रूस और जापान दोनों ही भारत के ‘मित्र’ देश हैं लेकिन क्या आपको जानकारी है कि इन दोनों देशों के बीच सीमा विवाद की वजह से इस समय रिश्ते पूरी तरह से शून्य हो चुके हैं। शुक्रवार को रूस ने कहा कि सीमा विवाद को लेकर जापान के साथ कोई शांति वार्ता नहीं चल रही है। क्रेमलिन ने कहा कि रूस के प्रति टोक्यो का रवैया दोस्ताना नहीं है जिसके कारण जापान के साथ संबंध उनके लगभग शून्य हो गए हैं और शांति की दिशा में कोई वार्ता नहीं चल रही है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद काफी पुराना है जो अब तक सुलझा नहीं है।
रूस की सरकारी समाचार एजेंसी तास के अनुसार, शुक्रवार को संसद में अपने उद्घाटन भाषण में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने कहा, “हालांकि जापान-रूस संबंध कठिन दौर से गुजर रहे हैं लेकिन जापानी सरकार का रुख अपरिवर्तित है और वह क्षेत्रीय मुद्दे को सुलझाने और शांति संधि संपन्न करने के उद्देश्य से प्रतिबद्ध है।”
वहीं, क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि टोक्यो के मॉस्को के प्रति अमित्रतापूर्ण रवैये के कारण रूस और जापान के संबंध लगभग शून्य हो गए हैं। उन्होंने पत्रकारों से कहा, “कोई संवाद नहीं हो रहा है और संवाद के बिना शांति संधि के मुद्दे पर चर्चा करना असंभव है। रूस कभी भी इस संवाद को समाप्त करने के पक्ष में नहीं रहा है।” उन्होंने आगे कहा, “इन परिस्थितियों में, हमारे संबंधों की कार्यप्रणाली में बदलाव किए बिना किसी समझौते पर पहुंचना असंभव है।”
रूस और जापान के बीच सीमा विवाद
रूस और जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध की कोई औपचारिक शांति संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए थे जिसकी मुख्य बाधा कुरील द्वीप समूह को लेकर अनसुलझा क्षेत्रीय विवाद है, जिसे जापान में उत्तरी क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। रूस और जापान के बीच सीमा विवाद कुरील द्वीपसमूह (Kuril Islands) के चार दक्षिणी द्वीपों को लेकर है। जापान इन्हें नॉर्दर्न टेरिटरीज़ (Northern Territories) कहता है। ये चार द्वीप हैं- इतुरुप (Iturup / Etorofu), कुनाशिर (Kunashir / Kunashiri),शिकोटान (Shikotan) और हाबोमई द्वीप समूह (Habomai islets)।
अक्सर यह मान लिया जाता है कि ये सभी द्वीप छोटे हैं लेकिन ऐसा नहीं है। हालांकि हाबोमाई द्वीप समूह आकार में नगण्य और निर्जन है और शिकोतान अपेक्षाकृत छोटा है लेकिन अन्य दो द्वीप काफी बड़े हैं। वास्तव में इन्हें अभी भी जापान का हिस्सा माना जाए तो इतुरुप और कुनाशिर क्रमशः जापान के पांचवें और छठे सबसे बड़े द्वीप होंगे।
इस विवाद की जड़ में क्या है?
