Strait of Hormuz- पिछले 13 दिन से यह एक नाम दुनियाभर की सुर्खियों में छाया हुआ है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से जुड़ी एक खबर आती है और कच्चे तेल की कीमतें ऊपर-नीचे हो जाती हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर यह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ है क्या? आंकड़ों में समझते हैं कि आखिर इस ग्लोबल कॉरिडोर को अगर ईरान ने बंद कर दिया तो क्या होगा? कच्चे तेल पर किस तरह असर पड़ेगा?
दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में तीन जहाजों पर ‘अज्ञात प्रोजेक्टाइल’ से हमला हुआ। इसकी जानकारी यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) ने दी थी। जानकारी के मुताबिक एक जहाज यूएई तट के पास क्षतिग्रस्त हुआ, दूसरा ओमान के उत्तर में आग लगने के बाद खाली कराया गया जबकि तीसरा दुबई के उत्तर-पश्चिम में था जिसे नुकसान पहुंचाया गया। अमेरिकी सेना का दावा है कि उसने स्ट्रेट में ईरान के 16 माइन बिछाने वाले जहाजों को नष्ट कर दिया है। युद्ध शुरू होने के बाद खाड़ी में कितने जहाजों को निशाना बनाया जा चुका है, TIMELINE
ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका और इज़राइल से जुड़ा संघर्ष इसी तरह जारी रहा और क्षेत्र के ऊर्जा मार्ग अस्थिर होते रहे तो कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। ईरान के खातम अल-अनबिया सैन्य मुख्यालय के प्रवक्ता इब्राहिम ज़ोलफकारी ने कहा कि लगातार हो रही बमबारी से क्षेत्रीय सुरक्षा कमजोर हो रही है और दुनिया को 200 डॉलर प्रति बैरल तेल के लिए तैयार रहना चाहिए। यह चेतावनी उस समय आई है जब ईरान ने बुधवार को ओमान की सबसे बड़ी तेल भंडारण सुविधा पर ड्रोन हमला किया।
20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति
आम तौर पर दुनिया के करीब 20% तेल की आपूर्ति इसी समुद्री रूट से होती है। लेकिन युद्ध के कारण जहाजों की आवाजाही घट गई है और वैश्विक तेल (Golbal Oil Prices) कीमतें बढ़ गई हैं।
ईरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बनाया जाएगा। हालांकि कुछ जहाज अभी भी गुजर रहे हैं। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद हुआ तो दुनिया भर में सामानों और सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। इस समुद्री रूट के बंद होने से चीन, भारत व जापान जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ क्या है और कहां है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण शिपिंग रूट में से एक है और यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग (oil transit choke point) है।
यह समुद्री रास्ता ईरान के उत्तर में और ओमान तथा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दक्षिण में स्थित है। इसके प्रवेश और निकास पर चौड़ाई लगभग 50 किमी (31 मील) है और सबसे संकरे हिस्से में करीब 33 किमी रह जाती है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है।
यह रास्ता खाड़ी क्षेत्र से दुनिया के बाकी हिस्सों तक तेल और गैस की आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है।
यह स्ट्रेट दुनिया के सबसे बड़े क्रू ऑयल टैंकर के लिए पर्याप्त गहरा है और इसे मध्य पूर्व में बड़े ऑयल और गैस प्रोड्यूसर्स द्वारा इस्तेमाल किया जाता है।

US Energy Information Administration (EIA) के मुताबिक, 2025 में Strait of Hormuz से करीब 20 मिलियन बैरल तेल गुजरा। यह सालाना करीब 600 अरब डॉलर (लगभग 447 अरब पाउंड) के ऊर्जा व्यापार के बराबर है।
गौर करने वाली बात है कि यह तेल सिर्फ ईरान से नहीं आता बल्कि दूसरे खाड़ी देश जैसे इराक, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और UAE भी इसमें शामिल हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ बंद हुआ तो क्या होगा?
