नवंबर 1971 के आखिरी हफ्ते में, भारत की इंटेलिजेंस एजेंसी को एक अनोखी जानकारी मिली। पाकिस्तानी सिस्टम के अंदर से के शंकरन नायर के एक सोर्स को पता चला था कि पाकिस्तान वेस्टर्न सेक्टर में भारतीय एयर बेस पर पहले से एयर स्ट्राइक की तैयारी कर रहा है। नायर ने यह चेतावनी आगे बढ़ाई और इंडियन एयर फोर्स को अलर्ट पर रखा गया। आखिरकार पाकिस्तान ने 3 दिसंबर को अपने एयर स्ट्राइक शुरू कर दिए लेकिन भारत तैयार था।
13 दिन बाद पाकिस्तानी आर्मी ने ढाका में सरेंडर कर दिया और बांग्लादेश का जन्म हुआ। जिस संगठन ने यह इंटेलिजेंस दी थी, उसके हेड रामेश्वर नाथ काओ थे, जो रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) के पहले चीफ थे। R&AW को बने तब मुश्किल से तीन साल हुए थे।
R&AW के 58 साल पूरे
1968 में बनी R&AW को 21 सितंबर को 58 साल पूरे हो गए। काओ ने शुरू से बनाया था, जो इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक पूर्व ऑफिसर थे और उन्हें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत की पहली डेडिकेटेड बाहरी इंटेलिजेंस एजेंसी बनाने का काम सौंपा था। यह कामयाबी सिर्फ एक नई एजेंसी बनाना नहीं थी। यह वह तेज़ी थी जिससे काओ ने इसे नेशनल सिक्योरिटी के सबसे ऊंचे लेवल पर काम करने के लिए जरूरी लोग, स्किल्स और इंस्टीट्यूशनल कल्चर दिया।
पूर्व R&AW एडिशनल सेक्रेटरी बी रमन की किताब “Kaoboys of RAW” के मुताबिक इसके बनने के बाद पहले कुछ महीनों में काओ ने अधिकारियों को दो ज़रूरी काम दिए। पहला काम पाकिस्तान और चीन के बारे में इंटेलिजेंस इकट्ठा करने की अपनी क्षमता को मज़बूत करना और दूसरा पूर्वी पाकिस्तान में गुप्त कार्रवाई करना शामिल था। रमन ने किताब में कहा, “एक असरदार गुप्त कार्रवाई की क्षमता बनाने के लिए दो साल से थोड़ा ज़्यादा समय बहुत कम है, लेकिन R&AW ऐसा करने में कामयाब रहा।”उन्हें यह भी याद है कि कैसे काओ के आदमियों ने जनरल याह्या खान के कम्युनिकेशन को पूरी तरह से खराब कर दिया था।
रमन किताब में लिखते हैं, “लगभग हर दिन, इंदिरा गांधी और युद्ध के संचालन की ज़िम्मेदारी संभाले हुए दूसरे लोगों के पास याह्या खान और दूसरे लोगों की पूर्वी पाकिस्तान में अपने अधिकारियों के साथ टेलीफोन पर हुई बातचीत के हिस्से होते थे।”
फिर भी संगठन के पीछे का आदमी ज़्यादातर अंधेरे में ही रहा। जैसा कि काओ के साथ काम करने वाले R&AW के पूर्व ऑफिसर वी बालचंद्रन ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “लोग उस समय के आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ और BSF चीफ रुस्तम जी को बांग्लादेश युद्ध के संदर्भ में देखते हैं। लेकिन काओ ने ही उनकी आगे की उपलब्धियों के लिए सारी नींव रखी थी। काओ कभी नहीं चाहते थे कि उनके बारे में बात की जाए। उनका मानना था कि इंटेलिजेंस का काम चुपचाप किया जाना चाहिए।”
कैसा था काओ का बचपन?
