1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में दोषी ठहराए गए कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार की गुरुवार को सफदरजंग अस्पताल में आजीवन कारावास की सजा काटने के दौरान मौत हो गई। कुमार को दिल्ली की एक अदालत ने 1 नवंबर 1984 को सरस्वती विहार में जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या के लिए फरवरी 2025 में दोषी ठहराया था।
सज्जन कुमार की मौत 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई हिंसा के करीब 40 साल बाद हुई। इन दंगों की जांच करने वाले नानावटी आयोग ने कुमार के खिलाफ ‘विश्वसनीय सामग्री’ मिलने की बात कही थी। आयोग ने यह भी कहा था कि कई गवाहों द्वारा बताए गए हमलों में कुमार ‘संभवतः शामिल’ थे।
आयोग के निष्कर्ष
रिपोर्ट में पूरी दिल्ली में सिखों और उनकी संपत्तियों पर हुए हमलों से जुड़े शपथपत्रों, पुलिस रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की विस्तृत जांच की गई। इसमें कुमार के खिलाफ आरोपों का सबसे विस्तृत आधिकारिक विवरण सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, कुमार एक प्रभावशाली स्थानीय कांग्रेस नेता थे और कथित तौर पर पश्चिमी दिल्ली के पालम कॉलोनी, राज नगर, मंगोलपुरी और सुल्तानपुरी समेत कई इलाकों में भीड़ के साथ मौजूद रहे, उसे संबोधित किया या उसका नेतृत्व किया।
राज नगर की एक प्रमुख गवाह जगदीश कौर ने आयोग को बताया कि उन्होंने मंदिर मंगला पूरी के पास एकत्र हुए लोगों से कुमार को यह कहते सुना था, “सरदार साला कोई नहीं बचना चाहिए।”
आयोग ने इस सबूत को भी रिकॉर्ड में लिया कि कुमार ने मंगोलपुरी में एक भीड़ को संबोधित किया और कहा कि सिखों ने ‘उनकी माँ’ को मार डाला है, जिसके बाद लोगों ने सिखों को मारने के नारे लगाए। रिपोर्ट में कहा गया कि इलाके के एक गुरुद्वारे पर हुए हमले में बाद में तीन सिख पुरुषों को जिंदा जला दिया गया था।
आयोग ने कहा, “कई गवाहों ने सज्जन कुमार, बलवान खोखर, प्रताप सिंह, महा सिंह और मोहिंदर सिंह की संलिप्तता के बारे में बताया है।”
आयोग ने केवल आरोपों पर भरोसा नहीं किया, बल्कि इलाकों में घूमती भीड़, पेट्रोल और केरोसिन की उपलब्धता, लोगों को लाने-ले जाने के लिए बसों के इस्तेमाल और स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं की संलिप्तता के सबूतों पर भी विचार किया।
आयोग ने सिफारिश की कि अधिकारी उन मामलों की जांच करें जिनमें गवाहों द्वारा कुमार का नाम लिया गया था लेकिन उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं की गई थी, या उन मामलों की जांच करें जिन्हें ‘सुराग न मिलने’ के कारण बंद कर दिया गया था।
पालम कॉलोनी से विवरण
रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली कैंट पुलिस स्टेशन क्षेत्र से संबंधित था, जिसमें पालम कॉलोनी, राज नगर, साध नगर, सागरपुर और महावीर एन्क्लेव शामिल थे। आयोग ने दर्ज किया कि यह क्षेत्र दंगों के दौरान सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक था।
आयोग ने पुलिस रिकॉर्ड का हवाला देते हुए दिखाया कि 31 अक्टूबर से 5 नवंबर 1984 के बीच क्षेत्र में 246 सिख मारे गए थे। इसने अन्य अनुमानों का भी उल्लेख किया, जिसमें आहूजा समिति का 341 मौतों का आंकड़ा शामिल था। रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र में छह गुरुद्वारे, 385 मकान, 110 दुकानें और 45 वाहन जला दिए गए थे।
आयोग ने कहा कि हिंसा के व्यापक पैमाने के बावजूद पुलिस ने केवल पांच एफआईआर दर्ज की थीं।
पालम कॉलोनी के राज नगर निवासी सुदर्शन सिंह ने आयोग को बताया कि कुमार को भीड़ के पास देखा गया था और वे इस पूरी कार्रवाई की देखरेख कर रहे थे। सिंह ने यह भी कहा कि कुमार बलवान खोखर को निर्देश दे रहे थे।
आयोग ने चांद नगर की रहने वाली अमरजीत कौर के आरोप को दर्ज किया। उन्होंने कहा कि कुमार ने उस भीड़ का नेतृत्व किया जिसने उनके पति कैप्टन नज़र सिंह मंगट को जिंदा जलाकर मार डाला था।
मंगोलपुरी से मिले सबूत
रिपोर्ट में मंगोलपुरी के आरोपों की अलग से जांच की गई, जहाँ कई दिनों तक हिंसा जारी रही थी।
मंगोलपुरी निवासी निरंजन सिंह ने एक हलफनामा दायर कर कहा कि कुमार, उनके निजी सहायक हरद्वारी लाल, हरद्वारी लाल के दो बेटे और एक होटल कर्मचारी जी-ब्लॉक के गुरुद्वारे आए थे। हलफनामे के अनुसार, गुरु ग्रंथ साहिब को जलाया गया और फिर गुरुद्वारे में आग लगा दी गई।
