प्रधानमंत्री नेरन्द्र मोदी किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हो रहे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की 26 वीं बैठक में हिस्सा ले रहे हैं। कल उन्होंने सम्मेलन से पहले ईरान, रूस, किर्गिस्तान और अर्मेनिया के नेताओं से मुलाकात की। इसी सिलसिले में पुतिन के साथ मुलाकात के दौरान मोदी ने कहा, “हमें अंतहीन युद्ध से युद्ध के अंत की ओर बढ़ना होगा।”
प्रधानमंत्री का यह कथन ऐसे समय में आया है, जब पश्चिमी एशिया हाल ही में युद्ध की भीषण विभीषिका से होकर गुजरा है और इसके केंद्र में संगठन का ही एक सदस्य देश ईरान था। युद्ध फिलहाल रुका हुआ है, लेकिन तनाव अभी भी बरकार है, जिसकी छाया इस सम्मेलन पर भी मौजूद है।
इसका अंदाजा सम्मेलन के इस साल के थीम से भी लगता है- ‘एससीओ के 25 वर्ष – शांति, विकास और समृद्धि के लिए मिलकर आगे बढ़ना।’ यह इस बात को रेखांकित करता है कि विकास और समृद्धि के लिए शांति अनिवार्य शर्त है।
भारत 2017 में इस संगठन का पूर्ण सदस्य बनने के बाद से ही इस मूल्य पर जोर देता रहा है कि इस पूरे क्षेत्र की समृद्धि शांति और सुरक्षा पर निर्भर है। प्रधानमंत्री ने कल भी इसी मूल्य को एक सरल, लेकिन प्रभावी शब्दों में दोहराया है।
हम यहाँ यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अपनी स्थापना के बाद से यह संगठन इस क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और समृद्धि को आगे बढ़ाने में कितना सफल रहा है? भारत इस संगठन में क्यों शामिल हुआ है? और सामने क्या चुनौतियाँ हैं?
SCO क्या है?
यह यूरोप और एशिया के देशों का राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन है, जिसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखना है। 15 जुन 2001 में शंघाई (चीन) में औपचारिक रूप से स्थापना से पहले यह ‘शंघाई-5’ के नाम से जाना जाता था, जिसमें चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान शामिल थे। हालांकि 2001 में उज्बेकिस्तान के शामिल होने के बाद से यह SCO कहलाने लगा।
भारत और पाकिस्तान इसमें 2017 में शामिल हुए, 2023 में ईरान शामिल हुआ, जबकि सबसे नया सदस्य बेलारूस है, जो 2024 में शामिल हुआ। इस प्रकार वर्तमान में इसमें 10 सदस्य शामिल हैं, जो कुल मिलाकर दुनिया के लगभग 42 % आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। संगठन के सदस्य देशों की जीडीपी दुनिया के जीडीपी की लगभग एक चौथाई है, और वैश्विक व्यापार में इनकी हिस्सेदारी लगभग 15 % है।
इसकी स्थापना क्यों हुई थी?
इसकी स्थापना मुख्य रूप से सोवियत संघ के विघटन के बाद उभरे सीमा विवादों को हल करने और सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य तनाव को कम करने के लिए हुआ था। साथ ही सदस्य देशों के बीच आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद जैसी साझा सुरक्षा चुनौतियों से मिलकर निपटना भी था।
तब से लेकर अब तक 25 वर्षों में यह सीमा विवाद सुलझाने वाले संगठन से आगे बढ़कर सुरक्षा, आतंकवाद, अर्थव्यवस्था, परिवहन, ऊर्जा, डिजिटल क्षेत्र और मानवीय सहयोग का बहुपक्षीय मंच बन गया है।
अब तक SCO ने क्या हासिल किया है
आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद के खिलाफ कार्रवाई के लिए Regional Anti-Terrorist Structure (RATS) की स्थापना की गई है। सदस्य देश इसके माध्यम से आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद से जुड़ी सूचनाओं का लगातार आदान-प्रदान कर रहे हैं और संयुक्त अभ्यासों में हिस्सा ले रहे हैं।
2010 में सदस्य देशों ने संगठित अपराध से निपटने के लिए एक समझौता किया था, जिसके बाद से मानव तस्करी, ड्रग्स, हथियारों की तस्करी और अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध से निपटने के लिए सहयोग बढ़ा है। एक आंकड़े के अनुसार 4 से 8 अगस्त 2025 के बीच सदस्य देशों में चलाए गए अभियान में 9 टन 235 किलोग्राम नशीले पदार्थ और 21 टन 451 किलोग्राम नशीली दवाएं बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायन ज़ब्त किए गए थे।
व्यापार और निवेश को बढ़ान के लिए विशेष समूहों की स्थापना की गई है। सीमा शुल्क पर सहयोग बढ़ाने, ई-कॉमर्स को सुगम बनाने, परिवहन और संपर्क को बढ़ाने के लिए विशेष समूहों की स्थापना की गई है। इसके साथ ही कृषि, विनिर्माण आदि में सहयोग के लिए भी विशेष समूहों की स्थापना की गई है। इसके अलावा सदस्यों देशों के बीच बैंक के समूह के माध्यम से वित्त का प्रवाह हो रहा है।
भारत को इस संगठन से क्या लाभ है?
इस संगठन के पांच देश मद्य एशिया के देश हैं, जहाँ पारंपरिक रूप से भारत की पहुंच और उपलब्धता कम रही है। इस संगठन के माध्यम से वह इन देशों में अपनी पहुंच बढ़ा सकता है। ये देश न केवल सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यहाँ व्यापार, सुरक्षा, संपर्क के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं।
मध्य एशिया में तेल, गैस और यूरेनियम जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन हैं। SCO के माध्यम से भारत इन देशों के साथ ऊर्जा सहयोग और दीर्घकालीन आपूर्ति के विकल्प तलाश सकता है।
भारत के लिए इन मध्य एशियाई देशों में व्यापार और निवेश की काफी संभावनाएं मौजूद हैं। भारतीय कंपनियों के लिए यह एक नया बाजार है।
भारत ने इस संगठन और इसके RATS तंत्र के माध्यम से आतंकवाद के खिलाफ अपनी आवाज न सिर्फ सदस्य देशों तक पहुंचाई है, बल्कि सक्रिय सहयोग भी बढ़ाया है।
भारत के लिए चुनौतियां
इस संगठन पर चीन का काफी प्रभाव है, जिसे प्रति-संतुलित करना भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। साथ ही हाल के समय में चीन और रूस के बीच भी नजदीकियां बढ़ी हैं। इसके अलावा इस संगठन की छवि पश्चिम संगठन के रूप में बढ़ रही है। ऐसे में इस संगठन के साथ रिश्तों को मजबूत करने से पश्चिम विरोधी होने का संकेत जा सकता है।
आगे की राह
भारत के लिए इस संगठन में ने केवल अपनी निरंतर मौजूदगी को बनाए रखना जरूर है, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों के माध्यम से रिश्तों को मजबूत करना भी जरूरी है ताकि चीन के प्रभाव को प्रति-संतुलित किया जा सके।
साथ ही मध्य एशियाई देशों में व्यापार, निवेश और संपर्क बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना होगा।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से मुलाकात की। पश्चिम एशिया में पिछले कई महीनों से चल रहे तनाव और सुरक्षा हालात के बीच दोनों नेताओं की इस मुलाकात को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।
