UGC New Rules Controversy: यूजीसी ने शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम जारी किए तो उसको लेकर देशभर में विवाद खड़ा हो गया। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक पर सामान्य वर्ग के लोगों ने इन नियमों का जमकर विरोध किया है। दो हफ्ते तक चले विरोध और सोशल मीडिया कैंपेन के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और कोर्ट ने पहली सुनवाई ही सारे नियमों पर रोक लगा दी लेकिन इस पूरे प्रकरण में बीजेपी की परेशानियां बढ़ गई है।

क्या थे UGC के जातिगत भेदभाव रोकने वाले नियम?

केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाले यूजीसी के नए नियमों की बात करें तो यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम जारी किए थे। इसका नाम ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’ नाम था। इन नियमों में उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए ‘इक्विटी कमिटी’ बनाने का प्रावधान था, लेकिन नियमों में भेदभाव की परिभाषा सिर्फ अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित थी।

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UGC में सामान्य वर्ग के लिए क्या?

यूजीसी के नए नियमों में सामान्य वर्ग के छात्रों को इसमें सुरक्षा नहीं दी गई थी। इसके चलते ही यूजीसी के नए नियमों को लेकर विवाद हो गया था। कई याचिकाओं में कहा गया कि ये नियम भेदभाव को बढ़ावा दे सकते हैं और सामान्य वर्ग के लोगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि ऐसे नियम समाज को बांट सकते हैं और शिक्षा में एकता की बजाय अलगाव पैदा कर सकते हैं, जिसके चलते छात्रों के बीच भी आने वाले वक्त में टकराव हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हुई और सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “हमारे देश में 75 साल बाद भी क्या हम एक ऐसे समाज की ओर जा रहे हैं जहां वर्गहीनता की बजाय पीछे की ओर लौट रहे हैं?” इसके साथ ही कोर्ट ने अमेरिका के इतिहास का उदाहरण दिया और चेतावनी के तौर पर कहा कि वहां कभी श्वेत और अश्वेत के बच्चे अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते थे। भारत की एकता शैक्षणिक संस्थानों में दिखनी चाहिए। उम्मीद है कि हम अमेरिका की तरह अलग-अलग स्कूलों में न पहुंच जाएं, जहां अश्वेत और श्वेत अलग-अलग स्कूलों में जाते थे।”

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BJP के अंदर ही उठे हैं सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यूजीसी, केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। मामले की सुनवाई 19 मार्च को होगी और उसके पहले ही उन्हें जवाब देना होगा। भले ही अभी ये मामला ठंडा हो गया है, लेकिन खत्म हो गया… ये नहीं कहा जा सकता। इसकी वजह यह है कि कई समान्य वर्ग के ग्रुप, संगठन सीधी मांग ये कर रहे हैं, कि सरकार इस नियमावली को ही वापस ले और यही बीजेपी के लिए आज के वक्त में सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है।

सामान्य वर्ग को आम तौर पर उत्तर भारत के राज्यों में बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है। यूजीसी के मुद्दे पर बीजेपी के इसी कथित वोट बैंक का नाराज होना ही पार्टी के लिए चुनौती का सबब बन सकता है। वहीं अहम बात यह है कि बीजेपी के जनरल केटैगरी से आने वाले कई बीजेपी के निचले स्तर के नेताओं ने भी पार्टी आलाकमान को पत्र लिखकर अपना विरोध जताया है। बीजेपी के भीतर ही लोगों का ये मानना था कि इन नियमों की वजह से बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। एक बीजेपी नेता ने कहा कि हमें अपने समर्थकों को समझाना मुश्किल हो रहा है और अगर हम विरोध नहीं करेंगे तो हमारे समर्थक हम पर ही सवाल उठाएंगे।

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सामान्य वर्ग के लोग के लामबंद

यूजीसी के नियमों को लेकर जनरल कटैगरी के युवाओं का कहना है कि ये नए नियम जनरल कटैगरी के खिलाफ हैं और इससे रिवर्स भेदभाव शुरू हो जाएगा। साथ ही सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कोई दूसरा छात्र झूठी शिकायत कर देगा, तो इस हरकत के लिए उस पर किसी कार्रवाई का प्रावधान तक नहीं है, जिसके चलते लगातार सामान्य वर्ग के लोग यूजीसी के इन नियमों के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार के जवाब पर रहेगी नजर

भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इन कानून पर रोक लगा दी है, जिसके चलते सामान्य वर्ग के लोगों का गुस्सा थोड़ा कम हुआ है लेकिन बीजेपी की चिंता यह है कि उसे सुप्रीम कोर्ट में अभी जवाब भी देना हैं। ऐसे में अगर कोर्ट में सरकार अपने यूजीसी के इन नियमों का बचाव करते हुए जवाब देती है, तो भले ही फैसला कुछ भी हो, लेकिन सरकार का जवाब सामान्य वर्ग को नाराज जरूर कर सकता है।

इतना ही नहीं, अगर कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट में अगर सरकार अपना जवाब नए नियमों के विरोध में रखती है, तो पहली बात तो सरकार की किरकिरी ये होगी कि वो अपने ही कानून का विरोध करेगी, बल्कि दूसरा सियासी झटका उसे पिछड़ों के लिहाज से लग सकता है। यूपी से लेकर देश की राजनीति तक में इस समय पिछड़ों को केंद्र में रखकर सियासी मुद्दे चर्चा में हैं। कांग्रेस ओबीसी को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की मांग करती रही है, तो दूसरी ओर यूपी में पीडीए के तहत पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक को लामबंद कर रही है।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी खड़ा हो सकता है विवाद

अभी जब यूजीसी के नए कानून पर कोर्ट से रोक लगी है तो उसके खिलाफ कई विपक्षी राजनीतिक दलों ने विरोध किया था। जेएनयू में कोर्ट के फैसले का विरोध हुआ था। ऐसे में यह देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस पर क्या आता है। अगर सामान्य वर्ग की मांगों को मानते हुए सरकार फैसला सुनाती है, तो यह देखना होगा कि एससी एसटी या ओबीसी वर्ग के लोगों का रुख क्या रहता है।

साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एससी एसटी के कानूनों में कुछ संशोधनों की बात कही थी, तो एससी एसटी वर्ग के लोगों ने काफी विरोध किया था। नतीजा ये कि सुप्रीम कोर्ट की सिफारिशों से इतर सरकार ने एससी एसटी के उन कानूनों को और मजबूत कर दिया था। ऐसे में सवाल यह भी है कि अगर ऐसी ही मांग एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एससी एसटी समाज के लोगों की तरफ से उठाई गई, तो सरकार का रुख क्या होगा।

साथ ही अगर सामान्य वर्ग की मांगों को सरकार की तरफ से तवज्जों नहीं दी गई, और इन नियमों में संशोधन नहीं हुए तो भी बीजेपी के लिए मुश्किलें आ सकती है। इसके चलते ही सबसे बड़ा सवाल यही है, कि जो बीजेपी 2014 से लेकर अब तक, मंडल कमंडल को साध रही थी, उसके बीच पार्टी अब कैसे संतुलन बनाएगी। UGC के नए नियम के विरोध की आंच बीजेपी तक पहुंची, 11 पदाधिकारियों ने दिया इस्तीफा