इस समुद्री रास्ते से हर महीने करीब 3000 से ज्यादा जहाज गुजरते हैं। बाजार विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से गुजरने वाले जहाजों पर खतरा बना रहा तो तेल के दाम बढ़ने के साथ ही शिपिंग की कॉस्ट में भी इजाफा होगा।
पश्चिम एशिया में तनाव के बीच ईरान लगातार यह धमकी दे रहा है कि वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को बंद कर देगा और क्रूड ऑयल की कीमतें 200 डॉलर के पार चली जाएंगी। ईरान ने अभी तक जिस तरह इस रूट में रुकावट डाली हैं, उसका असर तेल की सप्लाई पर पड़ना शुरू हो गया है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोमवार को CNBC से कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों को ‘बहुत सावधान’ रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति अस्थिर बनी हुई है, तब तक सभी जहाजों और समुद्री यातायात को बेहद सतर्क रहकर गुजरना होगा।
दुनिया में हर दिन करीब 30% कच्चा तेल और लगभग एक-तिहाई एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) इसी स्ट्रेट के रास्ते भेजी जाती है। अगर यह मार्ग बंद होता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति (Global Energy Supply) पर बड़ा असर पड़ेगा जिससे बाजार में तेल की कीमतों में और तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
भारत पर असर
अगर इस स्ट्रेट को बंद किया गया तो ना केवल भारत बल्कि पूरे एशिया में तेल और गैस की कीमतें काफी बढ़ सकती हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 80% से अधिक हिस्सा पश्चिम एशिया और रूस से आयात करता है लेकिन मौजूदा हालात में दोनों जगहों से आपूर्ति दबाव में है।
भारत में पिछले कुछ दिनों से एलपीजी किल्लत की खबरों से लोगों में घबराहट हो रही है। केंद्र सरकार ने एलपीजी संकट के बीच कमेटी बनाने के साथ-साथ स्पेशल कंट्रोल रूम बनाया है और घरेलू एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए हैं।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने पश्चिम एशिया के ऊर्जा संकट से निपटने के लिए भारत सरकार को तीन तात्कालिक कदम उठाने की सलाह दी है:
-घरेलू आपूर्ति को प्राथमिकता देने के लिए पेट्रोल और डीज़ल के निर्यात को अस्थायी रूप से रोक दिया जाए।
-रूस के साथ कच्चे तेल की दीर्घकालिक (लॉन्ग-टर्म) आपूर्ति के लिए समझौते किए जाएं।
-भारत को अपने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए तेल खरीदने के फैसले खुद लेने चाहिए और अमेरिका के ऐसे दबाव या प्रभाव को नज़रअंदाज़ या उसका विरोध करना चाहिए।

कच्चे तेल की कीमतों में उठापटक
गौर करने वाली बात है कि सोमवार को तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई थीं। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब यह बयान दिया कि युद्ध जल्द खत्म होगा तो तेल की कीमतों में एक दिन में ही रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई। क्रूड ऑयल का दाम 120 डॉलर प्रति बैरल तक जाने के बाद मंगलवार को 87 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया।
इसके बाद फिर से बुधवार को पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गए। आज गुरुवार (12 मार्च) को ट्रंप ने फिर बयान दिया कि ईरान के साथ जंग जल्द खत्म होगी क्योंकि उनकी नेवी और एयरफोर्स खत्म हो चुकी है। इससे बाजार को सकारात्मक संकेत मिले और कच्चे तेल के दाम फिर 100 डॉलर के नीचे पहुंच गए जो युद्ध से पहले के स्तर से अभी भी काफी ज्यादा है।
लंदन स्टॉक एक्सचेंज ग्रुप के आंकड़ों के अनुसार, मिडिल ईस्ट से चीन तक तेल ले जाने वाले सुपरटैंकर को किराए पर लेने की लागत पिछले हफ्ते के मुकाबले लगभग दोगुनी होकर 4 लाख डॉलर (करीब £298,300) से अधिक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।
इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के लगभग बंद होने से सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों को भी नुकसान हुआ है क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक ऊर्जा निर्यात पर निर्भर है।
पॉइन्ट्स में समझें तेल के आंकड़े
-अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, ईरान हर दिन करीब 17 लाख बैरल तेल निर्यात करता है।
-ईरान के केंद्रीय बैंक के अनुमान के मुताबिक, मार्च 2025 में खत्म हुए वित्त वर्ष में ईरान ने तेल निर्यात से लगभग 67 अरब डॉलर (करीब £50 अरब) की कमाई की जो पिछले 10 साल में सबसे ज्यादा है।
-अगर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होता है तो इसका सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ेगा।
-अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) का अनुमान है कि 2022 में इस जलडमरूमध्य से निकलने वाले करीब 82% कच्चे तेल और कंडेनसेट की आपूर्ति एशियाई देशों को होती थी।
-चीन अकेले ही ईरान के निर्यात किए गए तेल का करीब 90% खरीदता है। चीन इस तेल का इस्तेमाल करके कई उत्पाद बनाता है और उन्हें दुनिया भर में निर्यात करता है। ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने से वैश्विक स्तर पर उपभोक्ताओं के लिए सामान भी महंगे हो सकते हैं।
क्या स्ट्रेट को बंद कर सकता है ईरान?
यूनाइटेड नेशंस के नियमों के मुताबिक, कोई भी देश अपनी तटरेखा से 12 नॉटिकल मील (करीब 13.8 मील) तक के सुदद्री क्षेत्र पर नियंत्रण रख सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के सबसे संकरे हिस्से में यह जलडमरूमध्य और इसके शिपिंग मार्ग पूरी तरह ईरान और ओमान के क्षेत्रीय समुद्री जल (टेरिटोरियल वाटर्स) के भीतर आते हैं। इस वजह से यहां से गुजरने वाले जहाजों को ईरान और ओमान के समुद्री क्षेत्रों से होकर ही गुजरना पड़ता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत उन्हें इस मार्ग से गुजरने की अनुमति होती है।
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की योजना कैसे बना रहा है। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इसके लिए सबसे प्रभावी तरीका समुद्र में माइंस बिछाना हो सकता है।
ईरान की नौसेना और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की नौसेना विदेशी युद्धपोतों और व्यापारिक जहाजों पर हमले भी कर सकती है।
हालांकि बड़े सैन्य जहाज अमेरिकी हवाई हमलों के आसान लक्ष्य बन सकते हैं। वहीं डोनाल्ड ट्रंप बार-बार यह दोहरा रहे हैं कि ईरान की नौसेना पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
