देश की राजनीति में इन दिनों सिर्फ चुनावी नतीजों की नहीं, बल्कि उनके बाद होने वाली अंदरूनी हलचलों की भी खूब चर्चा है। कहीं ईडी की कार्रवाई का असर चुनावी रणनीतियों पर दिख रहा है, तो कहीं मंत्रिमंडल विस्तार और चुनावी हार ने नेताओं की राजनीतिक स्थिति बदल दी है। राज्यों की राजनीति में सत्ता, संगठन और रणनीति के बीच चल रही उठापटक कई नए संकेत दे रही है।

डर का असर!

पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की हार के तुरंत बाद अखिलेश यादव ने आई-पैक से अपना अनुबंध खत्म करने का एलान कर दिया। आई-पैक के संस्थापक प्रशांत किशोर हैं। यह कंपनी चुनावी रणनीति बनाने और प्रबंधन का काम करती है। पीके के नाम से प्रसिद्ध प्रशांत किशोर ने पहली बार 2012 में गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए काम किया था। फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत का शिल्पकार भी उन्हें ही माना गया। उसके बाद तो उन्हें विभिन्न राज्यों में विभिन्न पार्टियों ने काम दिया। दो साल पहले पीके ने अपनी पार्टी बनाकर बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ा तो आई-पैक से नाता तोड़ लिया। अब विनेश चंदेल, प्रतीक जैन और ऋषिराज सिंह आदि हैं आई-पैक के स्वामी। बंगाल में विधानसभा चुनाव के दौरान ईडी ने आई-पैक के दफ्तर पर छापेमारी की तो ममता बनर्जी ईडी की टीम से उलझ गई थीं। इस कारण विवाद भी बढ़ा था। आई-पैक के विनेश चंदेल को ईडी ने गिरफ्तार भी किया था। अखिलेश को लगा कि अगर 2027 में आई-पैक उनका चुनाव प्रबंधन करेगी और ईडी ने उसे तंग किया तो चुनाव प्रबंधन पर खराब असर पड़ सकता है। करार तोड़ने का कारण अखिलेश ने पार्टी के पास पैसे की तंगी होना बताया है, पर जानकार कह रहे हैं कि ईडी के डर से उन्होंने यह कदम उठाया है।

गुम नाम

सम्राट चौधरी ने गुरुवार को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तो हर किसी को यह देखकर हैरानी हुई कि उसमें मंगल पांडेय का नाम नहीं था। जबकि वे न केवल बिहार प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहे हैं बल्कि बिहार की भाजपा गठबंधन वाली हर सरकार में मंत्री रहे हैं। भाजपा कोटे से मंत्री बनने वाले संभावित नेताओं में उनका नाम पक्का माना जा रहा था। पार्टी आलाकमान के भरोसेमंद भी रहे हैं। पश्चिम बंगाल के प्रभारी वही थे जहां पार्टी ने नया इतिहास रचा है। हो सकता है कि जीत का ज्यादा श्रेय सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव को मिले पर सूबे के प्रभारी तो पांडेय ही थे। ब्राह्मण चेहरे के तौर पर उनकी जगह मिथिलेश तिवारी को मंत्रिपद दिया गया है। अब कहा जा रहा है कि मंगल पांडेय को नितिन नवीन की टीम में महासचिव या उपाध्यक्ष जैसा पद देकर संगठन में उनका उपयोग करेगी पार्टी।

चर्चा में आ गई रायशुमारी

पांच राज्यों के चुनाव के बाद राजनीतिक दल सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं। ऐसी प्रक्रिया एक बड़े दल की ओर से केरलम में भी शुरू की गई है। लोकतांत्रिक तरीका अपनाते हुए पार्टी ने इसके लिए रायशुमारी की। रायशुमारी का नतीजा आलाकमान तक आता, इससे पहले ही रूझान मीडिया के बीच पहुंच गए। आलाकमान के लिए तो यह असहज करने वाली स्थिति हो गई।कहा जा रहा है कि इस काम का जिम्मा दो बड़े नेताओं के पास था। अब सवाल यह है कि रायशुमारी की जानकारी जानबूझकर लीक हुईं या फिर गलती थी। हालांकि, एक नेता जी ने पहले ही सार्वजनिक हुए आंकड़े को फर्जी करार दिया है। फिर भी रायशुमारी तो चर्चा में आ ही गई।

मंत्री चुनाव हारे

केंद्रीय मंत्री का कद और पद छोटा नहीं होता पर भाजपा उन्हें विधानसभा चुनाव में उतारती रही है। वे हार भी जाते हैं। इस बार भी भाजपा ने अपने दो केंद्रीय मंत्रियों को विधानसभा चुनाव लड़ाया। दोनों राज्यसभा के सदस्य हैं। अपने नहीं, दूसरे राज्यों से। एल मुरुगन को तमिलनाडु से और जार्ज कुरियन को केरलम से विधानसभा चुनाव लड़ाया। दोनों अपनी सीटों से चुनाव हार गए। तमिलनाडु में पिछली बार भाजपा 20 सीटों पर लड़ी थी और चार सीटें जीत ली थी। इस बार उसने 27 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सीट एक ही आ पाई उसके खाते में। केरलम में उल्टा हुआ। पिछली बार विधानसभा चुनाव में उसका खाता भी नहीं खुला था, लेकिन इस बार उसने तीन सीटें जीत लीं। तमिलनाडु में तो पूर्व राज्यपाल तमिलिसाई सुंदरराजन भी इस बार विधानसभा चुनाव हार गईं। याद दिलाना जरूरी है कि मध्य प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को बंपर सफलता मिली थी, पर उसके केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते चुनाव हार गए थे। इसी तरह पश्चिम बंगाल में केंद्रीय मंत्री निशीथ प्रमाणिक को विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा था। रही भाजपा की बात तो उसके अपने तर्क हैं। उसका कहना है कि कभी उसे उत्तर भारत के कुछ राज्यों की पार्टी माना जाता था पर आज उसका प्रभाव उत्तर से दक्षिण तक सारे भारत में है। चुनाव की हार से डरने लगते तो पार्टी का इतना प्रभाव हो ही नहीं पाता।

सिद्धरमैया को राहत

असम में कांग्रेस का प्रदर्शन इस बार पहले से भी ज्यादा खराब रहा। इसका पार्टी को भले नुकसान हुआ हो पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को लाभ हुआ है। मुख्यमंत्री की उनकी कुर्सी पर मंडराता खतरा फिलहाल टल गया है। वजह है, उनके प्रतिद्वंद्वी और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का असम का प्रभारी होना। शिवकुमार को भी माना जाएगा असम के खराब प्रदर्शन के लिए जवाबदेह। असम में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करती तो शिवकुमार आलाकमान पर नेतृत्व परिवर्तन के लिए दबाव बनाते। डीके खेमे का कहना है कि कर्नाटक में जब सरकार बनी थी तो आलाकमान ने सिद्धरमैया और डीके के बीच ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री रहने का अघोषित फामूर्ला माना था। सिद्धरमैया ने एक और मोर्चे पर भी इम्तिहान पास किया है। राज्य की जिन दो सीटों के लिए उपचुनाव हुआ था दोनों कांग्रेस ने जीती हैं। हालांकि ये दोनों सीटें कांग्रेस की ही थीं। पर एक भी सीट पार्टी के कब्जे से निकल जाती तो हार का ठीकरा सिद्धरमैया के सिर ही फूट जाता और उनकी कुर्सी खतरे में पड़ सकती थी।