उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियों ने अपनी तैयारियाँ तेज कर दी हैं। अखिलेश यादव ने जहाँ रायबरेली से अपनी ‘पीडीए रथ यात्रा’ की शुरुआत की, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी 03-04 अक्टूबर को मथुरा में ‘चिंतन बैठक’ करने वाली है।
पिछले विधानसभा चुनावों में अलग-अलग लड़ने वाले समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर खींचतान शुरू हो चुकी है। कांग्रेस गठबंधन में 150 सीटें मांग रही है, जबकि सूत्रों के अनुसार सपा इतनी सीटें देने के लिए तैयार नहीं है।
2022 के विधानसभा चुनाव में केवल एक सीट जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) संगठन नेतृत्व के स्तर पर अभी भी जूझती नजर आ रही है। हाल ही में मायावती उत्तराधिकार के प्रश्न पर स्पष्ट रूप से जूझती नजर आईं।
अब जबकि आगामी चुनाव में बस कुछ महीने रह गए हैं, आई जानते है विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल सपा के इतिहास के बारे में। सपा की स्थापना कब और कैसे हुई और अब तक की उसकी राजनीतिक यात्रा कैसी रही है।
सपा की स्थापना कब और कैसे हुई?
1990 का दशक देश और उत्तर प्रदेश में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था। 1989 में राज्य में भाजपा के समर्थन से जनता दल की सरकार बनी और मुलायम सिंह यादव ने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन यह सरकार दो साल भी नहीं चल सकी। रथ यात्रा का विरोध करने के कारण भाजपा ने केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर जनता दल सरकारों से अपना समर्थन वापस ले लिया।
इधर जनता दल में भी इस मुद्दे पर दरार आ गई। चंद्रशेखर ने वी पी सिंह से बगावत कर दी। मुलायम सिंह, चंद्रशेखर के साथ हो गए और कांग्रेस की मदद से कुछ महीने अपनी सरकार बचाने में कामयाब रहे। हालांकि मई 1991 में कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया और मुलायम सिंह की सरकार गिर गई।
इसके बाद मध्यावधि चुनाव हुए। भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। दूसरी ओर, चंद्रशेखर की नेतृत्व वाली समाजवादी जनता पार्टी (सजपा) केवल 34 सीटें ही जीत पाई।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इधर मुलायम सिंह यादव कांशीराम के एक साक्षात्कार से प्रभावित होकर उनसे मिलने के लिए दिल्ली पहुंचे। यहाँ कांशीराम ने मुलायम को अपनी पार्टी बनाने की सलाह दी थी। कांशीराम ने कहा था कि अगर मुलायम उनसे हाथ मिला लें तो दोनों मिलकर उत्तर प्रदेश में अन्य सभी दलों का सूपड़ा साफ कर सकते हैं।
इसके कुछ महीनों बाद ही मुलायम सिंह यादव सजपा से अलग हो गए और 04 अक्तूबर 1992 को अपनी अलग पार्टी की घोषणा कर दी। यह पार्टी थी- समाजवादी पार्टी।
उस समय मुलायम सिंह के अलावा पार्टी के अन्य प्रमुख नेता बेनी प्रसाद वर्मा, शिवपाल सिंह यादव, मोहन सिंह, कपिल देव सिंह और ‘छोटे लोहिया’ कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र थे। पार्टी ने लोहियावाद के आधार पर समता मूलक समाज के निर्माण को अपना उद्देश्य बनाया।
22 नवंबर 1939 को इटावा के सैफई गांव में जन्मे मुलायम सिंह यादव मात्र 15 साल में समाजवादी आंदोलन से जुड़ गए थे। 1954 में डॉ. राम मनोहर लोहिया के अगुवाई में नहर रेट आंदोलन चल रहा था। जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे थे। इटावा में प्रदर्शन के दौरान मुलायम सिंह को हिरासत में ले लिया गया। और वह मात्र 15 साल की उम्र में लोहिया के आदर्शों पर चलते हुए जेल चले गए थे।
1967 में लोहिया ने मुलायम को जसवंतनगर विधानसभा से टिकट दिया और मात्र 28 साल की उम्र में वह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के विधायक के रूप में विधानसभा पहुंचे। तब से वह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय क्रांतिकारी दल और जनता दल की टिकट पर चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचते रहे।
सपा कब-कब सत्ता में रही?
