शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि शास्त्र के मुताबिक जो गोभक्त होता है, वही हिंदू होता है। वे उत्तर प्रदेश और केंद्र की सरकार से कहते हैं कि उन्होंने गोभक्ति दिखाई है तो अब वे भी अपने हिंदू होने का कर्तव्य निभाएं। अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि उन्हें योगी आदित्यनाथ से बहुत उम्मीदें हैं। योगी मुख्यमंत्री होने के साथ गोरक्षपीठ के महंत भी हैं, इसलिए उन्हें गोमाता को राज्य-माता का दर्जा दिलवाने के मौके से चूकना नहीं चाहिए। कांग्रेसपरस्त होने के आरोप पर उन्होंने कहा कि जब हम भाजपा के साथ नहीं जा पा रहे हैं तो किसी और राजनीतिक दल के साथ कैसे जा पाएंगे? शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज की बातचीत के चुनिंदा अंश।

जनसत्ता प्रश्नकाल आपके साथ ऐसे समय में बातचीत कर रहा है, जिसे अप्रिय की संज्ञा दी जा सकती है। पिछले दिनों सनातन बनाम सत्ता को लेकर जो दो ध्रुवीय संघर्ष हो रहा है, आप उसकी क्या वजह मानते हैं?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: हम गोमाता के लिए आवाज उठा रहे हैं। गोमाता के लिए आवाज उठाना सरकारों को पसंद नहीं रहा है। चाहे पिछली सरकार हो या अभी की सरकार हो। सरकार चाहती है कि इस मुद्दे पर आवाज नहीं निकालो। मैं और उग्रता से आवाज उठा रहा हूं। सरकार को लगता है कि इन्हें परेशान करेंगे तो ये बोलना छोड़ देंगे। सरकार के मंसूबे पूरे नहीं होंगे। एकै साधे सब सधै वाली नीति अपना रहे हैं। अगर शीर्ष को साध लो तो बाकी छोटे-बड़े खुद ही सध जाएंगे। 1966 में इंदिरा गांधी की सरकार ने गोभक्तों के ऊपर गोली चलाई थी। उस अत्याचार के साठ साल हो गए हैं। साठ साल में मामला इतना आगे बढ़ गया। साठ साल के बाद हमने हिम्मत की है। ये चाहते हैं कि अगले साठ साल तक कोई और न बोले। यही है इस संघर्ष की मूल बात।

इसे विरोधाभास ही कहेंगे कि इस समय जो देश की सरकार है उसे हिंदुत्व और हिंदुओं के हितों की रक्षा करने वाली माना जाता है। इस तरह की धारणा वाली सरकार के साथ ऐसा टकराव क्यों हो गया?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: धारणा अलग चीज होती है, हकीकत अलग। धारणा में हिंदू हितों की बात होती है। हकीकत यह है कि गोमांस का निर्यात बढ़ गया है। गायों की संख्या निरंतर घटती जा रही है। रोज ट्रकों में गायों की तस्करी पकड़ी जा रही है। हर तहसील में ऐसे दो-चार ट्रक रोज पकड़े जा रहे हैं। ये परिस्थितियां भी तो इसी सरकार में हैं।

इस तरह के टकराव पैदा करने के पीछे मंशा क्या हो सकती है?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: उनका मकसद था थोड़ा अपमान करना, थोड़ा हतोत्साहित करना, थोड़ा नीचा दिखाना।

ये टकराव इसलिए तो नहीं कि आपने राम मंदिर पर सवाल उठाए थे?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: इस टकराव का उससे सीधा संबंध तो नहीं है, लेकिन वहां से शुरुआत देखी जा सकती है। टकराव सिर्फ गोमाता को लेकर है। इन्हें लगता है कि अगर ये चुप नहीं हुए तो जनता भी हमसे सवाल करने लगेगी।

क्या आप राम मंदिर जाएंगे?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: जहां धर्मशास्त्र के अनुसार काम नहीं हो रहा है, वहां भला मैं कैसे जा सकता हूं।

सरकार ने तो शंकराचार्य की पदवी पर भी सवाल उठा दिया है?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: हमने तो चौबीस घंटे में जवाब दे दिया। हमारे जवाब देने के बाद तो वे अभी तक कुछ नहीं बोल पाए।

