द केरल स्टोरी 2 इस समय सुर्खियों में बनी हुई है। ‘केरल स्टोरी 2’ का निर्देशन कामाख्या नारायण सिंह ने किया है। यह फिल्म सुदीप्तो सेन द्वारा निर्देशित ‘केरल स्टोरी’ का सीक्वल है। दोनों फिल्मों के निर्माता विपुल शाह हैं। केरल स्टोरी की तरह ही केरल स्टोरी 2 भी छल से धर्मांतरण के विषय पर केंद्रित है।
केरल स्टोरी में केरल की तीन लड़कियों की कहानी थी। ‘केरल स्टोरी 2’ में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की लड़कियों की कहानी को दिखाया गया है। ट्रेलर के अनुसार यह फिल्म वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है। फिल्म के ट्रेलर के रिलीज होने के बाद से ही इस पर विवाद हो गया है। निर्देशक अनुराग कश्यप ने इसे प्रोपगैण्डा फिल्म ठहरा दिया। जवाब में फिल्म के निर्देशक कामाख्या नारायण ने कहा कि “अगर मैंने कुछ भी गलत दिखाया है तो फिल्म निर्माण छोड़ दूँगा।”
‘केरल स्टोरी’ और ‘केरल स्टोरी 2’ दोनों के रिलीज के दौरान छल से धर्मांतरण का मुद्दा चर्चा में रहा मगर आंकड़े इस बारे में क्या कहते हैं इस पर कम बात होती है। जनसत्ता की विशेष शृंखला आंकड़े बोलते हैं में आज हम इसी विषय की गहरी पड़ताल करेंगे, मगर आंकड़ों में।
क्या होता है छल से धर्मांतरण?
सबसे पहले जानते हैं कि धर्मांतरण होता क्या है और छल से धर्मांतरण को लेकर कानूनी परिभाषा क्या है? धर्मांतरण का सरल शब्दों में मतलब होता है कि एक रिलीजन को छोड़कर दूसरा रिलीजन अपना लेना। धर्मांतरण के बाद व्यक्ति अपनी पूजा-पद्धति और जन्म-विवाह-मृत्य इत्यादि के संस्कार नए रिलीजन के अनुसार पालन करता है।
भारतीय संविधान स्वेच्छा से मतांतरण की स्वतंत्रता देता है मगर संविदान छल या धोखे या बलप्रयोग करके धर्मांतरण कराने की अनुमति नहीं देता है।भारत के कई राज्यों ने छल से धर्मांतरण को लेकर विशेष कानून हैं। इस लिस्ट में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्य शामिल हैं।
इन राज्यों के धर्मांतरण से जुड़े कानून में कुछ समानताए हैं। यदि बल प्रयोग या धमकी देकर धर्म बदलवाया जाए, या फिर लालच या प्रलोभन देकर मजबूर किया जाए तो इसे अपराध माना जाएगा। अब भारत सरकार ने अभी तक आधिकारिक तौर पर जबरदन धर्मांतरण को लेकर कोई आंकड़े जारी नहीं किए है, एनसीआरबी भी ऐसा कोई डेटा नहीं देता है। ऐसे में आंकड़े कुछ राज्यों तक सीमित हैं जहां जबरन धर्मांतरण कानून को लेकर डेटा जारी किया गया है। कुछ ऐसे आंकड़े हैं जो संसद में रखे गए हैं, कुछ ऐसे भी डेटा हैं जो किसी राज्य की पुलिस ने साझा किए हैं। नीचे उसी डेटा को सरल शब्दों में डीकोड करने की कोशिश की गई है-
केरल में धर्मांतरण
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार केरल में कुल आबादी का 26.56% मुस्लिम समुदाय है। 1951 में केरल की मुस्लिम आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का 17.4 प्रतिशत थी। राज्य के अन्य धार्मिक समूहों की तुलना में मुस्लिम समुदाय की आबादी कई गुना ज्यादा तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2001 से 2011 के बीच में केरल में मुस्लिम आबादी 12.8% की दर से बढ़ी जबकि इस दौरान राज्य की औसत जनसंख्या वृद्धि दर 4.9% रही। इसी दशक में हिन्दुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 2.23 प्रतिशत ईसाइयों की जनसंख्या वृद्धि दर 1.38 प्रतिशत रही। हालाँकि मुस्लिम आबादी के कई गुना ज्यादा तेजी से बढ़ने के पीछे केवल धर्मांतरण कारण नहीं है। उच्च प्रजनन दर, कम उम्र में लड़कियों की शादी और परिवार नियोजन का अभाव भी इसके कारण माने जाते हैं। फिलहाल हम धर्मांतरण करके मुसलमान बनने वालों की संख्या की बात करेंगे।
केरल सरकार द्वारा जो आंकड़े सरकार द्वारा 2006 से 2012 के बीच दिए गए थे, उन्हें आप नीचे ग्राफिक्स में देख सकते हैं।
केरल की स्थिति डीकोड
