देश की राजनीति इन दिनों केवल चुनावी नतीजों से नहीं, बल्कि दलों के भीतर चल रही खींचतान, रणनीतिक बदलावों और नेतृत्व संघर्षों से भी प्रभावित हो रही है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की राज्यसभा सीट गंवाने से लेकर बिहार में जातीय समीकरणों की राजनीति, गुजरात में विपक्ष के सिमटते दायरे, कांग्रेस के प्रस्तावित आंदोलन की रणनीति और महाराष्ट्र में सुनेत्रा पवार के उभरते राजनीतिक प्रभाव तक, कई घटनाएं सियासत के बदलते चरित्र की ओर संकेत कर रही हैं।

घर के भेदी

मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के साथ धोखा हुआ है। मीनाक्षी मंदसौर से लोकसभा की सांसद रही हैं। कांग्रेस को मध्य प्रदेश से राज्यसभा की एक सीट मिलने का गणित था। तभी दिग्विजय सिंह से लेकर कमलनाथ तक की हसरत थी उम्मीदवार बनने की। पर राहुल गांधी ने युवा नेतृत्व उभारने के लिए मीनाक्षी को अवसर दिया। जिनके नामांकन को भाजपा की इस आपत्ति के बाद निरस्त कर दिया गया कि उन्होंने अपने खिलाफ अदालत में लंबित मामले की जानकारी नामांकन पत्र में छिपाई। अब जरा मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें। मीनाक्षी के खिलाफ किसी की शिकायत पर अदालत से समन जारी हुआ था, यह जानकारी भाजपा नेताओं के पास नहीं थी। मीनाक्षी के खिलाफ कोई भी आपराधिक प्राथमिकी किसी थाने में दर्ज नहीं थी। निजी शिकायत का नामांकन में उल्लेख करना कतई जरूरी नहीं। फिर भी भाजपा तक यह सूचना कांग्रेस के किसी नेता ने पहुंचाई। तभी भाजपा ने नामांकन वाले दिन तीसरा उम्मीदवार महेश केवट मैदान में उतारा और मीनाक्षी के खिलाफ आपत्ति भी दर्ज कराई। निर्वाचन अधिकारी ने आपत्ति मान भी ली। एक तरह से पक्की मानी जा रही सीट कांग्रेस ने खो दी। मीनाक्षी की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। चुनाव आयोग ने केवट को विजयी घोषित कर दिया है। जाहिर है कि कांग्रेस को नुकसान अपने ही नेताओं के भितरघात से पहुंचा है।

अलग-अलग राग

बिहार में राजग में शामिल पार्टियां अपने-अपने तरीके से राजनीति कर रही हैं। विधान परिषद के नौ सीटों का चुनाव हुआ और एक सीट का उपचुनाव, जो राज्यसभा के लिए चुने जाने पर नीतीश कुमार ने खाली की थी, इस पर उन्होंने ललन प्रसाद धानुक को उम्मीदवार बनाया। जबकि राज्य सरकार में धानुक जाति के दो मंत्री पहले से हैं। साफ है कि नीतीश कुर्मी, कोइरी और धानुक के समीकरण को छोड़ नहीं रहे हैं। नीतीश ने एक कुम्हार को भी विधान परिषद भेज दिया। इस अति पिछड़ी जाति का ध्यान भाजपा ने भी रखा। भाजपा को मुसलिमों से परहेज है, लेकिन लोजपा के चिराग पासवान ने अपने खाते की इकलौती सीट पर एक मुसलमान को विधान परिषद भेजकर अलग ढंग की अपनी राजनीति छोड़ी नहीं। लगता है कि उन्होंने अपने पिता रामविलास पासवान से बखूबी सीख लिया है कि किसी के असर में अपनी पहचान नहीं खोनी चाहिए।

