भारतीय राजनीति के इतिहास में कई ऐसे नाम दर्ज हैं जो केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने ज्ञान, संस्कृति और समाज को भी एक नई दिशा दी। ऐसे ही एक अद्वितीय व्यक्तित्व थे – डॉक्टर संपूर्णानंद। उनके कार्यकाल में ही बनारस को वाराणसी के रूप में नई पहचान मिली। एक बार तो उन्हें चुनाव जीताने के लिए हिंदू संगठनों ने अपने प्रत्याशी के बजाय उनके पक्ष में मतदान किया।
डॉक्टर संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री (28 दिसंबर 1954 से 6 दिसंबर 1960) थे। वह संस्कृत के प्रकांड विद्वान, पत्रकार, समाजवादी विचारक और एक कुशल प्रशासक थे। उनकी जीवन यात्रा एक ऐसी कहानी है जिसमें एक तरफ शिक्षा और उच्च आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठा थी, तो दूसरी तरफ सत्ता का वह जटिल जाल, जिसमें अंततः आदर्श और राजनीति आमने-सामने आकर खड़े हो गए।
शिक्षा, स्वतंत्रता संग्राम और बहुमुखी व्यक्तित्व
1 जनवरी 1890 को बनारस (वाराणसी) में जन्मे संपूर्णानंद ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.एससी. और एल.एल.बी. की पढ़ाई पूरी की। राजनीति के चक्रव्यूह में प्रवेश करने से पहले वे एक समर्पित शिक्षक थे। उन्होंने इंदौर, बीकानेर, वृंदावन और वाराणसी के विभिन्न प्रसिद्ध संस्थानों में अध्यापन किया।
बीकानेर के डूंगर कॉलेज में तो वे प्रधानाचार्य (प्रिंसिपल) के पद पर तैनात थे, लेकिन 1921 में महात्मा गांधी के ‘असहयोग आंदोलन’ के आह्वान पर उन्होंने इस प्रतिष्ठित पद से त्यागपत्र दे दिया और देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।
वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे पत्रकार और संपादक भी रहे; उन्होंने पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा शुरू किए गए पत्र मर्यादा के साथ-साथ ‘आज’ और ‘टुडे’ का संपादन भी किया। इतना ही नहीं, उन्होंने महात्मा गांधी की पहली जीवनी भी लिखी और मोतीलाल नेहरू के सचिव के रूप में भी कार्य किया।
वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) के संस्थापक सदस्यों में से एक थे, जहां उन्होंने आचार्य नरेंद्र देव और चंद्र भानु गुप्ता जैसे नेताओं के साथ काम किया। पॉल आर. ब्रास के शब्दों में कहें तो, “संपूर्णानंद उन गिने-चुने नेताओं में थे जिन्होंने समाजवाद को हिंदू पुनरुत्थानवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ बेहतरीन तरीके से जोड़ा।”
सत्ता का सफर और ऐतिहासिक निर्णय
जब गोविंद बल्लभ पंत को 1955 में केंद्र में गृह मंत्री का दायित्व सौंपा गया, तब उत्तर प्रदेश की कमान डॉ. संपूर्णानंद को सौंपी गई। मुख्यमंत्री बनने से पहले ही वे गोविंद बल्लभ पंत सरकार में शिक्षा, वित्त, गृह और श्रम जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके थे। उनके कार्यकाल के दौरान उत्तर प्रदेश ने कई अभूतपूर्व और दूरगामी फैसले देखे:
1) बनारस से ‘वाराणसी’ का नामकरण: ऐतिहासिक शहर ‘बनारस’ का नाम आधिकारिक तौर पर बदलकर ‘वाराणसी’ करने का निर्णय उन्हीं के शासनकाल में 24 मई 1956 को लागू हुआ।
2) संस्थागत क्रांति: शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके योगदान अविस्मरणीय हैं। वाराणसी के गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज को अपग्रेड करके ‘वाराणसेया संस्कृत विश्वविद्यालय’ (अब संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय) बनाया गया। भारत का पहला कृषि विश्वविद्यालय – ‘उत्तर प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय’ (अब गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर) – उन्हीं के कार्यकाल में 17 नवंबर 1960 को स्थापित हुआ। इसके अलावा गोरखपुर विश्वविद्यालय, कानपुर का मेडिकल कॉलेज और लखनऊ का देश का पहला सैनिक स्कूल (कप्तान मनोज कुमार पांडे सैनिक स्कूल) उन्हीं के प्रयासों की देन थे।
3) खुली जेल (Open Prison Camps) का प्रयोग: गृह मंत्री और मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जेल सुधारों पर अभूतपूर्व काम किया। खुली जेलों की अवधारणा उन्होंने ही शुरू की, जिसे बाद में जब वे राजस्थान के राज्यपाल बने, तो वहाँ भी लागू किया गया।