समुदाय और आंकड़े
केरल में धर्मांतरण तब बड़ा मुद्दा बना जब वर्ष 2012 में केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमन चांडी राज्य की विधानसभा में एक रिपोर्ट पेश की। उस रिपोर्ट में बताया गया कि 2006 से 2012 के बीच 7713 लोग मुस्लिम बने जिनमें 2667 लड़किया भी थीं। रिपोर्ट के अनुसार लड़कियो के धर्मांतरण का प्रमुख कारण अंतर-धार्मिक विवाह था।
केरल सरकार के इन आंकड़ों को सीधी चुनौती दी केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल के मुखपत्र जाग्रता ने। अखबार द्वारा 2015 में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार 2005 से 2012 के बीच केरल में करीब चार हजार लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाया गया जिनमें ज्यादातर इस्लाम अपनाया। न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार केरल में धर्मांतरण का ट्रेंड वैसा नहीं है जैसा जनसंख्या वृद्धि दर की वजह से प्रतीत होता है। अखबार की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 20220 में आधिकारिक तौर पर धर्म परिवर्तन करने वालों में 47 फीसदी ने हिंदू धर्म अपनाया।
सरकार के पास जिन 506 लोगों की अपील धर्म परिवर्तन को लेकर आई थी, उसमें 241 ऐसे रहे जिन्होंने ईसाई या फिर इस्लाम धर्म छोड़ हिंदू धर्म को अपनाया। उसी रिपोर्ट में जानकारी दी गई कि जिन लोगों ने हिंदू धर्म अपनाया, उनमें से 72 फीसदी के करीब ऐसे रहे जो दलित ईसाई थे। वहां भी ज्यादातर लोग ईसाई चेरामार, ईसाई संबव और ईसाई पुलाया समुदाय से जुड़े हुए थे।
उत्तराखंड की स्थिति डीकोड
उत्तराखंड में जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए सात साल पहले उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट’ (UFRA) लाया गया था। जनसत्ता के सहयोगी इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट स्पष्ट बताती है कि उत्तराखंड के 13 जिलों में इसी कानून के तहत जबरन धर्म परिवर्तन के 62 मामले दर्ज कराए गए थे। अभी तक सिर्फ पांच मामलों का ट्रायल पूरा हुआ है। अब पूरे ट्रायल का मतलब है कि अदालत ने सभी पक्षों को सुना और उसके बाद फैसला सुनाया।
मामले
हुए मामले
बरी
इन सभी पांच मामलों में आरोपियों को बरी किया गया। वहीं जो बाकी बचे हुए मामले रहे वहां या तो शिकायतकर्ता अपने बयान से पलट गए या फिर आरोपों की ही पुष्टि नहीं हो पाई।
इसके अलावा पुलिस ने 24 मामलों में धर्म परिर्तन कानून के अलावा रेप या फिर किडनैपिंग की धाराएं भी जोड़ी थीं। लेकिन जब वो मामले अदालत पहुंचे तो 16 केसों में पाया गया कि लड़का-लड़की अपनी इच्छा से साथ आए थे। 11 ऐसे केस रहे जहां पीड़ित अपने पुराने बयान से ही पलट गए।
उत्तर प्रदेश की स्थिति डीकोड
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जब से उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021 आया है, धर्मांतरण से जुड़ी शिकायतें बढ़ी हैं। द क्विंट की एक रिपोर्ट बताती है कि पुलिस ने सबसे ज्यादा FIR जबरन ईसाई धर्म में तब्दील होने को लेकर की है। यूपी के 40 जिलों में इस कानून के तहत 170 FIR दर्ज हुई हैं, वहां भी 2020 से अब तक करीब 700 लोगों पर गैर-कानूनी धर्मांतरण के आरोप लगे हैं। 2022 से 2023 के बीच इस कानून के तहत सबसे ज्यादा एफआईआर आजमगढ़ में दर्ज की गई हैं, दूसरे पायदान पर सीतापुर आता है जहां 14 शिकायतें दर्ज हुईं, तीसरे नंबर 13 शिकायतों के साथ फतेहपुर है।
धर्मांतरण की स्थिति
(यूपी पुलिस डेटा)
इस अवधि में
- आजमगढ़ सर्वाधिक
- सीतापुर 14
- फतेहपुर 13