काओ की समझदारी सिर्फ प्रोफेशनल नहीं थी। इसकी जड़ें नुकसान और बेइज्जती से बने बचपन में थीं। जब वह पांच साल के थे, तब उनके पिता की मौत हो गई, और उनकी मां 25 साल की उम्र में विधवा हो गईं। परिवार को पैसे की तंगी थी। वाराणसी में जन्मे काओ को बड़ौदा में स्कूल में पढ़ाई करना मुश्किल लगा। क्लासमेट बार-बार उनका सरनेम Cow गलत बोलते थे और उनके मोटापे की वजह से उनका मज़ाक उड़ाते थे, जैसे उन्हें ब्राउन बफेलो और सैक ऑफ पोटैटो कहते है। नितिन ए गोखले की बायोग्राफी ‘R.N. काओ: जेंटलमैन स्पाईमास्टर’ के मुताबिक काओ को याद है कि जब वह 11 या 12 साल के थे, तो उन्हें बहुत ज़्यादा पता था कि कोई उन्हें देख रहा है। बाद में उन्हें याद आया कि वह बिना नौकर के सबके सामने खाना नहीं खा पाते थे।
कई सालों बाद उन्होंने लिखा कि सबके सामने खाने की बेचैनी उनसे कभी पूरी तरह से दूर नहीं हुई। काओ ने उन सालों को याद करते हुए लिखा, “मैं अपने ही खोल में सिमट जाता था।” उनका मानना था कि इसी ने आम तौर पर ज़िंदगी के प्रति एक आत्मनिरीक्षण करने वाले और अलग-थलग नजरिए की नींव रखी। यह एक ऐसे आदमी की तरफ से एक खुलासा करने वाली बात है, जिसने आखिरकार अपना करियर दूसरों को बिना किसी की नजर में आए देखने की कला में माहिर होने में बिताया।
मंदिर की बनावट और मूर्तिकला में दिलचस्पी रखते थे काओ
लेकिन, काओ का एक दूसरा पहलू भी था। गोखले की किताब के अनुसार उन्हें पुराने भारतीय इतिहास, मंदिर की बनावट और मूर्तिकला में दिलचस्पी थी, वे योग करते थे और मिट्टी, लकड़ी और पत्थर के साथ काम करते थे। इलाहाबाद से इंग्लिश में MA करने से पहले काओ ने लखनऊ यूनिवर्सिटी में इंग्लिश लिटरेचर, इतिहास और पर्शियन की पढ़ाई की। उन्हें फूलों और जानवरों में दिलचस्पी थी और वे अपने साथियों के बीच अपनी खास पसंद के लिए जाने जाते थे।
काओ 1940 में भारतीय पुलिस में शामिल हुए और आज़ादी के बाद इंटेलिजेंस ब्यूरो में चले गए। IB चीफ बी एन मलिक के नेतृत्व में काम करते हुए उन्हें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सिक्योरिटी का इंचार्ज बनाया गया। नेहरू के साथ उनकी यात्राओं ने उन्हें विदेशी इंटेलिजेंस चीफ के संपर्क में लाया और उन्हें भारत के बाहर इंटेलिजेंस एजेंसियों के काम करने के तरीके के बारे में बताया।
चीन के साथ 1962 के युद्ध ने एविएशन रिसर्च सेंटर बनाने के लिए प्रेरित किया, जिसके हेड काओ 1963 से 1966 तक रहे। ARC ने अमेरिकी मदद से हवाई इंटेलिजेंस क्षमताएं डेवलप कीं। काओ ने स्पेशल फ्रंटियर फोर्स बनाने में भी मदद की, जिसका मकसद भारत की उत्तरी सीमाओं के साथ मुश्किल इलाकों में काम करना था। पाकिस्तान के साथ 1965 की लड़ाई के बाद इंदिरा गांधी और उनके मुख्य सलाहकार पी एन हक्सर ने काओ को एक अलग बाहरी इंटेलिजेंस संगठन डिज़ाइन करने का काम दिया। नई एजेंसी IB के पुलिस-सेंट्रिक स्ट्रक्चर से अलग होनी थी। इसके लिए अलग-अलग एक्सपर्टीज़ वाले लोगों की जरूरत थी जो बिना ध्यान खींचे विदेश में काम कर सकें।
शंकरन नायर को प्रोजेक्ट में किया शामिल