आयोग ने कहा कि हरनाम सिंह ने भी इस हमले के संबंध में एक हलफनामा दिया था। रिपोर्ट में दर्ज उनके विवरण के अनुसार, भीड़ के नेतृत्व का श्रेय हरद्वारी लाल को दिया गया और आरोप लगाया गया कि उनके दो बेटों ने गुरुद्वारे को लूटने और उसमें आग लगाने में भाग लिया।
सुल्तानपुरी से आरोप
सुल्तानपुरी एक अन्य क्षेत्र था जहाँ आयोग ने कुमार के खिलाफ आरोप दर्ज किए थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुमार ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं की एक बैठक को संबोधित किया था और कथित तौर पर हत्या के लिए सिखों को जिम्मेदार ठहराते हुए बयान दिए थे। इसने सिफारिश की कि गवाहों के आरोपों से जुड़े मामलों की फिर से जांच की जाए।
आयोग ने दीदार सिंह के साक्ष्य का भी हवाला दिया, जिन्होंने आरोप लगाया था कि कुमार ने पटियाला और नवादा गांवों से कांग्रेस कार्यकर्ताओं की एक बैठक बुलाई थी। इस साक्ष्य पर मंगोलपुरी के एक मामले के संबंध में विचार किया गया था, जिसमें रिपोर्ट के अनुसार, कुमार के खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई थी।
पुलिस जांच
आयोग के समक्ष कुमार का बचाव मुख्य रूप से आपराधिक मामलों में उनके बरी होने पर निर्भर था। आयोग के नोटिस के अपने जवाब में उन्होंने तर्क दिया कि जिन गवाहों ने हलफनामा दायर किया था, उन्होंने या तो पुलिस के सामने उनका नाम नहीं लिया था या अदालत में आरोपों का समर्थन नहीं किया था। उन्होंने आठ मामलों में फैसलों को पेश किया और कहा कि उन्हें और बलवान खोखर को बरी कर दिया गया था।
हालांकि, आयोग ने स्पष्ट किया कि बरी किए जाने के फैसले उसे अपने सामने मौजूद व्यापक साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से आकलन करने से नहीं रोक सकते। आयोग ने यह भी कहा कि जांच के दौरान पुलिस की लापरवाही, शिकायतें दर्ज न किए जाने और प्रभावशाली आरोपियों के नाम एफआईआर में शामिल न किए जाने के सबूत सामने आए थे।
आयोग ने कहा, “यह दर्शाने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है कि पुलिस द्वारा दर्ज किए गए मामलों में भी उनके द्वारा कोई उचित जांच नहीं की गई थी।”
रिपोर्ट में कहा गया कि पीड़ितों से अक्सर लूटी गई या जलाई गई संपत्ति का विवरण देने को कहा जाता था, लेकिन उन्हें हमलावरों का नाम बताने का उचित अवसर नहीं दिया जाता था। इसमें यह भी कहा गया कि कई शिकायतें दर्ज नहीं की गईं, प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ नहीं की गई, और बयानों व चार्जशीटों से कथित हमलावरों के नाम हटा दिए गए।
इसमें कहा गया, “एक गवाह ने विशेष रूप से कहा है कि उसने हमलावरों में से एक के रूप में सज्जन कुमार का नाम लिया था, फिर भी पुलिस द्वारा उसके बयान में उनका नाम दर्ज नहीं किया गया था।”
आयोग ने कहा, “इतने सारे लोगों ने उनका नाम क्यों लिया और बैठकें संबोधित करने और सिखों को मारने व उनकी संपत्तियों को लूटने और नष्ट करने के लिए लोगों को उकसाने जैसे कृत्यों का आरोप उन पर क्यों लगाया, यह बात सज्जन कुमार द्वारा अस्पष्ट ही रही।”
आयोग ने कहा कि प्रभावशाली राजनीतिक नेताओं के खिलाफ लगे आरोपों की उचित जांच न किए जाने से मामले कमजोर हुए और अंततः विफल हो गए । आयोग के अनुसार, जांच की इन कमियों के कारण उस समय निष्पक्ष आपराधिक सुनवाई के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से आकलन करना भी संभव नहीं रहा।
जांच से लेकर सजा तक
दशकों तक 1984 के दंगे हिंसा के व्यापक पैमाने और दोषियों को मिली सीमित सजा के बीच के अंतर के लिए चर्चा में रहे। कुमार की भूमिका पर नानावटी आयोग की रिपोर्ट इस इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। रिपोर्ट ने उन आरोपों को दर्ज किया, जिनकी शुरुआती दौर में पर्याप्त जांच नहीं हो सकी थी, और औपचारिक रूप से सिफारिश की कि इनमें से कुछ मामलों को दोबारा खोला जाए।
कुमार को बाद में एक आपराधिक मुकदमे में सजा मिली। फरवरी 2025 में, दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें 1984 के दंगों के दौरान सरस्वती विहार में जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या का दोषी ठहराया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
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1984 के सिख दंगों में कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को राउस एवेन्यू कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुना दी है। सज्जन कुमार को इससे पहले एक और मामले में उम्रकैद की सजा मिल चुकी है, यानी कि दूसरी बार उन्हें यही सजा दी गई है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
