियाद क्षेत्र के पूर्व में तीन ड्रोन को रोका था।
इससे पहले ईरान द्वारा मंगलवार को रियाद में अमेरिकी दूतावास को निशाना बनाकर हमला किया गया था। यह हमला खाड़ी देशों पर ईरान के लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच हुआ, जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे स्थित हैं। जंग शुरू होने के बाद से ईरान ने सऊदी अरब की तरफ दर्जनों मिसाइलें और ड्रोन लॉन्च किए हैं। रियाद में CIA हेडक्वार्टर, अरामको की तेल फैसिलिटी और दूसरे नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला किया गया है। ईरान ने साफ कहा है कि जिन देशों से उसपर हमले हो रहे हैं वो देश उसके लिए वैध निशाना है। वहीं, सऊदी अरब ने कहा है कि वह अपनी सुरक्षा की रक्षा और अपने क्षेत्र, नागरिकों और निवासियों की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करेगा।
ईरान सऊदी अरब के शीर्ष नेताओं को निशाना बना सकता
सऊदी अरब के शाही परिवार को डर है कि ईरान देश के शीर्ष नेताओं को निशाना बना सकता है। इस वजह से टॉप लीडर्स ने सीक्रेट ऑनलाइन बैठकें करनी शुरू कर दी हैं। द जेरूसलम पोस्ट की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सऊदी अरब को चिंता है कि ईरान सीधे या यमन में हूतियों के जरिए देश के सीनियर अधिकारियों को निशाना बनाने की कोशिश कर सकता है। ईरान के खिलाफ इजरायल-अमेरिकी युद्ध शुरू होने के बाद से रियाद ने कई एहतियाती कदम उठाए हैं। सऊदी अरब और ईरान की प्रतिद्वंद्विता मध्य पूर्व के सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है। इस सबके बीच यह जानना आवश्यक है कि सऊदी अरब और ईरान प्रतिद्वंद्वी क्यों हैं और दोनों देशों के भारत से कैसे संबंध हैं?
सऊदी अरब और ईरान की पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता
मध्य पूर्व की राजनीति में सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रतिस्पर्धा को अक्सर “मिडिल ईस्ट की कोल्ड वॉर” कहा जाता है। दोनों देश क्षेत्र में राजनीतिक, धार्मिक और सामरिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं, जिससे कई दशकों से तनाव बना हुआ है। सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रतिस्पर्धा अचानक नहीं शुरू हुई। इसका एक बड़ा मोड़ ईरानी क्रांति था। 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई जिसने ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को अपदस्थ कर, अयातुल्लाह रुहोल्लाह ख़ोमैनी के अधीन एक लोकप्रिय धार्मिक गणतंत्र की स्थापना की।
ईरान का नया शासन एक धर्मतंत्र है जहां सर्वोच्च नेता धार्मिक इमाम (अयातुल्लाह) होता है पर शासन एक निर्वाचित राष्ट्रपति चलाता है। इसके बाद ईरान एक इस्लामी गणराज्य बन गया और उसने खुद को शिया मुस्लिम दुनिया का नेता बताना शुरू किया। इससे पहले ईरान और सऊदी अरब दोनों ही अमेरिका के करीबी सहयोगी थे। क्रांति के बाद ईरान ने राजशाही व्यवस्था और पश्चिमी प्रभाव का विरोध शुरू किया, जिससे सऊदी अरब के साथ तनाव बढ़ गया।
धार्मिक विभाजन: सुन्नी बनाम शिया
दोनों देशों के बीच तनाव के सबसे बड़े कारणों में से एक सांप्रदायिक राजनीति है। सऊदी अरब में सुन्नी मुस्लिम समुदाय ज्यादा है। ईरान सबसे बड़ा शिया-बहुसंख्यक देश है। यह वैचारिक विभाजन क्षेत्रीय गठबंधनों और संघर्षों को प्रभावित करता है। मध्य पूर्व के कई देशों में सुन्नी और शिया समुदायों के बीच राजनीतिक तनाव रहा है और दोनों देश अक्सर अपने-अपने समुदायों का समर्थन करते हैं।
क्षेत्रीय शक्ति की प्रतिस्पर्धा
दोनों देश मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। दोनों देश यमन, सीरिया, इराक और लेबनान पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। उदाहरण के लिए सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन करता है। वहीं, ईरान हूती विद्रोहियों का समर्थन करता है। सीरिया में जहां ईरान सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन करता है। वहीं, सऊदी अरब असद सरकार के विरोधी समूहों के करीब रहा है। लेबनान की बात की जाए तो ईरान हिज़्बुल्लाह नामक शिया संगठन का समर्थन करता है। सऊदी अरब वहां के सुन्नी राजनीतिक समूहों के करीब है।
दोनों देशों के अंतरराष्ट्रीय सहयोगी भी अलग-अलग हैं। सऊदी अरब के करीबी संबंध अमेरिका और पश्चिमी देशों से हैं। वहीं, ईरान के संबंध रूस और चीन से अधिक मजबूत हैं।
परमाणु कार्यक्रम का विवाद
