यूपी में चुनावी सर्वेक्षणों की चर्चाओं ने भाजपा की चिंता और विपक्ष का उत्साह बढ़ा दिया है। संगठन में बैठकों और रणनीति पर मंथन के बीच गोवा में आप और कांग्रेस के समीकरण बदल रहे हैं। संसद के सत्रावसान पर सत्ता-विपक्ष आमने-सामने हैं। बिहार में नाम बदलने की राजनीति तेज है, जबकि नंदीग्राम में उम्मीदवारों और दलों के बदलते रुख ने मुकाबले को पेचीदा बना दिया है। देशभर में सियासी हलचल लगातार बढ़ती जा रही है।

सर्वेक्षण की घंटी

उत्तर प्रदेश में इन दिनों सियासी हलचल बढ़ गई है। कई तरह के सर्वेक्षणों ने बेचैनी और बढ़ा दी है। चर्चा है कि पिछले दिनों भाजपा आलाकमान ने उत्तर प्रदेश को लेकर अपना जो सर्वेक्षण कराया था उसमें पार्टी के नुकसान की आशंका जताई गई थी। राज्य में विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी में होंगे। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में करारा झटका लगा था। उस नतीजे की छाया से पार्टी विधानसभा चुनाव में बचने की पुरजोर कोशिश कर रही है। लखनऊ में इसी हफ्ते राज्य के नए पार्टी प्रभारी विनोद तावड़े और राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ गहन मंत्रणा की तो आरएसएस ने भी भाजपा के साथ तालमेल की कवायद बढ़ाई है।

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन भी दो दिन के दौरे पर मेरठ और सहारनपुर आएंगे। उधर सपा खेमा अपने सर्वेक्षण में भाजपा विरोधी हवा की खबर से बम-बम है। लखनऊ में इन दिनों राज्य के गृह विभाग के आला अफसरों पर एक साथ गिरी गाज को राज्य सरकार के खुफिया सर्वे की रिपोर्ट मीडिया में लीक होने से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा है कि मुख्यमंत्री योगी ने यह सर्वे कराया था और इसमें भाजपा के मौजूदा सौ से ज्यादा विधायकों के हारने की बात कही गई थी। इसी से यह अटकल भी जोरों पर है कि भाजपा अलोकप्रिय विधायकों के टिकट काटने से गुरेज नहीं करेगी।

राहु बनी आप

आरोप रहा है कि आम आदमी पार्टी ने भाजपा को कम और कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। आप गोवा में फिर कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बनने की राह पर है। कांग्रेस मान रही है कि गोवा में भाजपा सरकार अलोकप्रिय हुई है और इस बार कांग्रेस के आसार बेहतर हो सकते हैं। चर्चा तो चली थी कि गोवा में आप और कांग्रेस के बीच तालमेल होगा। हालांकि पंजाब चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस ने आप के साथ तालमेल का विचार छोड़ दिया। इसे देख आप ने गोवा फारवर्ड पार्टी से हाथ मिला लिया है। पिछले चुनाव में यह पार्टी कांग्रेस के साथ आप और गोवा फारवर्ड पार्टी ने गठबंधन का नाम गोवा फर्स्ट रखा है। कांग्रेस भी आरजीपी के साथ तालमेल करने की तैयारी में है। सीधे मुकाबले में भाजपा के लिए कांग्रेस चुनौती पेश करने की हालत में होती पर त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा विरोधी वोट बंट गए तो कांग्रेस घाटे में रह सकती है।

सत्रावसान पर है घमासान

संसद के मानूसन सत्र के कार्य दिवस खत्म हो चुके हैं। लेकिन इस सत्र के सत्रावसान को लेकर सियासी घमासान थम नहीं रहा है। इसी बीच सत्रावसान की इस समयावधि ने एक नया कीर्तिमान बना दिया है। यह कीर्तिमान अब तक सबसे लंबे समय बाद सत्रावसान की समय सीमा का है। आज तक कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी सत्र के लिए इतने समय बाद भी सत्रावसान नहीं हुआ हो। इस मुद्दे पर सरकार विपक्ष के निशाने पर है जो इसे परिसीमन विधेयक की रणनीति से जोड़कर देख रहा है। जिस तरह से कांग्रेस-तृणमूल के बीच सहमति बनती दिख रही है, इससे लग रहा है कि अभी विपक्षी रणनीति को तोड़ने में सत्ता के चाणक्य को और जोर लगाना होगा।

भक्ति-भाव

बिहार में इन दिनों नाम बदलने के सुझाव खूब आ रहे हैं। यूं तो यह चलन भाजपा शासित सभी राज्यों में चल रहा है। लेकिन सहयोगी दल भी इसे जोर-शोर से आजमा रहे हैं। जीतनराम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के नेता और सम्राट चौधरी की सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने सुझाव दिया है कि बख्तियारपुर का नाम बदलकर नीतीशपुर रख देना चाहिए। सुमन मांझी के पुत्र हैं। नीतीश कुमारने खुद इस्तीफा देकर जीतनराम मांझी को नौ महीने के लिए बिहार का मुख्यमंत्री बनवाया था। उनके बेटे ने एक शहर का नाम नीतीश के नाम पर रखने की मांग कर नई बहस छेड़ दी है। दूसरी तरफ जनता दल (एकी) में यह बहस अलग चल रही है कि पार्टी का नाम ही बदल कर जनता दल (नीतीश) करना चाहिए।

इसकी शुरुआत पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने की। इसके बाद तो एक-एक कर कई नेता समर्थन में कूद पड़े। इसमें कुछ अटपटा है भी नहीं। नेताओं के नाम पर देश में पहले से कई पार्टियां रही हैं और आज भी हैं। मसलन ओड़ीशा में बीजू जनतादल है तो शिव सेना और राकांपा भी उद्धव और शरद पवार के नाम पर हैं। चर्चा तो यह भी है कि नीतीश के बेटे निशांत का पार्टी पर वर्चस्व कायम करने के लिए यह अभियान चलाया गया है। पार्टी के बिहार के सूबेदार उमेश कुशवाह ने तो जैसे इसका बीड़ा उठा रखा है। वैसे भी अब इस खेमे को अपने अस्तित्व के लिए नीतीश के नाम की बहुत जरूरत है।

नंदीग्राम का संग्राम

चर्चा थी कि ममता बनर्जी नंदीग्राम सीट से खुद विधानसभा उपचुनाव लड़ सकती हैं। नंदीग्राम के साथ राज्य की रेजीनगर सीट का भी उपचुनाव हो रहा है। नंदीग्राम सीट शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे से खाली हुई थी। वे भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों सीटों से लड़े और जीते थे। ममता ने दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। रेजिपुर में तो मुसलमान को उतारना ही था पर नंदीग्राम में इस बार संचिता प्रधान डे को टिकट दिया था। लगा कि महिला उम्मीदवार को खड़ा कर ममता बनर्जी ने दूरदृष्टि दिखाई। लेकिन शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद संचिता डे ने अपना नाम वापस ले लिया।

इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस के उम्मीदवार को अपना समर्थन दे दिया। अब खबर है कि कांग्रेस के उम्मीदवार की गिरफ्तारी हो चुकी है। राजनीति के इस चक्रव्यूह में नंदीग्राम सीट ममता बनर्जी और कांग्रेस के लिए पहेली बन गई है। आम तौर पर उपचुनाव सत्ताधारी दल ही जीतता है। नंदीग्राम के जरिए अधिकारी सरकार संदेश दे रही है कि फिलहाल वो यहां किसी और राजनीतिक दल को किसी तरह का ‘अधिकार’ नहीं देना चाहती है।