राज्यसभा चुनाव के बहाने देश की राजनीति में कई दिलचस्प घटनाक्रम सामने आए हैं। तमिलनाडु में कांग्रेस को द्रमुक के समर्थन से सीट मिली, हरियाणा में कुलदीप विश्नोई को झटका लगा, केंद्र ने कुछ राज्यपालों में बदलाव किया और शरद पवार ने विपक्ष की राजनीति में बने रहने का संकेत दे दिया।

कांग्रेस का चयन

राज्यसभा की जिन सीटों का चुनाव हो रहा है, उनमें कांग्रेस को एक सीट का फायदा हो रहा है। वजह है पार्टी पर एमके स्टालिन की कृपा दृष्टि। स्टालिन ने कांग्रेस की राज्यसभा की एक सीट की फरियाद कबूल कर ली। कांग्रेस की तरफ से कहा जा रहा था कि प्रवक्ता पवन खेड़ा के लिए यह सीट मांगी गई है। लेकिन कांग्रेस ने उम्मीदवार बना दिया एम क्रिस्टोफर तिलक को। तमिलनाडु में खेड़ा के रूप में बाहरी उम्मीदवार का जोखिम स्टालिन ले भी नहीं सकते थे। हकीकत तो यह है कि फिल्म अभिनेता विजय के कारण कांग्रेस और द्रमुक दोनों परेशान हैं। विजय जात-पात की राजनीति नहीं कर रहे। उनका ईसाई होना कांग्रेस को मुश्किल में डाल रहा था। इस चक्कर में ईसाई क्रिस्टोफर तिलक की लाटरी खुल गई। राज्यसभा उम्मीदवारों को लेकर कांग्रेस में दूसरे राज्यों में भी अजीब रवैया दिखा।

हरियाणा में करमवीर बोध का चयन किसी को गले नहीं उतरा। हरियाणा में अनुसूचित जाति के नेता के तौर पर उनकी कोई खास पहचान नहीं है। बस राहुल गांधी का करीबी बताया जा रहा है उन्हें। हैं वे भूपिंदर हुड्डा की पसंद। हिमाचल प्रदेश में भी मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने प्रतिभा सिंह और आनंद शर्मा दोनों का पत्ता कटवा कर अनुराग शर्मा को उम्मीदवार बनवा दिया। छत्तीसगढ़ में जरूर नए नेता को आजमाने की जगह कांग्रेस ने आदिवासी फूलो देवी नेताम को ही फिर राज्यसभा भेजना तय किया है।

कुलदीप की मुश्किल

कुलदीप विश्नोई को उम्मीद थी कि भाजपा उन्हें राज्यसभा में मौका देगी पर लाटरी खुली संजय भाटिया की। 2007 में कांग्रेस छोड़ उन्होंने अपनी अलग पार्टी ‘हरियाणा जनहित कांग्रेस’ बनाई। भजनलाल की मौत के बाद 2011 में हिसार में उपचुनाव हुआ तो कुलदीप जीते पर 2014 में उन्होंने भाजपा से तालमेल कर चुनाव लड़ा तो दुष्यंत चौटाला से हार गए। पर गुमान इतना था कि उसी साल विधानसभा चुनाव में भाजपा से 45 सीट मांग ली।

भाजपा अपने बूते जीत गई। अब कोई रास्ता नहीं था सो अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया। भाजपा ने 2019 में विपक्ष का हरियाणा में सूपड़ा साफ कर दिया तो बेचारे कुलदीप मजबूरी में 2022 में भाजपा की शरण में आ गए। पर मनोहर लाल खट्टर को 2014 में नखरे दिखाए थे, लिहाजा उसका खमियाजा तो भुगतना ही होगा। मुश्किल है अब भाजपा में उनका सियासी पुनर्वास।

