भारत के वीर पराक्रमी योद्धाओं को समर्पित जनसत्ता की विशेष सीरीज ‘बांकुरे’ के दूसरे पार्ट में आपका स्वागत है। बांकुरे के पार्ट टू में हम बात करेंगे सियाचिन में पराक्रम दिखाने वाले भारतीय सेना के नायब सूबेदार (मानद कैप्टन) बाना सिंह के बारे में… बाना सिंह को सियाचिन में उनके पराक्रम के लिए 26 जनवरी 1988 को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
बाना सिंह की कहानी बताने से पहले लेकर चलते हैं आपको आज से करीब चार दशक पहले 1980 के दशक में… सियाचिन इलाके में भारतीय सेना की स्थायी तैनाती नहीं थी लेकिन इसके उलट पाकिस्तान इस इलाके में विदेशी पर्वतारोहण संस्थाओं को परमिट देखकर भेज रहा था। पर्वतारोहण अभियानों, वैज्ञानिक सर्वे के नाम पर पाकिस्तान ने चुपचाप इस इलाके को समझा और यहां के दर्रे और चोटियां चिन्हित कीं। पाकिस्तान ने यह पूरा काम बिना गोली चलाए किया।
इसी दौरान जब भारतीय सेना को पाकिस्तान के मंसूबों की जानकारी मिली तो उसने साल 1984 में ‘ऑपरेशन मेघदूत’ चलाया और सियाचिन की प्रमुख चोटियों पर नियंत्रण हासिल किया। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने भी ऊंंचाई वाले इलाकों में पोस्ट बनानी शुरू की। पाकिस्तान ने साल 1986 -1987 में 21,000 फीट की ऊंचाई (साल्टोरो रिज) पर कायद (जिन्ना के नाम पर) पोस्ट बनाई। यहां से वे बिलाफोंड ला में भारतीय पोस्टों पर नजर रख सकते थे।
इस ऊंचाई से पाकिस्तानी सैनिक भारतीय हेलिकॉप्टरों पर गोलीबारी करते थे। 18 अप्रैल 1987 को इसी पोस्ट से हुई फायरिंग में भारतीय सेना के एक जूनियर कमीशंड अधिकारी और पांच जवान शहीद हो गए। इसी हमले के बाद भारतीय सेना ने यह तय किया कि पाकिस्तान उस पोस्ट से किसी भी हालत में हटाना है।
बेहद कठिन था कायद पोस्ट तक पहुंचना
कायद पोस्ट (21,153 फीट) की ऊंचाई पर थी। यह पोस्ट 457 मीटर ऊंची बर्फ की दीवारों से घिरी हुई थी। तीन तरफ इसका झुकाव 80° से 85° था और चौथी तरफ थोड़ा कम। इस पोस्ट पर पहुंचना इसलिए और भी मुश्किल था क्योंकि ऊपर तैनात पाकिस्तानी सैनिकों की नजर से बचना बेहद मुश्किल था। इसके अलावा ऑक्सीजन की कमी की वजह से लंबी दूरी तक चलना मुश्किल था। अक्सर बर्फीले तूफान भी आते थे और इलाके तापमान -50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता था।
ऑपरेशन राजीव: तीसरे प्रयास और बाना सिंह के नेतृत्व में मिली मंजिल
पाकिस्तान की कायद पोस्ट पर कब्जा करने के लिए मई 1987 में सेकेंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे के नेतृत्व में एक छोटी टुकड़ी ने रस्सियां लगाईं। हालांकि कुछ ही समय में हमारे सैनिकों पर पाकिस्तानियों की नजर पड़ गई और उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी। इस टुकड़ी में शामिल भारतीय सेना के 13 जवानों में से नौ शहीद हो गए।
इसके बाद कायद पोस्ट पर कंट्रोल हासिल करने के ऑपरेशन को राजीव नाम दिया गया। यहां 23 जून 1987 की शाम को मेजर वरिंदर सिंह के नेृतत्व में एक प्लाटून सेकेंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे की टीम द्वारा लगाई गई रस्सियों पता करने के लिए निकली लेकिन खराब मौसम की वजह से वह एक किलोमीटर भी नहीं चल सकी। उस समय वहां कमर तक बर्फ थी। खराब मौसम और भारी बर्फबारी की वजह से इस टीम को रस्सियां नहीं मिल पाईं और उसे बेस पर लौटना पड़ा।
24 जून की रात में सूबेदार हरनाम सिंह के नेतृत्व में दस सैनिकों की टीम भेजी गई। एक अन्य टीम सूबेदार संसार चंद के नेतृत्व में इस टीम को फॉलो किया। नायब सूबेदार बाना सिंह के नेतृत्व में एक तीसरी टीम को रिजर्व फोर्स के तौर पर रखा गया था, ताकि दुश्मन की फायरिंग की वजह से पहली असॉल्ट टीम के रुकने की स्थिति में उसे तैनात किया जा सके।
50 मीटर चलते ही पाकिस्तानियों ने कर दी फायरिंग