शंकराचार्य की पदवी पर नोटिस और आपके जवाब के बाद उनकी तरफ से और कोई कदम तो नहीं उठाए गए हैं?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: जिस तेवर में उन्होंने सवाल उठाया था अगर हम सही जवाब नहीं दे पाते तो चौबीस घंटे के भीतर हमारे ऊपर कार्रवाई शुरू हो जाती।

उस प्रक्रिया के बारे में बताएं जिसे लेकर सवाल उठाए गए।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: इस प्रक्रिया को मैं बहुत सरल तरीके से समझाता हूं। समझिए कि जैसे सुप्रीम कोर्ट की कालिजियम व्यवस्था है। सुप्रीम कोर्ट के पीठासीन जज आपस में मिल कर अगले जज को नियुक्त कर लेते हैं। उसी तरह से हमारे यहां कोई सीट खाली होती है तो, तीन शंकराचार्य मिल कर अगले का निर्णय कर लेते हैं। अगर कोई पीठासीन गुरु निर्णय करके गया है तो उसी पर विचार हो जाता है। अगर पीठासीन गुरु किसी का नाम सुझा कर नहीं गया है, तो फिर वे लोग आपस में मिल-बैठ कर किसी का नाम तय कर लेते हैं और उनका अभिषेक कर देते हैं। हमारे यहां गुरु जी ने मेरा नाम सुझाया था। शृंगेरी के शंकराचार्य को कह दिया था कि इनका अभिषेक कर दिया जाए। हमारे बीच बातचीत थी ही। द्वारका के शंकराचार्य जी ने हमारा समर्थन कर दिया। तीन में से दो का समर्थन हो गया। तीसरे जो पुरी के शंकाराचार्य थे, उनके पास समर्थन लेने के लिए नहीं गए। क्योंकि उस समय उनके शिष्यों के फेसबुक पर हमारे विपक्ष में बातें उठाई जा रही थीं। हमें लगा कि उनके शिष्य गुरु जी से पूछ कर ही ऐसा कर रहे होंगे। इसलिए हम गए ही नहीं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दिया है, उसमें कहा है कि हमसे समर्थन मांगा ही नहीं गया, इसलिए देने का प्रश्न ही नहीं उठता है। बाद में उन लोगों ने मुझे बताया कि मेरे खिलाफ अभियान चलाने वाले सभी फर्जी पहचान के थे। सोशल मीडिया पर उनके खाते फर्जी थे। खैर, अब तो समय बीत गया। अब यही इतिहास रहेगा कि हमारा चयन दो-एक से हुआ था।

उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री खुद ही भगवाधारी हैं। गोसेवा करते हुए उनकी तस्वीरें पूरी दुनिया देखती है। फिर गोमाता को राज्य-माता या राष्ट्र माता का दर्जा देने में क्या समस्या है?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: यह तो उन्हीं से पूछा जाना चाहिए कि कहां समस्या है। हालांकि आप जब विदेश जाएंगे तो देखेंगे कि वहां भी गाय की सेवा होती है। लेकिन विदेश में गाय की सेवा तभी तक होती है, जब तक वो दूध देती है। गाय भोजन देना बंद करती है तो वे गाय को अपना भोजन बना लेते हैं। कोई गोसेवा करता है, इतने मात्र से यह नहीं कहा जा सकता कि वह गोहत्या नहीं करेगा। कोई गोसेवा करता है, लेकिन उसी के राज्य में गोमांस का इतने बड़े पैमाने पर निर्यात हो रहा है। यह पूरे देश का आधा, यानी पचास फीसद है। कहा जाता है कि सब भैंस के मांस का निर्यात हो रहा है। जब खेप पकड़ी जाती है तो प्रयोगशाला में जांच के बाद उसके गोमांस होने की पुष्टि होती है। जब योगी जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो साढ़े तीन करोड़ गायें थीं। आज भी साढ़े तीन करोड़ हैं। पूरे देश में गाय ज्यादा है, उत्तर प्रदेश में भैंस ज्यादा है। ऐसा कैसे हो गया?ये सभी आंकड़े, ये असंतुलन चीख-पुकार कर कह रहे हैं कि कहा कुछ जा रहा है, हो कुछ रहा है।

