तमिलनाडु क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का दसवां सबसे बड़ा राज्य है। जनसंख्या के हिसाब से यह देश का छठा सबसे बड़ा राज्य है। बात करें इतिहास की तो ब्रिटिश शासनकाल में यह प्रदेश मद्रास प्रेसिडेंसी का एक हिस्सा था। आजादी के बाद मद्रास प्रेसिडेंसी को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया गया जिसके बाद मद्रास समेत कई अन्य राज्य मिले। साल 1968 में मद्रास का नाम बदलकर तमिलनाडु रख दिया गया। तमिलनाडु की राजनीति में शुरुआत से ही क्षेत्रीय दलों का दबदबा रहा है।

पेरियार, अन्नादुरई, करुणानिधि, जयललिता जैसे बड़े नाम तमिलनाडु की पहचान रहे हैं। आज हम जनसत्ता की ‘किस्सा मुख्यमंत्री का’ सीरीज के तहत बात करेंगे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री कोंजीवरम नटराजन अन्नादुरई की।

जननेता अन्नादुरई

15 सितंबर 1909 को जन्मे सीएन अन्नादुरई को पेरारिग्नर अन्ना के नाम से मशहूर थे। उनका जन्म कांचीपुरम के साधारण बुनकर परिवार में हुआ। उनकी मां बंगारू अम्माल एक मंदिर की सेविका थीं। उनका पालन-पोषण उनकी बहन राजामणि अम्माल ने किया। आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और पढ़ाई के दौरान प्रभावशाली बोलने की कला से पहचान बना ली। 21 वर्ष की उम्र में उन्होंने विवाह किया। उनकी पत्नी का नाम रानी था।

भाषा पर उनकी पकड़ और जनता से जुड़ने की क्षमता ने ही आगे चलकर उन्हें जननेता बनाया। अन्नादुरई ने पेरियार से मतभेद के बाद द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की स्थापना की और पार्टी के पहले महासचिव बने। डीएमके ने 1956 में राजनीतिक सफर तय किया। मद्रास राज्य के तौर पर वह 1967 से 1969 के बीच मुख्यमंत्री भी रहे। साठ के दशक में हिंदी के खिलाफ हुए आंदोलन ने डीएमके को ताकत दी और 1967 में डीएमके ने राज्य से कांग्रेस का सफाया कर दिया। वह तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने।

सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि

तमिलनाडु में उस समय जातिगत असमानता और ब्राह्मण वर्चस्व के खिलाफ आंदोलन चल रहे थे। जस्टिस पार्टी और द्रविड़ आंदोलन ने सामाजिक न्याय की नींव रखी। इन आंदोलनों का अन्नादुरई के विचारों पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने सामाजिक बदलाव को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया।

अन्नादुरई ने 1930 के दशक में राजनीति में कदम रखा और जस्टिस पार्टी से जुड़े। बाद में वे ई.वी. रामास्वामी (पेरियार) के नेतृत्व वाले आंदोलन का हिस्सा बने। उन्होंने सामाजिक असमानताओं के खिलाफ आवाज उठाई और श्रमिकों तथा वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए काम किया।

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लेखक और विचारक

अन्नादुरई केवल राजनेता ही नहीं बल्कि एक शानदार लेखक, नाटककार और पत्रकार भी थे। उन्होंने तमिल और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन किया। उनके आर्टिकल और नाटक सामाजिक सुधार और जनजागरण के प्रमुख माध्यम बने। उनकी सरल और प्रभावशाली शैली ने साहित्य को आम जनता तक पहुंचाया।

DMK की स्थापना: एक नई शुरुआत

1949 में पेरियार से मतभेद के बाद अन्नादुरई ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) की स्थापना की। यह कदम तमिलनाडु में क्षेत्रीय राजनीति के उदय का प्रतीक बना। उन्होंने द्रविड़ पहचान और सामाजिक न्याय को राजनीतिक एजेंडा बनाया। वे ई.वी. रामास्वामी (पेरियार) के द्रविड़ आंदोलन से गहराई से प्रभावित थे। इस विचारधारा का मूल उद्देश्य जातिगत भेदभाव को खत्म करना, आत्मसम्मान बढ़ाना और सामाजिक बराबरी स्थापित करना था।