हरनाम सिंह की टीम राजीव पांडे की टीम द्वारा लगाई गई रस्सियों को खोजने में सफल रही। भारतीय सैनिकों ने इस रस्सियों के सहारे बर्फ की दीवार पर चढ़ना भी शुरू कर दिया लेकिन वो पचास मीटर ही चल पाए होंगे की पाकिस्तानियों ने फायरिंग शुरू कर दी। इस फायरिंग में तीन सैनिक शहीद हो गए। -25 डिग्री तापमान होने की वजह से इन्हें फॉलो कर रही टीम के हथियार जाम हो गए और नहीं चल पाए। बाद में भारतीय सैनिकों को पता चलला कि पाकिस्तानी अपने हथियार कैरोसिन स्टोव चलाकर गरम कर रहे थे। कुछ वजहों के कारण ये अटैक यहीं रोक दिया गया।
25-26 जून की रात सूबेदार संसार चंद की टीम ने कायद पोस्ट पर कब्जा करने के लिए आगे बढ़ी। इस टीम को पीछे से मीडियम गन फायर और रॉकेट लॉन्चर के जरिए सपोर्ट दिया गया। पाकिस्तानियों द्वारा इस टीम पर भी फायर किया गया लेकिन संसार चंद कायद पोस्ट के काफी नजदीक पहुंच गए और चाहते थे कि अतिरिक्त सैनिक तुरंत भेजे जाएं, हालांकि उनके रेडियो सेट की बैट्री खत्म हो गई और वो अपने कमांडर से बात नहीं कर पाए। संसार चंद ने हवलदार राम दत्त को नीचे जाने के लिए कहा लेकिन राम दत्त पाकिस्तानी फायर का शिकार हो गए और पांच सौ फीट नीचे गिरकर शहीद हो गए। उनके शव कभी नहीं मिल पाया। इस बार भी प्रयास पूरा न हो सका।
मेजर वरिंदर सिंह और बाना सिंह की टीम ने किया अंतिम हमला
26 जून की सुबह तक भारत और पाकिस्तान – दोनों ही सैनिकों की सप्लाई तकरीबन खत्म हो चुकी थी। इस बार सीमित रसद और खराब मौसम को देखते हुए मेजर वरिंदर सिंह ने दिन में ही दोतरफा हमला करने का निर्णय लिया। हमले के लिए दो टुकड़ियां बनाई गईं – पहली टुकड़ी में 8 जवान थे, जिनका नेतृत्व खुद मेजर वरिंदर सिंह ने किया। दूसरी टुकड़ी में पांच जवान थे, जिनका नेतृत्व नायब सूबेदार बाना सिंह। पीछे से मिल रही आर्टिलरी सपोर्ट की मदद से मेजर वरिंदर सिंह की टुकड़ी ने नीचे से पोस्ट को घेर लिया।
दूसरी तरफ नायब सूबेदार बाना सिंह के नेतृत्व में दूसरी टुकड़ी ने दोपहर दोपहर 1:30 बजे आगे बढ़ना शुरू किया। इस राइफलमैन चुन्नी लाल, लक्ष्मण दास, ओम राज और कश्मीर चंद शामिल थे। बर्फीले तूफान और खराब दृश्यता का लाभ उठाते हुए टुकड़ी ने अप्रत्याशित और अत्यंत कठिन रास्ते से चढ़ाई की। पोस्ट की टॉप पर पहुंचकर बाना सिंह की टीम ने पाया कि वहां सिर्फ एक पाकिस्तानी बंकर है।
इसके बाद बाना सिंह ने अपना हथियार जाम हो जाने के बाद बंकर में एक ग्रेनेड फेंका और दरवाजा बंद कर दिया, जिससे बंकर में मौजूद सैनिक मारे गए। इसके बाद आमने-भारतीय सैनिक बंकर के बाहर मौजूद पाकिस्तानियों पर टूट पड़े। हमले से घबराकर कुछ पाकिस्तानी सैनिक वहां से कूद गए। इस पोस्ट पर भारतीय तिरंगा फहरा दिया।
इस अभियान के दौरान मेजर वरिंदर सिंह गंभीर रूप से घायल हुए, लेकिन उन्होंने इलाज से इनकार कर कमान संभाले रखी। उनकी वीरता के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। इस संघर्ष में सिपाही ओम राज का हाथ विस्फोट में उड़ गया और बाद में वे शहीद हो गए। 27 जून 1987 को ब्रिगेड कमांडर ब्रिगेडियर नुग्याल हेलिकॉप्टर से लॉन्च बेस पहुंचे। उन्होंने घोषणा की कि अब यह चोटी अब ‘बाना टॉप’ कहलाएगी।
सियाचिन में कायद पोस्ट पर कब्जे के ऑपरेशन को भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे साहसिक और निर्णायक कार्रवाइयों में से एक माना जाता है। यह अभियान भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस, नेतृत्व और बलिदान का प्रतीक है। यहां अदम्य साहस दिखाने के लिए 26 जनवरी 1988 को राष्ट्रपति ने बाना सिंह को परमवीर चक्र प्रदान किया। बाना सिंह अभी भी जीवित हैं और जम्मू-कश्मीर में रहते हैं।
बाना सिंह का जन्म साधारण किसान परिवार में हुआ
बाना सिंह का जन्म 6 जनवरी 1949 को जम्मू जिले के कड़याल में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। वह अपने 20वें जन्मदिन पर 6 जनवरी 1969 को भारतीय सेना के जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री (JAK LI) रेजिमेंट में भर्ती हुए। हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग स्कूल, गुलमर्ग में प्रशिक्षण के बाद अप्रैल 1987 में उन्हें सियाचिन पर भेजा गया। बाना सिंह साल 2000 में भारतीय सेना से रिटायर हुए।
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