उत्तराखंड में तीर्थों को लेकर आपकी मांगों को वहां की सरकार ने तो मान लिया।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: इसके लिए हमने उन्हें आशीर्वाद भी दिया।

अगर योगी आदित्यनाथ आपकी बात मान लेते हैं तो क्या आप सभी कड़वाहट भुला देंगे?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: बिल्कुल भुला देंगे।

जिस विचारधारा की उत्तर प्रदेश में सरकार है, दिल्ली में भी उसी की सत्ता है। क्या आपने अपनी बातें केंद्र सरकार तक पहुंचाई?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: बिल्कुल पहुंचाई। आगे भी पहुंचाएंगे। योगी आदित्यनाथ से हमारी उम्मीदें ज्यादा हैं।

सरकार नहीं मानती है तो आपका अगला कदम क्या होगा?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: अगला कदम चालीस दिनों के बाद तय होगा।

इन दिनों धर्म और राजनीति का घालमेल है। जो धर्म के नाम पर सत्ता में आते हैं, वे भी धर्म के खिलाफ खड़े हो उठते हैं। आप धर्म और राजनीति में क्या फर्क देखते हैं?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: धर्म और राजनीति दोनों का लक्ष्य एक है-लोक कल्याण। लेकिन दोनों का तरीका अलग है। राजनीति कहती है कि पहले हमें सत्ता दो, फिर लोक-कल्याण करेंगे। धर्म कहता है कि भगवान ने जो कुछ दिया है उसी से लोक कल्याण के मार्ग पर चलेंगे। धर्म ने अपनी तपस्या से समाज का विश्वास हासिल किया है।

आपकी छवि मुखर संत की है। पहले आरोप लगते थे कि आपका झुकाव कांग्रेस की तरफ है। लेकिन पिछले दिनों आपने राहुल गांधी पर हमला करते हुए कहा कि हिंदू धर्म से उनका निष्कासन कर दिया जाए।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: मेरा कांग्रेस की तरफ कोई झुकाव नहीं है। भाजपा या किसी भी राजनीतिक दल की तरफ मेरा झुकाव नहीं है। सभी राजनीतिक दल धर्म को हानि ही पहुंचा रहे हैं। जब भाजपा ही धर्म को हानि पहुंचा रही है तो किसी और राजनीतिक दल का क्या ही कहा जाए। भाजपा को जब हम स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं तो किसी और दल को क्या स्वीकार कर पाएंगे। जहां तक राहुल गांधी की बात है तो, अगर उन्होंने किसी पत्रकार के सवाल पर इस तरह का वक्तव्य दिया होता तो हम चुप रहते। लेकिन उन्होंने विपक्ष के नेता के रूप में संसद में खड़े होकर मनुस्मृति का अपमान किया। यह रिकार्ड पर आ गया है। मनुस्मृति हिंदुओं का परम धर्म ग्रंथ है। उससे बढ़ कर दूसरा कोई धर्मग्रंथ नहीं है। भारत का संविधान दस-बारह देशों के संविधान की नकल कर बनाया गया है। उन 12 देशों से जब पूछा गया था कि आप लोगों ने संविधान कैसे बनाया, तो उनका कहना था कि हमने मनुस्मृति से प्रेरणा ली थी। जो मनुस्मृति पूरे विश्व के संविधानों को प्रेरणा देने वाली पुस्तक है, उसके बारे में गलतबयानी करेंगे तो उन्हें जवाबदेह होना पड़ेगा। हमने नोटिस देकर उनसे जवाब मांगा। तीन बार ध्यान दिलाने पर कोई जवाब नहीं दिया तो चौथी बार धर्म बहिष्कृत घोषित किया। यह बिल्कुल सही कदम था।

अभी तो कांग्रेस के लोग आपका सबसे ज्यादा समर्थन कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी आपके धार्मिक अधिकारों की वकालत कर रहे हैं।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: ये लोग मेरे साथ नहीं खड़े हैं। ये सब सिर्फ अपनी राजनीति चमका रहे हैं। लेकिन अपनी राजनीति चमकाने के लिए भी कोई किसी पीड़ित के साथ खड़ा हो जाता है, तो हम उसे गलत नहीं कह सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा क्यों आकर नहीं खड़ी हो रही है? जब संन्यासी को मारा गया तो क्यों नहीं भाजपा विरोध में आई?