काओ ने शंकरन नायर को इस प्रोजेक्ट में शामिल किया। नायर पाकिस्तान और बड़ी इस्लामिक दुनिया की गहरी समझ रखने वाले एक अनुभवी ऑफिसर थे। वह संगठन को बनाने में एक अहम किरदार बन गए। गोखले लिखते हैं कि नायर, काओ के डिज़ाइन किए गए स्ट्रक्चर को अपनी बड़ी कामयाबी मानते थे। केंद्रीय सचिवालय ने आखिरकार एजेंसी को इसका नाम दिया: रिसर्च एंड एनालिसिस विंग।
काओ की टैलेंट पहचानने और स्टैंडर्ड तय करने की काबिलियत उनके बनाए संगठन के लिए बहुत ज़रूरी थी। गोखले की किताब के मुताबिक विक्रम सूद, जिन्हें काओ ने भर्ती किया था, उन्होंने कहा कि स्पाईमास्टर होने वाले अधिकारियों को ध्यान से जांचते थे और अपनी रिपोर्ट में एक्यूरेसी पर ज़ोर देते थे। जो रिपोर्ट उनके स्टैंडर्ड पर खरी नहीं उतरती थी, उसे एक आसान सा एनोटेशन देकर वापस किया जा सकता था ‘ऑफ’। वह बहुत ज़्यादा डिमांडिंग थे लेकिन शायद ही कभी ड्रामा करते थे, बिना चिल्लाए डिसिप्लिन वाली मीटिंग्स चलाते थे।
1971 की लड़ाई ने संगठन की इंटेलिजेंस इकट्ठा करने, सीक्रेट और एनालिटिकल क्षमताओं को एक साथ ला दिया। R&AW ने बंगाली राजनीतिक नेताओं और रेजिस्टेंस ग्रुप्स के साथ कॉन्टैक्ट बनाए और लड़ाई के लिए जमीन तैयार करने में मदद की। एजेंसी का रोल बंगाली रेजिस्टेंस के अलग-अलग हिस्सों को कोऑर्डिनेट करना और इंडियन आर्मी के आखिरी दखल से पहले पाकिस्तानी सेना के खिलाफ एक कैंपेन चलाना था। बालचंद्रन का कहना है कि काओ ने नॉर्मल ब्यूरोक्रेटिक चैनलों के बाहर स्पेशल स्किल्स वाले लोगों को भर्ती किया था। उनमें एक रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर भी था, जिसकी यूनिट ने 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान के प्लान किए गए एयर अटैक के बारे में एडवांस इंटेलिजेंस दी थी।
बालचंद्रन का कहना है कि उसका योगदान काफी बड़ा था, क्योंकि यह दिखाई नहीं दे रहा था। बांग्लादेश के बाद कुछ सफलता मिलीं। 1975 में सिक्किम के इंटीग्रेशन से जुड़ी घटनाओं में R&AW का बड़ा रोल था। लेकिन कुछ फेलियर भी हुए, या कम से कम ऐसे पल आए जिन्होंने इंटेलिजेंस की लिमिट्स को सामने ला दिया। अगस्त 1975 में शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार के सदस्यों की ढाका में हत्या कर दी गई। इस बात पर सवाल थे कि क्या R&AW बिना तैयारी के पकड़ा गया था। बालचंद्रन इससे इनकार करते हैं।
बालचंद्रन ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “1975 में, मिस्टर काओ गुप्त रूप से बांग्लादेश गए और मुजीबुर को बताया कि एक साज़िश बन रही है। लेकिन मुजीबुर ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। हत्या के बाद एक पुलिस अधिकारी ने मीटिंग के दौरान यह सवाल पूछा कि RAW क्या कर रहा है। मिस्टर काओ ने कहा, ‘मैं बस इतना कह सकता हूं कि हम हैरान नहीं थे’। उन्होंने यह शेखी नहीं बघारी कि वह गए थे और मुजीबुर को चेतावनी दी थी।”
R&AW पर लगे आरोप
जब काओ हेड थे, तब R&AW भी इमरजेंसी के साये में आ गया था। विपक्ष ने उस पर सरकार का गुलाम होने का आरोप लगाया था। हालांकि, बालचंद्रन इससे इनकार करते हैं। बालचंद्रन ने कहा, “जॉर्ज फर्नांडिस ने एक बार आरोप लगाया था कि इमरजेंसी के दौरान RAW के लोगों ने उन्हें गिरफ्तार किया था। यह सच नहीं था। IB ही लोगों को गिरफ्तार कर रही थी। RAW नहीं। काओ ने असल में RAW को महल की सारी पॉलिटिक्स से दूर रखने की कोशिश की थी। संजय गांधी काओ को बहुत अच्छा नहीं मानते थे। मिस्टर काओ उन दिनों बहुत दुखी थे।”
