देश की राजनीति में इन दिनों कई मोर्चों पर हलचल तेज हो गई है। आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर बीजेपी ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को चेहरा घोषित किया गया है। वहीं महंगाई ने आम जनता की परेशानी बढ़ा दी है। महाराष्ट्र में गठबंधन पर संकट है, जबकि तेलंगाना में नई पार्टी ने सियासी समीकरण बदल दिए हैं।

असमंजस खत्म

इस साल के विधानसभा चुनाव तो निपट गए। असम को छोड़ बाकी कहीं भाजपा सत्ता में नहीं थी लिहाजा कहीं भी मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। लेकिन अगले साल होने वाले चुनाव के लिए चेहरे घोषित करने की कवायद भाजपा ने शुरू कर दी है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने एलान कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव पार्टी योगी आदित्यनाथ की अगुआई में ही लड़ेगी। उत्तर प्रदेश के साथ गोवा, उत्तराखंड, मणिपुर और पंजाब में भी चुनाव होगा। पंजाब में पार्टी की ताकत सरकार बनाने लायक है नहीं। सो मुख्यमंत्री के चेहरे की नौबत आएगी नहीं। हालांकि इन दिनों के हालात देख कर लग रहा, पंजाब में कभी भी कुछ हो सकता है।

उत्तराखंड में पिछला चुनाव भाजपा ने धामी के नेतृत्व में लड़ा था। पार्टी तो जीत गई थी पर धामी खुद हार गए थे। फिर भी मुख्यमंत्री उन्हें ही बनाया। वे भी चाहेंगे कि पार्टी योगी की तरह उन्हें भी मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करे। लेकिन ऐसा करने से सत्ता विरोधी लहर का खतरा हो सकता है। गोवा में मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत के काम से पार्टी खुश है। वैसे अगले साल के आखिर में गुजरात और हिमाचल में भी चुनाव होगा। गुजरात में तो प्रधानमंत्री ही चेहरा रहेंगे और यहां पार्टी को जीत का पक्का भरोसा भी है। हिमाचल में पार्टी चेहरा तो घोषित नहीं करेगी लेकिन बहुमत मिला तो जेपी नड्डा को बनाया जा सकता है मुख्यमंत्री।

महंगाई की मार

सरकार के आश्वासन खोखले साबित हुए और चुनावी घमासान खत्म होते ही आम जनता की जेब पर महंगाई का हमला शुरू हो गया है। एक तरफ गैस कंपनियों ने दाम बढ़ा दिए हैं, वहीं दूसरी ओर अब पेट्रोलियम कंपनियों को भी अपने नुकसान की भरपाई पर नजर है। दरअसल, गैस के दामों की घोषणा के बाद ही कई पेट्रोल पंप पर सामान्य पेट्रोल नहीं मिलने का आरोप है। वहां केवल महंगे पेट्रोल (प्रीमियम) की ही बिक्री की जा रही है। पूरे माह में इस तेल की खपत सबसे कम होती है और अंत में पंप के मालिकों के पास यह तेल बच जाता है। इसका असर यह होता है कि माह का अंत आते-आते पंप मालिक खास रणनीति के तहत पंप पर सामान्य तेल बंद कर देते हैं। दो-तीन पंप घूमने के बाद आदमी खीझ कर महंगा पेट्रोल ही भरवा लेता है। यह वाहन चालकों के लिए महंगा सौदा साबित हो रहा है।

मंत्रीजी और प्याज का राज

केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्याज का राज न केवल देश बल्कि विदेशों में चर्चाओं में है। मंत्री ने कहा कि वे गर्मी व लू से बचने के लिए प्याज का प्रयोग करते हैं। यहां तक कि उन्होंने जनता के सामने अपनी जेब से प्याज निकाल कर भी दिखाया। उनका कहना था कि न तो वे खुद एसी का प्रयोग करते हैं और न ही एसी वाले माहौल में बैठते हैं। इसके बाद सोशल मीडिया पर प्याज से गर्मी भगाने वाले मीम की बहार आ गई। दिखाया गया कि लोगों ने एसी की जगह बड़े प्याज लगा लिए हैं। यहां तक कि मंत्री जी को प्याज से बने सुपरमैन जैसे परिधान में भी दिखाया गया। कुछ लोगों ने दिखाया कि जेब में प्याज रखने के बाद उन्हें बर्फीली जगहों वाले कपड़े पहनने पड़े।

संकट में एकता

महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी की एकता पर संकट मंडरा रहा है। मतभेद विधान परिषद सीट की दावेदारी को लेकर है। परिषद की नौ सीटों का चुनाव इसी महीने होना है। विधानसभा के संख्याबल के हिसाब से चार सीट भाजपा और दो-दो सीट उसके सहयोगी दलों शिवसेना (शिंदे) व राकांपा (सुनेत्रा) को मिलना तय है। विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी अगर एकजुट रहे तो एक सीट उसे मिल सकती है। लेकिन अघाड़ी की एकता खतरे में नजर आ रही है। वजह है, इस सीट पर शिवसेना (उद्धव) का अपने उम्मीदवार अंबादास दानवे को उतारना। जबकि कांग्रेस और राकांपा (शरद) चाहते थे कि उद्धव खुद परिषद में जाएं। परिषद का उद्धव का कार्यकाल भी इसी महीने खत्म हो रहा है। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस और उद्धव की पार्टी ने शरद पवार का समर्थन किया था। कांग्रेस चाहती है कि या तो उद्धव खुद लड़ें या सीट उसके लिए छोड़ दें। कांग्रेस 12 मई को होने वाले इस चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। ऐसा हुआ तो विपक्ष के हाथ से परिषद की इकलौती सीट भी निकल जाएगी। वैसे भी इन दिनों विपक्ष के किसी भी गठबंधन में एकता या आपसी समझ बनाना सबसे मुश्किल काम होता है। जो सीमित शक्ति या राजनीतिक संसाधन बचे हैं, सब उसे अपनी तरफ बनाए और बचाए रखना चाहते हैं। सत्ता पक्ष के गठबंधन के पास एकता बनाए रखने के लिए काफी संसाधन रहते हैं।

के कविता की नई पार्टी

कविता ने आखिर अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बना ली। तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की बेटी हैं कविता। दिल्ली के आबकारी नीति मामले में जेल जाना पड़ा था विधान परिषद की सदस्य कविता को। परिवार में कलह के बाद कविता एक गैर-सरकारी संगठन तेलंगाना जागृति चला रही थीं। अब अपनी पार्टी का नाम उन्होंने ‘तेलंगाना राष्ट्र सेना’ रखा है। उनके पिता की पार्टी का नाम भी पहले ‘टीआरएस’ ही था, पर उसमें ‘तेलंगाना राष्ट्र समिति’ था टीआरएस का मतलब। हालांकि बाद में उन्होंने अपनी पार्टी का नाम बदलकर ‘भारत राष्ट्र समिति’ कर लिया था। जहां तक कविता का सवाल है अपने भाई से तो उनकी अनबन पहले से चल रही थी लेकिन अब वे अपने पिता केसीआर से भी नाराज हैं। सवाल यह है कि अलग पार्टी बनाने का उनका मकसद क्या है। कहीं वे वाइएस शर्मिला की राह पर तो नहीं हैं। वाइएसआर की बेटी शर्मिला ने भी अपने भाई जगन मोहन रेड्डी से मनमुटाव के बाद तेलंगाना में अपनी पार्टी बनाई थी, जिसका बाद में कांग्रेस में विलय कर लिया था।