उनका कहना है कि एक व्यवस्था बनी थी कि पालकी नहीं जाएगी और आप स्नान क्षेत्र में पालकी से ही जाना चाहते थे।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: ठीक है पालकी नहीं जाएगी। लेकिन किसी बटुक, किसी वृद्ध को हिरासत में लेने के बाद आप सबको एक-एक करके क्यों मारते हैं? भीड़ में मारा जाता तो भीड़ पर आरोप लगता। लेकिन हिरासत में पिटाई?

सनातन की सरकार बनाम सनातन के प्रतीक। इस टकराव की व्याख्या आप कैसे करेंगे?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: इसका मतलब यही है कि इसमें से कोई गैर-सनातन है। या तो हम गैर सनातन हैं या वे। अब इसी की परीक्षा और पहचान होनी है। शास्त्र कहता है, जो गोभक्त होता है, वही हिंदू होता है। हमने अपनी गोभक्ति दिखा दी। अब वे दिखाएं।

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य ने आपको प्रणाम कर आपसे स्नान करने की प्रार्थना की थी।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: मैंने उनके वक्तव्य का समर्थन किया। लेकिन वे आ तो नहीं पाए। उन्हें दबा दिया गया। वे अपनी भावना को व्यवहार-रूप नहीं दे पाए।

आपने मनुस्मृति की बात कही। देश में एक बड़ा तबका है जो मनुस्मृति के खिलाफ है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: जितने भी लोग मनुस्मृति के खिलाफ वक्तव्य देते हैं, उसे जलाते हैं, हम उनसे पूछते हैं कि आपने मनुस्मृति पढ़ी है। वे कहते हैं कि पढ़ी तो नहीं है, बस इसके बारे में सुना है।जिसने भी मनुस्मृति को गंभीरता से पढ़ा है, वो कभी भी इसे ठुकरा नहीं सकता है। मनुस्मृति वह ग्रंथ है जिसने हम सबको जोड़े रखा है।

आपने कांग्रेस के बारे में कहा था कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वही हिंदूवादी पार्टी थी।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: पढ़े हुए इतिहास के आधार पर मैंने यह बात कही थी। उस समय कांग्रेस इतनी ज्यादा हिंदू पार्टी मानी जाती थी कि मुसलमान उसके साथ काम करने के लिए तैयार ही नहीं थे। तभी तो आजादी के साथ भारत-पाक विभाजन हुआ। बाद के समय में कांग्रेस ने खुद को मुसलिमों के प्रति समर्पित कर दिया।

अब तो कांग्रेस भी हिंदूवादी होने का दावा करने लगी है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: हिंदुओं के देश पर राज करना है तो हिंदूवादी होना पड़ेगा।

इसी बात से तो अल्पसंख्यकों को डर लगता है कि अगर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा आ गई तो उनके हितों की रक्षा नहीं होगी।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: राम के आदर्श को मानने वाला असली हिंदू किसी को डराता-धमकाता नहीं है। सबको समान अवसर देता है। किसी को डराने-धमकाने वाला असली हिंदू हो ही नहीं सकता है। राम के आदर्श वाले राज्य में सभी के हितों की रक्षा होती है।

हमारे माध्यम से आप योगी आदित्यनाथ को क्या संदेश देना चाहते हैं?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: हमारी उनसे बहुत अपेक्षा है। वे बस गोमाता को लेकर काम कर दें। वे सिर्फ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं, गोरक्षपीठ के महंत भी हैं। बाकी तो नेता हैं, वे संत हैं। उनसे चंदबरदाई की तरह अविमुक्तेश्वरानंद कहता है कि मत चूको चौहान। अभी ही इसका वक्त है। गोमाता का काम करके गोलोक में अपनी सीट पक्की कर लीजिए।