जमीन से जुड़ने की रणनीति

कांग्रेस अपनी जमीनी स्थिति मजबूत करने के लिए सामाजिक इंजीनियरिंग का सहारा लेने की कवायद में है। राज्यसभा में भेजे गए चेहरों से कांग्रेस पार्टी का यह इरादा साफ नजर आता है। राज्यसभा चुनाव में पार्टी ने पुराने नेताओं के साथ समीकरण बनाते हुए नए चेहरों को भी मैदान में उतार दिया है। इस तरह का समीकरण कांग्रेस ने हाल ही के चुनाव में भी प्रयोग किया था, ताकि युवाओं को पार्टी से जोड़ा जा सके। सामाजिक इंजीनियरिंग का यह नुस्खा पार्टी के नेताओं को भी पसंद आ रहा है। वरिष्ठ नेता मान रहे हैं कि इस पहल से युवाओं को मौका मिलेगा और जमीनी स्तर पर जो दूरियां लगातार बढ़ रही हैं, इन्हें भी खत्म किया जा सकेगा। कांग्रेस की यह रणनीति भविष्य में कारगर होगी।

किस्मत के धनी

केंद्र सरकार ने गुरुवार को अचानक दो राज्यपालों को हटा दिया, कुछ का तबादला कर दिया और कुछ नई नियुक्तियां कर दीं। बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान तो खैर पांच साल के सामान्य कार्यकाल की जगह साढ़े छह साल राजभवन में रहे, पर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस तो महज सवा तीन साल ही पद पर रह पाए। हालांकि उन्होंने खुद पद से त्यागपत्र दिया। राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। स्वाभाविक कार्यकाल पांच साल होता है, पर सरकार चाहे तो पहले भी हटा सकती है। यह बात अलग है कि सत्यपाल मलिक जैसे जो राज्यपाल सरकार के कहने पर त्यागपत्र नहीं देते, सरकार उनका तबादला तो किसी छोटे राज्य में कभी भी कर सकती है

केंद्र की मौजूदा भाजपा सरकार ने अभी तक किसी भी राज्यपाल को दो कार्यकाल के लिए नियुक्त नहीं किया। यहां तक कि कल्याण सिंह और कलराज मिश्र जैसे राज्यपालों को भी पांच साल पूरे होते ही राजभवन छोड़ना पड़ा। स्वाभाविक से ज्यादा समय राज्यपाल रहने वाले किस्मत के धनी बनवारी लाल पुरोहित रहे। तीन राज्यों में उनका कुल कार्यकाल आठ साल था। जिसे तोड़ने वाले दो और राज्यपाल आचार्य देवब्रत और आनंदी बेन पटेल हैं। देवब्रत 2015 से लगातार राज्यपाल हैं, तो आनंदी बेन भी अब तक विभिन्न राजभवनों में आठ साल से ज्यादा समय व्यतीत कर चुकी हैं। इन्हें किस्मत के धनी कहा जा सकता है।

विपक्ष में रहेंगे पवार

शरद पवार की भावी सियासत को लेकर लगाई जा रही अटकलें फिलहाल थम गई हैं। महा विकास आघाड़ी की तरफ से वे महाराष्ट्र से राज्यसभा के उम्मीदवार बन गए हैं। जबकि उनकी पार्टी के पास महज दस विधायक ही हैं। उद्धव ठाकरे के पास 20 और कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं। पवार की उम्मीदवारी से साफ हो गया है कि फिलहाल वे विपक्ष की राजनीति ही करेंगे। पिछले दिनों चर्चा चली थी कि पवार राकांपा के दोनों धड़ों को एकजुट करके राजग में शामिल होना चाहते हैं और अपनी बेटी सुप्रिया सुले को केंद्र में मंत्री बनवाने का ताना-बाना बुन रहे हैं। लेकिन अजित पवार की मौत के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को भाजपा ने उपमुख्यमंत्री बनाकर शरद पवार के मंसूबों पर पानी फेर दिया।

अब तो सुनेत्रा अपनी पार्टी की अध्यक्ष भी बन गई। शरद पवार जानते हैं कि भाजपा उनके कुछ सांसदों पर डोरे डाल रही है। पवार की उम्र चाहे जितनी भी हो गई हो, पर महाराष्ट्र की सियासत के वे अभी भी अहम किरदार हैं। इसलिए एक बार फिर विपक्ष की सियासत के लिए मराठा क्षत्रप का राजी हो जाना महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा के वर्चस्व के लिए चुनौती होगी।