6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के गिरने के दिन ही कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। 1993 में चुनाव हुए। मुलायम सिंह अल्पसंख्यकों, यादवों और पिछड़ों के गठजोड़ के दम पर सपा को मजबूत किया। सपा 108 सीटें जीतने में कामयाब रही। हालांकि, भाजपा ने 176 सीटें जीती थीं और वह सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन सरकार बनाई सपा ने। 68 सीटें जीतने वाली बसपा और कांग्रेस के सहयोग से मुलायम सिंह यादव 04 दिसंबर 1993 को दूसरी बार मुख्यमंत्री बन गए। इस तरह लगभग एक साल पहले गठित हुई पार्टी अपने पहले चुनाव में ही सत्ता में आ गई।
दूसरी बार भी मुलायम सिंह की सरकार दो साल तक भी नहीं चल पाई। 29 जनवरी 1995 को कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया, जबकि 1 जून 1995 को बसपा ने। राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने मुलायम सिंह से इस्तीफा देने को कहा, लेकिन उन्होंने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। इसके बाद 3 जून 1995 को वोरा ने मुलायम सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया। इसके बाद मयावती भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गईं।
तीसरी बार पार्टी को राज्य में सत्ता में आने के लिए कुछ समय का इंतजार करना पड़ा। 2002 के चुनावों में राज्य में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। भाजपा के सहयोग से एक बार फिर मायावती मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन मायावती ने ताज कॉरिडोर घोटाला विवाद और भाजपा के साथ बढ़ते विवाद के कारण मायावती ने इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही एक बार फिर सपा के सरकार में आने का रास्ता साफ हो गया।
मुलायम सिंह ने कई दलों के समर्थन से तीसरी बार अगस्त 2003 में मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिया। वह उस समय विधानसभा के सदस्य भी नहीं थे। गुनौर से मध्यावधि चुनाव जीत कर वह विधानसभा पहुंचे। इस बार मुलायम सिंह ने अपना कार्यकाल पूरा किया और वह 2007 का चुनाव होने तक मुख्यमंत्री बने रहे। 2007 के चुनाव में बसपा 206 सीटें जीत कर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई।
1995 से लेकर 2003 तक हालांकि सपा राज्य में सत्ता में नहीं रही, लेकिन मुलायम सिंह यादव केंद्र सरकार में पहुंच गए। 1996 में मुलायम सिंह यादव पहली बार मैनपुरी से लोकसभा सीट जीतकर संसद पहुंचे। यह वह समय था जब वह दो बार गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में थे, लेकिन यह हो नहीं सका। उन्हें रक्षा मंत्री के पद से संतोष करना पड़ा। वह एच डी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के कार्यकाल में 1996 से लेकर 1998 तक रक्षा मंत्री रहे।
2012 विधानसभा चुनाव में सपा फिर से सत्ता में आई। इस बार उसने 403 सीटों में से 224 सीटें जीती थी और वह अकेले अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम थी। यह पहली बार था, जब पार्टी अपने दम पर सरकार बना रही थी। लेकिन इस बार मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव बने।
अपने दम पर 2012 में सरकार बनाने वाली पार्टी अगले ही विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हारी। 2017 में पार्टी को केवल 47 सीटें मिली। वहीं, 312 सीटें जीतकर भाजाप प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई।
सपा की स्थिति लोकसभा चुनावों में भी खराब रहीं। 2014 और 2019 दोनों ही चुनावों में पार्टी केवल पांच सीटें ही जीत पाई। 2022 के विधानसभा चुनावों में सपा की स्थिति में सुधार हुआ और उसने 111 सीटें जीतीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने एक बार फिर बेहतर प्रदर्शन किया और 37 सीटों पर जीत हासिल की। यह पिछले दो लोकसभा चुनावों की तुलना में काफी बड़ा उछाल था। आज पार्टी लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। वर्तमान में पार्टी के चार राज्यसभा सांसद भी हैं।
पार्टी के विभाजन का संकट
2012 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही अखिलेश यादव और उनकी युवा ब्रिगेड ने पार्टी के पुराने नेताओं को दरकिनार करना शुरू कर दिया। 2016 तक स्थिति इतनी विकट हो गई कि पार्टी के विभाजन तक की नौबत आ गई। एक तरफ थे पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवपाल सिंह यादव तथा दूसरी तरफ थे अखिलेश और रामगोपाल यादव।
टिकट के बंटवारे और कौमी एकता दल के विलय को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि दिसंबर 2016 में मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश और रामगोपाल को छह वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। 1 जनवरी 2017 को अखिलेश यादव ने एक आपातकालीन राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाकर खुद को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया और मुलायम सिंह को ‘संरक्षक’ बना दिया।
ममला चुनाव आयोग तक पहुंचा। आयोग ने अखिलेश गुट को ही असली समाजवादी पार्टी माना और साइकिल चुनाव चिह्न उन्हें सौंप दिया। तब से अखिलेश ही पार्टी का कमान संभाल रहे हैं और एक दशक के लंबे इंतजार के बाद राज्य की सत्ता में फिर से लौटने की जद्दो-जेहद कर रहे हैं।
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समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने ही पार्टी के दो नेता आपस में भिड़ गए। लखनऊ में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बुलाई गई बैठक में एटा जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष जुगेंद्र सिंह यादव और पूर्व विधान परिषद अध्यक्ष रमेश यादव के भतीजे सपा नेता मंजीत यादव के बीच तीखी कहासुनी हो गई। दोनों के बीच जमकर जुबानी जंग हुई। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।