एक हैरान करने वाला पहलू ये है कि जो 170 एफआईआर दर्ज भी की गई हैं, वहां 200 से ज्यादा आरोपी ऐसे हैं जिनकी कोई पहचान ही नहीं है, सिर्फ अज्ञात लोगों पर शिकायत हुई है। यूपी पुलिस के अनुसार एक जनवरी 2021 से 30 अप्रैल 2023 के बीच उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम के तहत 427 मामले दर्ज किए गए, 833 गिरफ्तारियां हुईं। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इन 427 मामलों में से 185 केस ऐसे रहे जहां कोर्ट में पीड़ित ने स्वीकार किया कि उनका जबरन धर्म परिवर्तन करवाया गया। एक बड़ा पहलू ये भी है कि यहां 65 मामले नाबालिगों से संबंधित थे।
अगर जिलों की बात करें तो यूपी पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि धर्मांतरण से जुड़े सबसे ज्यादा 86 केस बरेली में दर्ज हुए हैं। गोरखपुर में 53 मामले दर्ज किए गए हैं, लखनऊ में 53, मेरठ में 47, प्रयागराज में 46 और वाराणसी में 39।
राजस्थान की स्थिति डीकोड
पिछले साल 9 सितंबर को राजस्थान की भजनलाल सरकार ने राजस्थान गैर-कानूनी धार्मिक धर्मांतरण प्रतिषेध विधेयक पारित किया था। सरकार का दावा था कि इस कानून के तहत ‘लव जिहाद’ को रोका जाएगा। लेकिन राज्य सरकार के पिछले पांच साल के आंकड़े अलग ही कहानी बयां करते हैं। असल में राजस्थान विधानसभा में उदयपुर ग्रामीण से सांसद फूल सिंह मीणा ने राज्य सरकार से पूछा था कि आखिर जबरन धर्मांतरण के कितने मामले सामने आए, आखिर क्यों इस प्रकार के कानूनी जरूरत पड़ी। इस सवाल के जवाब में सरकार के गृह विभाग ने विधानसभा में जवाब दिया था।
\डीकोड
9 सितंबर 2023 को राजस्थान की भजनलाल सरकार ने “राजस्थान गैर-कानूनी धार्मिक धर्मांतरण प्रतिषेध विधेयक” पारित किया। सरकार का दावा था कि इस कानून के तहत ‘लव जिहाद’ को रोका जाएगा।
उदयपुर ग्रामीण से सांसद फूल सिंह मीणा ने राज्य सरकार से पूछा — जबरन धर्मांतरण के कितने मामले सामने आए और इस कानून की जरूरत क्यों पड़ी? इस सवाल के जवाब में गृह विभाग ने विधानसभा में उपरोक्त आंकड़े प्रस्तुत किए।
कुछ हिंदू संगठनों ने दौसा जिले को लेकर दावा किया है कि वहां पिछले पांच सालों में करीब 4,000 जबरन धर्मांतरण हुए हैं। लेकिन इस डेटा की पुष्टि सरकार ने नहीं की है।
गृह विभाग के मुताबिक राजस्थान में कभी भी लव जिहाद का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया। एक दूसरा आंकड़ा भी सरकार ने ही विधानसभा में उपलब्ध करवाया था। उस आंकड़े के अनुसार पिछले पांच सालों में राजस्थान में अवैध धर्म परिवर्तन के सिर्फ 13 मामले सामने आए थे। कुछ हिंदू संगठनों ने जरूर दौसा जिले को लेकर दावे किए हैं कि वहां पिछले पांच सालों में चार हजार के करीब जबरन धर्मांतरण हुए हैं। लेकिन इस डेटा की पुष्टि सरकार ने नहीं की है।
मध्य प्रदेश की स्थिति डीकोड
मध्य प्रदेश भी छह साल पहले धर्मांतरण विरोधी कानून लेकर आया था। मोहन यादव सरकार ने खुद विधानसभा में एक जनवरी 2020 से 15 जुलाई 2025 तक का डेटा दिया था। भाजपा विधायक आशीष गोविंद शर्मा ने विधानसभा में एक विस्तृत लिखित जवाब दिया था। उस जवाब के मुताबिक पांच सालों में एमपी में इस कानून के तहत 283 मामले दर्ज किए गए थे। यहां भी 197 मामले में अभी तक अदालतों में विचारधीन हैं, यानी कि 70 फीसदी के करीब मामले। वहीं 86 मामलों में से 50 मामले ऐसे रहे जहां आरोपियों को बरी किया गया, यानी कि 58 फीसदी। यहां भी सजा सिर्फ 7 लोगों को हो पाई, मतलब मात्र 7 प्रतिशत।
स्थिति डीकोड
सरकार के मुताबिक जुलाई 15 2025 तक जो 283 मामले दर्ज किए गए, वहां 71 पीड़िताएं 18 साल से कम उम्र की लड़कियां थीं। ज्यादातर मामले भी पश्चिम और दक्षिण पश्चिम क्षेत्र में देखने को मिले। इसका मतलब है कि मालवा-निमार क्षेत्र धर्मपरिवर्तन के केंद्र रहे। अगर जिला-वार आंकड़ों की बात करें तो सबसे ज्यादा 74 मामले इदौर से सामने आए हैं, यानी कि कुल मामलों का 26 फीसदी। दूसरे पायदान पर 33 मामलों के साथ भोपाल है, तीसरे नंबर पर 13 मामलों के साथ धार जिला है। सीएम मोहन यादव के जिले उज्जैन और खंडवा में 12-12 केस दर्ज किए गए हैं।