जापान और रूस के बीच सीमा मूल रूप से 1855 में शिमोदा संधि द्वारा स्थापित की गई थी। इस संधि में, दोनों देशों ने सहमति व्यक्त की कि चारों द्वीप जापानी क्षेत्र हैं और अगले 90 वर्षों तक ऐसा ही रहा। 1875 में, एक नई संधि के तहत टोक्यो को पूरी द्वीप श्रृंखला सौंप दी गई जिसके बदले में रूस को सखालिन द्वीप पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त हुआ। हालांकि, यह स्थिति 1945 में बदल गई जब उसी साल अगस्त में जापान के विरुद्ध युद्ध में शामिल होने के बाद सोवियत संघ ने चारों द्वीपों पर कब्जा कर लिया। सोवियत संघ ने तब वहां मौजूद जापानी आबादी को निर्वासित कर दिया और 1947 में आधिकारिक तौर पर द्वीपों को सोवियत संघ में शामिल कर लिया।
रूसी पक्ष का मानना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप इन द्वीपों को जापान से वैध रूप से छीन लिया गया था। वहीं, जापान के नजरिए से, इन द्वीपों पर कब्ज़ा करना बिल्कुल भी वैध नहीं था जिन्हें टोक्यो स्वाभाविक रूप से जापानी क्षेत्र मानता है। वहीं, 1951 में सैन फ्रांसिस्को शांति संधि के बाद जापान ने कुरील द्वीपसमूह पर अपना दावा छोड़ा लेकिन इन चार दक्षिणी द्वीपों का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। जापान का कहना है कि ये कुरील का हिस्सा नहीं थे जबकि रूस इन्हें कुरील का ही हिस्सा मानता है।

जापान और रूस दोनों के अलग-अलग दावे
पिछले कई दशकों से इस मुद्दे को सुलझाना बेहद मुश्किल रहा है, खासकर इसलिए क्योंकि जापान और सोवियत संघ शीत युद्ध में एक-दूसरे के विरोधी थे। हालांकि, 1950 के दशक के मध्य में एक संभावित समझौते की रूपरेखा सामने आई और इसका वर्णन 1956 के सोवियत-जापानी संयुक्त घोषणापत्र में किया गया। उस समय, सोवियत पक्ष ने शांति संधि संपन्न होने के बाद सद्भावना के प्रतीक के रूप में दो छोटे द्वीपों (शिकोटान और हाबोमई) को जापान को सौंपने की पेशकश की थी। लेकिन, जापानी पक्ष ने अंततः इस प्रस्ताव को अपर्याप्त माना (क्योंकि दो छोटे द्वीप विवादित भूभाग का केवल सात प्रतिशत ही हैं) और तब से चारों द्वीपों की वापसी के लिए दबाव बनाना जारी रखा है। तब से यह विवाद अनसुलझा ही रहा है।
अब इन द्वीपों पर 30,000 लोगों का एक बड़ा रूसी समुदाय रहता है और इतुरुप पर रूसी सैनिकों की उपस्थिति भी है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 2004 में संकेत दिया था कि सबसे दक्षिणी दो द्वीपों को वापस करने का प्रस्ताव अभी भी विचाराधीन है लेकिन उन्होंने दो बड़े द्वीपों को छोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया।
द्वीपों पर किस देश का अधिकार?
कई समझौतों के बावजूद विवाद जारी है और जापान अभी भी सबसे दक्षिणी द्वीपों पर ऐतिहासिक अधिकारों का दावा करता है और उसने सोवियत संघ और 1991 से रूस को उन द्वीपों को जापानी संप्रभुता में वापस करने के लिए बार-बार मनाने की कोशिश की है। 2018 में , रूसी राष्ट्रपति और जापानी प्रधानमंत्री ने पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की और 1956 की घोषणा के आधार पर बातचीत करने के लिए जापानी प्रधानमंत्री के सहमत होने के बाद क्षेत्रीय विवाद को समाप्त करने का निर्णय लिया। हालांकि, रूस ने संकेत दिया कि जापान और सोवियत संघ द्वारा 1956 में हस्ताक्षरित संयुक्त घोषणापत्र में न तो हाबोमाई और शिकोटान को वापस करने का कोई आधार बताया गया है और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि द्वीपों पर किस देश की संप्रभुता है।
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वॉशिंगटन स्थित प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा जारी एक व्यापक वैश्विक रिसर्च की रिपोर्ट आई है, जिसमें बताया गया कि सिंगापुर दुनिया का सबसे अधिक धार्मिक विविधता वाला देश है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