आंदोलन पर अनोखी सलाह

कांग्रेस पार्टी अखिल भारतीय स्तर पर जल्द ही एक बड़ा आंदोलन शुरू करने जा रही है। इस आंदोलन में अधिक से अधिक युवाओं को जोड़ा जा सके, इसके लिए पार्टी के एक युवा नेता ने सलाह दी कि आंदोलन कांग्रेस पार्टी की जगह किसी अन्य बैनर तले करना चाहिए। अगर कांग्रेस खुद यह आंदोलन करती है तो सक्रिय सामाजिक संगठन और दूसरे वामपंथी संगठन इसमें शामिल नहीं होंगे। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने यह सलाह सुनते ही फटकार लगाई। बाद में स्पष्ट निर्देश जारी किया गया कि यह आंदोलन पार्टी के बैनर तले ही होगा। शीर्ष नेतृत्व ने यह भी समझा दिया कि युवा छात्र संगठन (एनएसयूआइ) भी कांग्रेस ही है। पार्टी के अन्य नेताओं ने भी बाद में सलाहकर्ता को कई पाठ पढ़ाए।

सूपड़ा साफ

पहली बार गुजरात से देश की संसद के उच्च सदन में विपक्ष का एक भी सदस्य नहीं होगा। गुजरात राज्य 1960 में बना था। राज्यसभा में इस राज्य की कुल 11 सीटें हैं। राज्य की सत्ता पर 1998 से लगातार भाजपा का कब्जा है। इस समय राज्यसभा में कांग्रेस के इकलौते सदस्य शक्ति सिंह गोहिल हैं। जिनका कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो जाएगा। विधानसभा में कांग्रेस इस हैसियत में है नहीं कि अपना कोई सदस्य चुनवाकर राज्यसभा भेज सकती। हां, 2017 के चुनाव में उसे विधानसभा में अच्छी सीटें मिल गई थीं। तभी 2020 में उसके दो उम्मीदवार चुनकर राज्यसभा पहुंच गए थे-अहमद पटेल और शक्ति सिंह गोहिल। पटेल का कोरोना में निधन हो गया तो उपचुनाव में उनकी सीट भी भाजपा के पास चली गई। फिर 2022 का विधानसभा चुनाव आया तो आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की लुटिया डुबो दी और वह विधानसभा में 77 से घटकर 17 पर पहुंच गई। लोकसभा में भी राज्य की 26 सीटों में से 2024 में 25 भाजपा ने जीती थीं। एक तरह से गुजरात सियासी नजरिए से पूरी तरह भगवा रंग में डूब चुका है। पिछले कुछ समय में गुजरात में आम आदमी का भी प्रभाव बढ़ा था। कांग्रेस की जमीन पर आम आदमी पार्टी स्थापित होना चाहती थी। गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह प्रदेश रहा है। भारतीय राजनीति में गुजरात माडल 2014 के बाद अपने मायने बदल चुका है। भाजपा गुजरात को अपना अग्रदूत मानती आई है।

कठपुतली नहीं हैं सुनेत्रा

सुनेत्रा पवार ने सियासत के दांव-पेच बड़ी जल्दी सीख लिए हैं। सियासी जिम्मेदारियों का बोझ उन पर इस साल जनवरी में पति अजित पवार की मौत के बाद ही आया। शुरू में उनके कौशल को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए गए थे। मसलन वे अपनी पार्टी का विलय शरद पवार की पार्टी में कर लेंगी। फिर लगा कि पार्टी के प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल जैसे वरिष्ठ नेताओं की कठपुतली होकर रह जाएंगी। लेकिन सुनेत्रा ने सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल को तो पहले ही हाशिये पर पहुंचा दिया था। अब छगन भुजबल की राज्यसभा जाने की हसरत पर भी पानी फेर दिया। भुजबल चाहते थे कि सुनेत्रा ने राज्यसभा की जो सीट खाली की है, उस पर उन्हें राज्यसभा भेजा जाए पर सुनेत्रा ने मौका राजेंद्र जैन को दिया है। जहां तक भुजबल का सवाल है, वे इस समय राज्य सरकार में मंत्री हैं। उनका बेटा पंकज एमएलसी है। उन्हें चिंता भतीजे समीर की है जो इस समय किसी पद पर नहीं है। भुजबल खुद राज्यसभा जाने और भतीजे को अपनी जगह मंत्री बनवाने के चक्कर में थे। लेकिन सुनेत्रा ने उनकी हसरत पर पानी फेर कर दिखा दिया कि पार्टी की असली बास वही हैं।