नीट परीक्षा के लीक होने के बाद से ही भारत की शिक्षा प्रणाली एक बार फिर सवालों में आ गई है। सरकार दावे कर रही है कि अगली बार से ऐसा नहीं होगा। लेकिन ऐसे आश्वासन लगातार दिए जा रहे हैं, जब भी पेपर लीक हुए हैं, कोई ना कोई बहाना तैयार रहता है। असल सच्चाई यह है कि पेपर लीक की समस्या सुलझने के बजाय उलझती जा रही है। हर प्रकार की तकनीक को चुनौती मिल रही है, सुरक्षा नेटवर्क में खामियां उजागर हो रही हैं।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत ही पेपर लीक की समस्या से जूझ रहा है। हमारे पड़ोसी चीन ने भी इसका सामना किया है। वहां भी कुछ पेपर लीक हुए हैं। वहां भी छात्रों के प्रदर्शन देखने को मिले हैं, लेकिन चीन ने भारत वाली गलती नहीं की। उसने अपनी कार्रवाई को सिर्फ कुछ गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं किया बल्कि एक ऐसी नीति तैयार की जहां पेपर लीक की संभावना ही काफी कम कर दी गई।
दुनिया का सबसे मुश्किल एग्जाम
चीन में दुनिया का सबसे मुश्किल एग्जाम होता है, इस परीक्षा का नाम है- Gaokao। इस परीक्षा के लिए छात्र 10 साल तक तैयारी करता है। यहां भी 10 मिलियन छात्रों में से सिर्फ 3 मिलियन छात्रों का ही चयन हो पाता है। इतनी मुश्किल परीक्षा को देखते हुए चीन की सरकार किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरतती है। व्यापक स्तर पर तैयारी की जाती है। जैसा माहौल किसी युद्ध के समय देखने को मिलता है, चीन कुछ उसी अंदाज में इस परीक्षा को आयोजित करता है।
किसी भी परीक्षा को लेकर सबसे बड़ा रिस्क होता है कि कागज किसी और के हाथ ना लग जाए। कहीं पर पेपर प्रिंट होता होगा, कोई उस पेपर को लेकर दूसरी जगह लेकर जाता होगा, फिर कहीं उसे सील किया जाता होगा, ऐसे में कई चरण हैं जिसके बाद एग्जाम पेपर किसी भी सेंटर तक पहुंचेगा। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो ज्यादातर हर देश में देखने को मिलती है। लेकिन फर्क यही है कि इस प्रक्रिया में कौन सा देश कितनी सावधानी बरत रहा है।
GPS ट्रैकिंग ने बदल दिया गेम
चीन ने यहीं पर सबसे ज्यादा सावधानी दिखाई है। उसने अपनी तकनीक के दम पर पेपर लीक की संभावना को ही कम कर दिया है। असल में चीन में जीपीएस तकनीक का काफी इस्तेमाल हो रहा है, हर गतिविधि को ट्रैक किया जाता है। डिस्ट्रीब्यूशन से लेकर डिलीवरी तक की हर डिटेल ऊपर बैठे अधिकारियों तक पहुंचती रहती है।
इसके अलावा जब टेस्ट पेपर को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना होता है तो अलग से एक SWAT टीम उनके साथ चलती है। एग्जाम सेंटर पर भी 8 पुलिस ऑफिसर्स की एक अलग टीम तैनात रहती है।
परीक्षा केंद्रों पर ड्रोन से निगरानी
वैसे धांधली करने वाले तो चीन में भी मौजूद है। परीक्षा वाले दिन वहां भी कई बार एग्जाम सेंटर में बैठकर भी बाहर से जवाब जानने की कोशिश रहती है। लेकिन तनकीक का इस्तेमाल यहां भी हुआ है। एग्जाम सेंटर के 500 मीटर के पास में ही कई ड्रोन उड़ते रहते हैं, अब वो ड्रोन निगरानी तो करते ही हैं, साथ में रेडियो सिग्नल के ट्रांसमिशन्स को रोकने का काम भी करते हैं। इसी वजह से इस प्रकार की चीटिंग करना काफी मुश्किल हो जाता है।
चीन में परीक्षा वाले दिन हर अभ्यार्थी की भी विस्तृत चेकिंग होती है। कई बार ऐसा होता है कि परीक्षा देने के लिए कोई दूसरा शख्स ही एग्जाम सेंटर पहुंच जाता है। ऐसी धांधली सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। लेकिन चीन ने कई स्तर की चेकिंग तैयार की है जिससे समय रहते ऐसे लोगों की पहचान आसानी से हो जाती है। चीन में बायोमेट्रिकि जांच होगी, फिंगरप्रिंट चेक करेंगे, फिर मेटल डिटेक्टर से गुजरना होगा, उसके बाद कोई छात्र परीक्षा देने के लिए आगे बढ़ सकेगा।
सिर्फ शिक्षा मंत्रालय नहीं, पूरी अलग टीम
चीन में अगर किसी परीक्षा के दौरान कोई गड़बड़ी हो भी जाए तो तुरंत रिपोर्ट करने की सुविधा दी गई है। ऐसी परीक्षाओं के वक्त एक फोन नंबर जारी किया जाता है जहां पर आसानी से शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है। चीन में एक और दिलचस्प पहलू देखने को मिलता है। यहां परीक्षा को लेकर सिर्फ शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं होती है, कई मंत्रालय साथ मिलकर काम करते हैं। ऐसे में सारा बोझ सिर्फ एक पर नहीं होता है और चेकिंग भी अलग-अलग स्तर पर देखने को मिलती है। चीन में पब्लिक सिक्योरिटी, नेशनल सिक्योरिटी और स्टेट इंटरनेट इनफॉर्मेशन ऑफिस को किसी भी परीक्षा के समय सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है।
अमेरिका में क्या होता है?
वैसे अमेरिका में भी परीक्षा करवाने का तंत्र काफी मजबूत है। वहां जो MCAT परीक्षा होती है, उसे पूरी तरह डिजिटल मोड में रखा जाता है। साल में कई बार सुरक्षित टेस्ट सेंटरों में इस परीक्षा का आयोजन होता है। एग्जाम एजेंसी के पास एक बड़ा डिजिटल प्रश्न बैंक होता है, उसी से सवाल पूछे जाते हैं। यहां पेपरों की छपाई या फिर उनकी ढुलाई की कोई जरूरत नहीं होती, ऐसे में लीक होने की संभावना ही कम हो जाती है।
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