देश की राजनीति में आने वाले चुनावों से पहले कई स्तरों पर नए समीकरण बनते दिख रहे हैं। भाजपा में राम माधव की नई भूमिका चर्चा में है तो हिमाचल में सुखविंदर सिंह सुक्खू के सामने सत्ता परिवर्तन की पुरानी रीत बदलने की चुनौती है। पंजाब में कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान और भाजपा-अकाली गठबंधन की संभावनाएं भी राजनीतिक हलचल बढ़ा रही हैं।
माधव की चर्चा
भाजपा में राम माधव का राजनीतिक पुनर्वास कई बरस बाद हुआ है। वे पार्टी में महासचिव तो पहले ही रह चुके हैं। इस बार नितिन नवीन ने उन्हें अपनी टीम में उपाध्यक्ष बनाया है। मूल रूप से आंध्र प्रदेश के निवासी राम माधव आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक हैं। भाजपा में आरएसएस ने उन्हें प्रतिनियुक्ति पर 2014 में भेजा था। जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी की साझा सरकार के गठन का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। माधव 62 वर्ष के हो चुके हैं। उन्होंने आज तक लोकसभा या राज्यसभा का कोई चुनाव नहीं लड़ा।
भाजपा के ज्यादातर पदाधिकारी संसद के किसी न किसी सदन में रह चुके हैं। लेकिन राम माधव को मौका नहीं मिला। नितिन नवीन ने उन्हें तमिलनाडु और उत्तराखंड का प्रभारी बनाया है। उत्तराखंड से राज्यसभा की एक सीट खाली हो रही है। संभव है कि पार्टी उन्हें इसी सूबे से अगले महीने राज्यसभा भेज दे पर उसमें पार्टी को बाहरी को तरजीह देने के आरोप का सामना करना पड़ सकता है। हो सकता है ज्यादा सीट वाले उत्तर प्रदेश से भी मौका मिल जाए। जहां उसके पास आठ लोगों को राज्यसभा भेजने का अवसर है। केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी उत्तर प्रदेश से ही राज्यसभा में हैं। उन्हें अगर केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाने की अटकलें सही होंगी तो फिर दूसरी बार उत्तर प्रदेश से पार्टी उन्हें राज्यसभा वैसे भी नहीं भेजेगी। जिससे राम माधव की राह आसान हो जाएगी।
सुक्खू बदलेंगे रीत!
हिमाचल प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की रीत चली आ रही है। एक बार भाजपा सरकार बनाती है तो अगली बार कांग्रेस। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने सरकार बनाई थी। मुख्यमंत्री पद पर दावा तो वीरभद्र सिंह के परिवार का था पर मुख्यमंत्री बने सुखविंदर सिंह उर्फ सुक्खू। संकटों में घिरे रहने के बाद भी वेअपना अस्तित्व बचाने में सफल रहे हैं। पार्टी आलाकमान को उनसे उम्मीद है कि सत्ता परिवर्तन की रीत को वे बदल देंगे। राज्य में अगले साल नवंबर में गुजरात के साथ चुनाव होगा। सुक्खू को प्राकृतिक आपदा से लेकर विधायकों की बगावत और वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा है। फिर भी वे सरकार बचाए हुए हैं और सफलता से चला भी रहे हैं। सात राज्यों के बीच हाल में हुए किशाऊ बांध समझौते ने उन्हें सहारा दिया है। हिमाचल सबसे बड़ा लाभार्थी है। दूसरी तरफ सुक्खू वंचितों और दलितों पर फोकस कर परियोजनाएं चला रहे हैं।
पंजाब में कुछ तो गड़बड़ है…
चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं लेकिन पंजाब में कांग्रेस के अंदर चल रहा बवाल थमता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस द्वारा देश भर में एक साथ प्रदर्शन करने के एलान के बाद भी पंजाब के नेता एक साथ नजर नहीं आए हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक पंजाब प्रभारी सचिन पायलट की ओर से सभी नेताओं को एक साथ होकर आगे आने की हिदायत दी गई थी ताकि चुनाव से पहले एकजुटता का प्रदर्शन सामने रखा जा सके। लेकिन पंजाब में हुए पार्टी के प्रदर्शन में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी व प्रताप सिंह बाजवा नजर नहीं आए। जहां राहुल गांधी राष्ट्रीय परिदृश्य में पुरजोर पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं वहीं पंजाब के अंदर कुछ तो गड़बड़ है…होने के स्पष्ट संकेत हैं।
गठबंधन पर मंथन
पंजाब में चुनाव को लेकर भाजपा का गठबंधन अभी तक सवालों के घेरे में है। चर्चा चल रही है कि भाजपा और अकाली दल फिर साथ आ सकते हैं। खबरों की मानें तो अगले साल फरवरी में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में दोनों गठबंधन करेंगे। आखिरी बार दोनों ने 2017 का विधानसभा और 2019 का लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ा था। तब राज्य की 117 सीटों में से अकाली दल ने भाजपा को केवल 23 सीटें ही दी थीं। इस बार स्थिति उलट है। उत्तर प्रदेश में जहां भाजपा के सहयोगी दल उस पर 2022 की तुलना में ज्यादा सीटों के लिए दबाव बना रहे हैं वहीं पंजाब में भाजपा अकाली दल के साथ इस बार बराबरी का बंटवारा चाहती है। यानी बिहार की तर्ज पर। अब उसे लगता है कि पंजाब में जहां अकाली दल कमजोर हुआ है वहीं भाजपा की ताकत बढ़ी है। दलील दी जा रही है कि 2022 में जब दोनों अलग-अलग लड़े थे तो अकाली दल को 18 फीसद और भाजपा को 13 फीसद वोट मिले थे। लोकसभा के पिछले चुनाव में अकाली दल के साढ़े छह फीसद वोट के मुकाबले 18 फीसद वोट लेकर भाजपा ने उसे पछाड़ दिया था। इसी आधार पर भाजपा खुद 59 और अकाली दल के हिस्से में 58 सीटे देना चाहती है। पर चुनाव विधानसभा का है, इस नाते अकाली दल कुछ ज्यादा सीटें चाहता है। चुनावी रणनीति को समझने और बनाने में भाजपा के इतिहास को देख कर लगता है कि वह व्यावहारिक रुख चुनेगी।
प्रशांत की अगली परीक्षा
प्रशांत किशोर की बिहार में फिर परीक्षा होगी। उनकी जन सुराज पार्टी का बिहार के आम चुनाव में सूपड़ा साफ हो गया था। लेकिन पिछले दिनों बांकीपुर विधानसभा सीट का उपचुनाव जीत कर वे नायक बन गए। बांकीपुर एक तो भाजपा का अभेद्य किला था, दूसरे यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के त्यागपत्र से खाली हुई थी। भाजपा और पीके में मुकाबला भी सीधा नहीं था। राजद ने भी यहां अपना उम्मीदवार उतारा था। बहरहाल पीके की ऐतिहासिक जीत का शोर-शराबा अब थम चुका है। अब राज्य में विधान परिषद की आठ सीटों का चुनाव है। इनमें चार स्नातक श्रेणी की और चार शिक्षक श्रेणी की हैं। पीके ने आठों सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए हैं। चुनाव इसलिए भी रोचक है क्योंकि पटना स्नातक सीट पर पीके के उम्मीदवार को जद (एकी) के बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने समर्थन दिया है। उन्होंने अपनी पार्टी के नीरज सिंह को पराजित करने का एलान कर दिया है। अगड़े, पिछड़े, मुसलमान और महिला सभी वर्गों के अपने समीकरण के बल पर पीके राजग और राजद को कितनी चुनौती दे पाएंगे, यह नतीजों से ही साफ होगा।