सऊदी अरब और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहते हैं। उन्हें डर है कि इससे ईरान की सैन्य और राजनीतिक ताकत बढ़ सकती है। उन्हें डर है कि अगर ईरान परमाणु हथियार विकसित कर लेता है तो क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदल जाएगा। इसी कारण अमेरिका और पश्चिमी देशों ने लंबे समय तक ईरान पर प्रतिबंध लगाए।
सऊदी अरब- ईरान के कूटनीतिक संबंधों में उतार-चढ़ाव
दोनों देशों के संबंध कई बार बहुत खराब हुए। 2016 में सऊदी अरब ने एक शिया धर्मगुरु को फांसी दी। इसके बाद ईरान में सऊदी दूतावास पर हमला हुआ और दोनों देशों ने राजनयिक संबंध तोड़ दिए। लेकिन हाल के वर्षों में तनाव कम करने की कोशिश भी हुई। Saudi–Iran diplomatic rapprochement के तहत दोनों देशों ने 2023 में चीन की मध्यस्थता से फिर से संबंध बहाल किए।
भारत के सऊदी अरब और ईरान से संबंध
भारत की विदेश नीति को अक्सर “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) कहा जाता है। पश्चिम एशिया की राजनीति में सऊदी अरब और ईरान के बीच दशकों से प्रतिस्पर्धा और तनाव रहा है। इसके बावजूद भारत दोनों देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखता है। यह भारत की विदेश नीति के उस सिद्धांत को दिखाता है जिसे अक्सर रणनीतिक संतुलन या “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” कहा जाता है। भारत इन दोनों देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है क्योंकि दोनों उसके लिए अलग-अलग कारणों से महत्वपूर्ण हैं। सऊदी अरब जहां ऊर्जा और व्यापार का बड़ा स्रोत है, वहीं ईरान क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और रणनीतिक पहुंच के लिए अहम है।
इसी वजह से भारत अक्सर मिडिल ईस्ट की राजनीति में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से बचता है और दोनों देशों के साथ सहयोग बनाए रखने की नीति अपनाता है। संक्षेप में, भारत की कूटनीति का लक्ष्य है कि वह ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखते हुए सऊदी अरब और ईरान दोनों के साथ सकारात्मक संबंध बनाए रखे।
भारत और सऊदी अरब के आपसी संबंध
सऊदी अरब भारत के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदारों में से एक है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और सऊदी अरब लंबे समय से उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार भी तेज़ी से बढ़ा है और हाल के वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार 40 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुका है। सऊदी अरब में लाखों की संख्या में भारतीय रहते और काम करते हैं जो इसे भारतीय प्रवासियों के लिए सबसे बड़े केंद्रों में से एक बनाता है। ये प्रवासी हर साल भारत को बड़ी मात्रा में रेमिटेंस भेजते हैं।
रेमिटेंस का अर्थ है, किसी विदेशी देश में काम कर रहे या रह रहे प्रवासी (NRI) द्वारा अपने मूल देश में रहने वाले परिवार या दोस्तों को पैसे भेजना। यह विदेशी मुद्रा का एक प्रमुख स्रोत है जो भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है। इसके अलावा भारत और सऊदी अरब के बीच रक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ रही है।
भारत और ईरान के संबंध
ईरान भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। खासकर चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) परियोजना भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच देती है। ईरान पहले भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में से एक था, हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत को ईरान से तेल आयात कम करना पड़ा। फिर भी दोनों देशों के बीच ऊर्जा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग के मुद्दों पर संवाद जारी है। भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध भी काफी पुराने हैं, जिनकी जड़ें मुगल काल और फारसी सांस्कृतिक प्रभाव तक जाती हैं।
समुद्र में ईरानी युद्धपोत डुबोना कितना वैध, अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?
अमेरिका की एक पनडुब्बी ने इस सप्ताह श्रीलंका से करीब 40 नॉटिकल मील दूर ईरान के युद्धपोत ‘IRIS Dena’ को टॉरपीडो से निशाना बनाकर डुबो दिया। इसके बाद ईरान ने धमकी दी कि हिंद महासागर में ईरान के एक युद्धपोत को टॉरपीडो के हमले से डुबोने के लिए अमेरिका को बहुत पछताना पड़ेगा। यह घटना समुद्री युद्ध से जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी ध्यान खींचती है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