शुरुआत में अन्नादुरई ‘द्रविड़ नाडु’ (अलग देश) की मांग के समर्थक थे लेकिन बाद में उन्होंने इस मांग को छोड़ दिया। चीन-भारत युद्ध 1962 के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय एकता का समर्थन किया और अपने रुख को व्यावहारिक बनाया।

अन्नादुरई के नेतृत्व में DMK तेजी से मजबूत हुई। 1967 के चुनाव में पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और वे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। यह पहली बार था जब किसी क्षेत्रीय दल ने राज्य में कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया।

अन्नादुरई ने जाति व्यवस्था, अंधविश्वास और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। उनका मानना था कि लोकतंत्र का असली उद्देश्य समाज में समानता और न्याय स्थापित करना है। वे आम आदमी के नेता थे और हमेशा गरीबों और वंचितों के उत्थान के लिए काम करते रहे। अन्नादुरई ने पिछड़े वर्गों, दलितों और गरीबों के लिए नीतियां बनाईं। उनकी राजनीति ‘एंटी-कास्ट’ और ‘प्रो-इक्वलिटी’ पर आधारित थी जिसने तमिल समाज की संरचना को बदलने में अहम भूमिका निभाई।

मुख्यमंत्री के रूप में योगदान

मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने कई जनकल्याणकारी नीतियां लागू कीं। शिक्षा को सुलभ बनाया, गरीबों के लिए योजनाएं शुरू कीं और ‘मद्रास राज्य’ का नाम बदलकर ‘तमिलनाडु’ रखा। उनके फैसलों ने राज्य की पहचान को मजबूत किया। अन्नादुरई ने अंधविश्वास और पाखंड का विरोध किया लेकिन वे पूरी तरह धर्म विरोधी नहीं थे। वे तर्क और सामाजिक सुधार को प्राथमिकता देते थे।

मुख्यमंत्री बनने के बाद अन्नादुरई ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए:
-‘मद्रास राज्य’ का नाम बदलकर ‘तमिलनाडु’ किया
-सस्ता अनाज योजना (Rice Scheme) लागू की
-शिक्षा और सामाजिक कल्याण योजनाओं को बढ़ावा दिया
-सरकारी नीतियों में आम आदमी को केंद्र में रखा

उनकी सबसे लोकप्रिय योजनाओं में से एक थी गरीबों को सस्ते दर पर चावल उपलब्ध कराना। इस योजना ने उन्हें जनता के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया और ‘गरीबों के नेता’ की छवि मजबूत की।

राज्यसभा में भूमिका

राज्यसभा के सदस्य के रूप में अन्नादुरई ने राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रभावशाली भाषण दिए। उन्होंने हिंदी को थोपने के खिलाफ आवाज उठाई और भारत की विविधता को उसकी ताकत बताया। उन्होंने ‘एक देश, एक भाषा’ के विचार का विरोध किया और भाषाई विविधता का समर्थन किया। राज्यसभा में उनके भाषण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे। उन्होंने संघीय ढांचे, राज्यों के अधिकार और भाषाई विविधता पर मजबूती से अपनी बात रखी।

एक युग का अंत

3 फरवरी 1969 को मुख्यमंत्री पद संभालने के करीब दो साल बाद अन्नादुरई का निधन हो गया। लाखों लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़े। उनका अंतिम संस्कार विश्व के सबसे बड़े जनसमूहों में गिना गया। उनके निधन के साथ ही तमिलनाडु की राजनीति में एक युग का अंत हुआ।

अन्नादुरई की विचारधारा आज भी तमिलनाडु की राजनीति में जीवित है। सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय पहचान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित उनकी राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र को नई दिशा दी। DMK और अन्य द्रविड़ पार्टियां उनके विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं।