जनसत्ता की विशेष सीरीज रणबांकुरे के तीसरे एपिसोड में आपका स्वागत है। इस एपिसोड में हम बात करेंगे परम वीर चक्र विजेता ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव के बारे में… 18 गेनेडियर्स के जवान योगेंद्र सिंह यादव को कारगिल युद्ध में उनकी वीरता के लिए परम वीर चक्र से नवाजा गया। साल 2021 में 75वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सूबेदार मेजर (ऑनरेरी लेफ्टिनेंट) योगेंद्र सिंह यादव को राष्ट्रपति ने ऑनरेरी कैप्टन का रैंक दिया।

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले योगेंद्र सिंह यादव जब 12वीं क्लास में थे, तभी आर्मी में उनका चयन हो गया था। योगेंद्र यादव के बड़े भाई भी सेना में थे। ट्रेनिंग के बाद उन्हें ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट में भेज दिया गया और उनकी पहली पोस्टिंग कश्मीर घाटी में हुई। नौकरी के महज ढाई साल बाद ही उन्होंने कारगिल युद्ध में अपनी वीरता का प्रदर्शन किया।

एक वीडियो इंटरव्यू में योगेंद्र यादव ने बताया था कि साल 1999 में देश में सब कुछ सामान्य था, वह दो महीने के लिए छुट्टी आए थे, तभी उनकी शादी फिक्स हो गई। उन्होंने बताया कि शादी के बाद जब वो जम्मू पहुंचे तो उन्हें समझ पता चला कि उनकी बटालियन को कश्मीर से द्रास भेज दिया गया है। द्रास पहुंच कर पता चला कि तोलोलिंग पहाड़ी पर लड़ाई चल रही है।

योगेंद्र यादव ने उस समय लगातार 22 दिनों तक तोलोलिंग पर लड़ाई लड़ रहे जवानों को रसद पहुंचाया। वे बताते हैं कि वह और उनके साथ रात में चढ़ाई शुरू करते थे और अगले दिन पहुंचते थे। इस टॉस्क ने उन्हें और उनके कुछ साथियों को विशेष पहचान दिलाई। इसके बाद उन्हें एक अलग खास टुकड़ी – ‘घातक प्लाटून‘ में शिफ्ट किया गया।

16,500 फीट ऊंचा है टाइगर हिल

इसी टुकड़ी को 16,500 फीट ऊंची टाइगर हिल पहाड़ी पर चढ़ने का निर्देश दिया गया। घातक प्लाटून और उसके साथ एक अन्य टीम ने खड़ी चढ़ाई से टाइगर हिल पर आगे बढ़ना शुरू किया। दो रात और एक दिन चलने के बाद उनका दुश्मन से सामना हुआ। वो बताते हैं कि टाइगर हिल पर जबरदस्त गोलीबारी हुई। हालात ऐसे भी बने कि एक कदम आगे रखने पर भी मौत थी, और पीछे रखने पर भी मौत थी।

योगेंद्र बताते हैं कि ऐसे हालातों में सभी ने कहा कि ‘मरने से पहले जितनों को मार सकते हैं, मारेंगे’। उन्होंने बताया कि एक मौका ऐसा आया, जब उनका गोला-बारूद लगभग खत्म हो गया, तब पत्थरों के पीछे छिपते हुए उन्होंने फायरिंग बंद कर दी। काफी देर तक जब फायरिंग नहीं हुई तो पाकिस्तान के 15-20 जवान चेक करने आए। इनके नजदीक पहुंचते ही भारतीय जवानों ने एक-साथ फायरिंग कर तकरीबन सभी को मार दिया।

इसके बाद पहाड़ी पर ऊपर मौजूद पाकिस्तान के जवानों ने एक साथ फायरिंग शुरू कर दी। योगेंद्र यादव ने बताया कि पाकिस्तानियों ने इतनी घातक फायरिंग की कि वहां मौजूद सात-आठ भारतीय जवान जहां बैठे थे, वहां से सिर नहीं उठा सकते थे, जिसने सिर उठाया उसका सिर चला गया। काफी देर बाद पाकिस्तानियों ने फायरिंग रोक कर पत्थर और ग्रेनेड फेंकने शुरू कर दिए, धीरे-धीरे ‘धार्मिक नारेबाजी’ कर नजदीक आने लगे लेकिन भारतीय जवानों ने फिर भी फायरिंग शुरू नहीं की क्योंकि ऐसा करने पर पाकिस्तानियों को भारतीय जवानों की लोकेशन पता चल जाती और वो दूर से ही अपना काम खत्म कर देते।

योगेंद्र बताते हैं कि वो पहाड़ी पर जिस पत्थर के नीचे थे, उसके ऊपर पाकिस्तान के सात-आठ जवान खड़े थे। पाकिस्तानियों ने यहां ग्रेनेड फेंका तो उनका एक साथी घायल हो गया लेकिन उसने नीचे जाने से मना कर दिया। योगेंद्र कहते हैं कि उनके एक-एक साथी उनसे जुदा हो रहे थे। वो भी घायल हो गए। इसी दौरान पाकिस्तानियों ने उन्हें घेर लिया, पाकिस्तानियों को लगा कि सब मारे जा चुके हैं। उन्होंने एक-एक जवानों को गोली मारी, जब वो गोली मार रहे थे, तब भारतीय जवानों के शव उछल रहे थे। पाकिस्तानियों ने योगेंद्र को भी तीन गोलियां मारीं।

पांच के सिक्कों ने बचाई योगेंद्र सिंह यादव की जान?