जब जनता सरकार आई, तो काओ 1977 में समय से पहले रिटायर हो गए, ऐसे माहौल में जब सरकार को एजेंसी पर शक था और उसने उसके बजट और पावर में कटौती शुरू कर दी थी। लेकिन रिटायरमेंट से काओ का असर खत्म नहीं हुआ। उस साल R&AW चीफ एन एफ सुंतूक ने काओ से एटॉमिक एनर्जी कमीशन के उस समय के चेयरमैन होमी सेठना को प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी पर साइन न करने की सलाह देने के लिए मनाने में मदद मांगी। बालचंद्रन का कहना है कि काओ ने सेठना तक मैसेज पहुंचाने के लिए उन्हें चुना था।
काओ की रणनीतिक सोच का एक ऐसा ही उदाहरण 1981 में सामने आया, जब भारत विदेशी सरकारों को यह समझाने में जूझ रहा था कि पाकिस्तान एक गुप्त न्यूक्लियर वेपन प्रोग्राम चला रहा है। डिप्लोमैटिक और इंटेलिजेंस चैनल काफी असरदार नहीं हो पाए थे।जब काओ को पता चला कि द न्यूयॉर्क टाइम्स BBC पैनोरमा के साथ ‘इस्लामिक बम’ की जांच कर रहा है, तो उन्होंने सनटूक को सलाह दी कि बालचंद्रन पेरिस के एक वरिष्ठ पत्रकार से संपर्क करें और अखबार की टीम के साथ एक मीटिंग तय करें। यह एक अनोखा कदम था। मकसद था इंटरनेशनल प्रेस को एक ऐसे चैनल के तौर पर इस्तेमाल करना जिसके ज़रिए इंटेलिजेंस पॉलिसी पर असर डाल सके।
इस बीच काओ सरकार में वापस आ गए थे। बालचंद्रन के मुताबिक, इंदिरा गांधी के सबसे करीबी भरोसेमंद लोगों में से एक ए सी एन नांबियार ने उन्हें काओ को फिर से नौकरी पर रखने की सलाह दी। 1981 में, काओ कैबिनेट सेक्रेटेरिएट में सीनियर एडवाइजर बन गए।
दूसरी पारी अचानक हुई खत्म
उनकी दूसरी पारी अचानक खत्म हो गई। अक्टूबर 1984 में काओ बीजिंग में थे, चीन के साथ रिश्ते बनाने की कोशिश कर रहे थे, तभी 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। चीनी अधिकारियों ने उनके हांगकांग जाने का इंतज़ाम किया, जहां से वे भारत लौट आए। इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार के बाद वे राजीव गांधी से मिले और पद छोड़ने के लिए कहा। उन्होंने फिर कभी कोई सरकारी पद नहीं संभाला। न ही उन्हें पब्लिक में देखा गया। वे शायद ही कभी तस्वीरों में दिखते थे और अपने काम का क्रेडिट पब्लिक में नहीं लेते थे। इससे बालचंद्रन हैरान नहीं हुए क्योंकि, जिस काओ को वे जानते थे, वह हमेशा एक बहुत ही लो-प्रोफाइल इंसान था।
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UPI से पेमेंट करना आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरत के साथ-साथ अब आदत भी बन चुका है। 2000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई मर्चेंट पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Merchant Discount Rate-MDR) लागू होने जा रहा है। इसके साथ ही MDR की रकम पर 18 प्रतिशत जीएसटी भी लगेगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि 2000 रुपये से ज्यादा का हर यूपीआई पेमेंट करने वाले ग्राहक से 18 फीसदी जीएसटी अलग से लिया जाएगा। पढ़ें पूरी खबर