4) गौ-संरक्षण और सामाजिक नीतियां: उनकी सरकार ने उत्तर प्रदेश में गोकशी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का विधेयक पारित किया, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने आंशिक संशोधनों के साथ संवैधानिक रूप से वैध माना।
राजनीतिक षड्यंत्र, गुटबाजी और आत्मसम्मान की परीक्षा
डॉक्टर संपूर्णानंद जितने श्रेष्ठ विद्वान और दूरदर्शी प्रशासक थे, राजनीति के कूटनीतिक चालों में वे उतने ही अनभिज्ञ साबित हुए। 1957 में वे बनारस सिटी साउथ विधानसभा सीट से दूसरी बार विधायक चुने गए। दिलचस्प बात यह थी कि वामपंथी उम्मीदवार रुस्तम सैटिन को हराने के लिए हिंदू राष्ट्रवादी समूहों और जनसंघ के मतदाताओं ने रणनीतिक रूप से डॉक्टर संपूर्णानंद के पक्ष में मतदान किया था।
लेकिन असली चुनौती उन्हें विपक्ष से ज्यादा अपनी ही पार्टी के भीतर से मिली। 1957 के बाद से ही कांग्रेस के भीतर भयानक गुटबाजी शुरू हो गई। चंद्र भानु गुप्ता, चौधरी चरण सिंह और कमलापति त्रिपाठी जैसे कद्दावर नेता उनके खिलाफ खड़े होने लगे।
विधानसभा में विपक्ष के नेता राज नारायण और त्रिलोकी सिंह लगातार हमले बोल रहे थे। 1957 से 1959 के बीच उनकी सरकार ने लगातार तीन अविश्वास प्रस्तावों का सामना किया। हालांकि हर बार वे बहुमत साबित करने में सफल रहे, लेकिन अगस्त 1959 में तीसरे अविश्वास प्रस्ताव के दौरान एक अभूतपूर्व घटना घटी। कांग्रेस के ही आचार्य जुगल किशोर के नेतृत्व में 98 असंतुष्ट कांग्रेस विधायकों (जिनमें चौधरी चरण सिंह भी शामिल थे) ने अपनी ही सरकार के खिलाफ पत्र लिखकर कुशासन, भ्रष्टाचार और गुटबाजी का आरोप लगाया।
एक रणनीतिक चूक और मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र
गंभीर मतभेदों और राजनीतिक दबावों के बीच डॉक्टर संपूर्णानंद ने एक ऐसी राजनीतिक भूल कर दी जो किसी मंजे हुए राजनेता से अपेक्षित नहीं थी। वे मान चुके थे कि उनके खिलाफ पनप रहे असंतोष के पीछे चंद्र भानु गुप्ता का हाथ है।
अक्टूबर 1960 में जब उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद का चुनाव आया, तो डॉक्टर संपूर्णानंद ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया। उन्होंने ऐलान कर दिया कि अगर सीबी गुप्ता अध्यक्ष पद का चुनाव जीतते हैं, तो वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने अपने वफादार उम्मीदवार मुनीश्वर दत्त उपाध्याय को मैदान में उतारा।
4 अक्टूबर 1960 को हुए इस चुनाव में सीबी गुप्ता ने 630 मतों के भारी अंतर से जीत दर्ज की। डॉ. संपूर्णानंद अपनी ही शर्त में उलझ गए। हालांकि यूपी कांग्रेस के ज्यादातर कांग्रेस विधायक अभी भी उनके साथ थे, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप और सलाह के बाद डॉक्टर संपूर्णानंद ने 26 नवंबर 1960 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 7 दिसंबर 1960 को चंद्र भानु गुप्ता उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
अंतिम अध्याय: राज्यपाल का कार्यकाल और विरासत
मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद उन्होंने चुनावी राजनीति से पूरी तरह से दूरी बना ली। अप्रैल 1962 में उन्हें राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त किया गया, जहां वे अप्रैल 1967 तक रहे। 1961 में केंद्र सरकार ने उनकी अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय भावनात्मक एकीकरण समिति’ बनाई, जिसने भारतीय शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं और अंग्रेजी के संतुलन पर कई महत्वपूर्ण सिफारिशें दीं।
राजनीति की अंतहीन दौड़ से निराश होकर अगस्त 1963 में उन्होंने एक लेख में व्यथा व्यक्त करते हुए लिखा था – “भारतीय नागरिक के पास कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं बची है। उनके सभी सपने केवल स्वयं तक सीमित हो गए हैं… शायद हमारे नेताओं को लगता है कि महात्मा गांधी के साथ ही आदर्शवाद का युग समाप्त हो गया।”
10 जनवरी 1969 को वाराणसी में इस महान विद्वान और राजनेता ने अंतिम सांस ली। उनके निधन पर उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी चंद्र भानु गुप्ता ने भी स्वीकार किया था कि डॉक्टर संपूर्णानंद भारतीय संस्कृति के संवाहक और समाज में प्रगतिशील विचारों को लाने वाले अग्रदूत थे।
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