योगेंद्र ने इंटरव्यू में आगे बताया कि वो चुपचाप पड़े थे। वो कहते हैं कि जब पाकिस्तानी जा रहे थे, तब उनके कमांडर ने अपने बेस को मैसेज दिया कि नीचे भारत की MMG पोस्ट है, उसपर हमला कर दो। योगेंद्र ने बताया, “तब ईश्वर से प्रार्थना कि इतनी देर जिंदा रख दे कि मैं अपने साथियों को सूचना दे सकूं।”

उन्होंने बताया कि पाकिस्तानियों ने उन्हें कई गोलियां मारीं, सीने में भी गोली मारी। उस समय उनके पर्स में रखे, पांच-पांच के सिक्कों की वजह से शायद वो बच गए। हालांकि तब वो कहते हैं कि एक पल के लिए लगा कि वो मर गए हैं, लेकिन जब पाकिस्तान के जवान का पैर उनके पैर से टकराया तो लगा कि जिंदा हैं।

इंटरव्यू में उन्होंने आगे बताया कि पाकिस्तानी उनके हथियार लेकर जा रहे थे लेकिन उनके पास एक हैंड ग्रेनेड बचा था। उन्होंने यही ग्रेनेड पाकिस्तानियों की तरफ फेंका, ग्रेनेड फटते ही पाकिस्तान के एक जवान का सिर उड़ गया और बाकी जवानों में खलबली मच गई। पाकिस्तानियों को लगा कि नीचे से भारत की फौज आ गई।

इसी दौरान उन्होंने एक हाथ से पाकिस्तानी जवान की राइफल उठाई और फायरिंग की। उनके तीन-चार बंद मारे गए। योगेंद्र ने इस दौरान तीन-चार जगहों से फायरिंग की तो पाकिस्तानियों को पूरा विश्वास हो गया कि नीचे से भारत की अतिरिक्त फौज आ गई है और वो वहां से भाग गए। उन्होंने बताया कि वहां पाकिस्तानियों ने खाने-पीने और हथियारों का पूरा इंतजाम किया हुआ था।

शहीद साथियों के देखकर देर तक रोते रहे

इसके बाद योगेंद्र ने अपने साथियों को देखा, वो सभी शहीद हो चुके थे। योगेंद्र यादव का एक हाथ लटक गया था, जो बहुत दर्द कर रहा था, जिसे उन्होंने तोड़ने की कोशिश की लेकिन वो टूटा नहीं तो उन्होंने अपना हाथ बेल्ट से कमर में बांंध लिया। इसके बाद वहां बह रहे एक नाले में वो कूद गए। यहां से वह एक गड्डे में पहुंच गए, जहां से उन्हें अपने साथी नजर आए। योगेंद्र ने आवाज मारकर उन्हें बुलाया। उस समय दिन के एक-डेढ़ बचे का समय था। सीओ के पास पहुंचते-पहुंचते बहुत देर हो चुकी थी। थोड़ा होश आने पर उन्हें अपने अधिकारी को ऊपर के हालात की जानकारी दी और पाकिस्तानियों की रणनीति बताई।

राष्ट्रीय समर स्मारक पर दी गई जानकारी के अनुसार, जिस प्लाटून का योगेंद्र सिंह यादव हिस्सा थे, उसने 03- जुलाई 1999 को दुश्मन की भारी गोलाबारी के बीच चढ़ाई की और वहांं मौजूद बंकर को ध्वस्त कर दिया। इससे उनकी प्लाटून खड़ी चट्टान पर चढ़ने में कामयाब हो गई।

इस दौरान कई गोलियां लगने के बाद भी उन्होंने तुलनीय ताकत का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने दूसरे बंकर पर हमला कर उसे भी ध्वस्त कर दिया और तीन पाकिस्तानी सैनिकों को मार डाला। अदम्य साहस और सर्वोच्च कोटि के शौर्य का प्रदर्शन करने के लिए ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव को परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

भारत रक्षक डॉट कॉम पर दी गई जानकारी के अनुसार, योगेंद्र सिंह यादव और उनके साथियों ने टाइगर हिल पर आधी चढ़ाई ही की थी कि दुश्मन ने मशीन गन और रॉकेट से हमला कर दिया। इसमें घातक प्लाटून के कमांडर और दो अन्य साथी शहीद हो गए। हालात को देखते हुए योगेंद्र यादव ने गोलियों की बौछार के बीच चढ़ाई जारी रखी और वे अकेले ही लगभग टॉप पर पहुंच गए। यहां वे रेंगते हुए दुश्मन के बंकर तक पहुंचे और ग्रेनेड फेंककर चार पाकिस्तानियों को मार गिराया। इससे उनकी टीम को चट्टान पर चढ़ने में मदद मिली। पूरे अभियान के दौरान उन्होंने दो बंकरों को नष्ट कर दिया।

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खराब मौसम का फायदा उठाकर पाकिस्तानी जदुनाथ सिंह की पोस्ट के पास पहुंच गए। जदुनाथ सिंह के सभी साथी शहीद हो चुके थे लेकिन फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और इस तरह से लड़ाई लड़ी की पाकिस्तानी भागने के लिए मजबूर हो गए। पूरी कहानी जानने के लिए क्लिक करें।